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विषम क्षेत्रों में स्वतंत्र पत्रकारों के मानसिक स्वास्थ्य का संकट

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बांग्लादेश में रोहिंग्या शरणार्थी संकट के शुरुआती दिनों का मामला है। फ्रीलांस पत्रकार रिदवान अहमद ने 2017 में कुछ शरणार्थियों के अंतिम संस्कार में हिस्सा लिया। ये शरणार्थी बंगाल की खाड़ी पार करके सुरक्षित स्थान तक जाने कोशिश में डूब गए थे। मृतकों में महिलाओं और बच्चों की संख्या काफी अधिक थी। कब्रिस्तान में एक ऐसा व्यक्ति ऐसा था, जिसने पहले म्यांमार में हिंसा के दौरान अपना एक बेटा खो दिया था। अब इस समुद्र हादसे में अपने बाकी परिवार को भी खो दिया।

वह व्यक्ति रो नहीं रहा था। वह चुपचाप बैठा था। उसके चेहरे पर कोई भाव नहीं था। वह बार-बार वही बातें दोहरा रहा था, बिना यह जाने कि इसका दूसरों पर क्या असर होगा।

रिदवान अहमद उस हादसे की रिपोर्टिंग करने के लिए उस समुदाय के बीच गए थे। लेकिन लौटने के बाद भी वह अनुभव उनके साथ बना रहा। वह कहते हैं- ”सभी चीजें जमा होती रहती हैं। हर कहानी। सिर्फ इसलिए नहीं कि वह नोटबुक में दर्ज है, बल्कि इसलिए कि वह आपको परेशान करती रहती है। बाद में कभी वह आपकी नींद में आती है, कभी आपकी प्रतिक्रियाओं में। कभी लगता है कि कब आप उन चीजों को भूल जाते हैं, जिनसे आपको अब भी विचलित होना चाहिए।”

दुनिया भर में संघर्ष और मानवीय संकटों को कवर करने वाले स्वतंत्र पत्रकारों की यह कहानी है। वे अक्सर हिंसा, विस्थापन और राजनीतिक अस्थिरता से इंसान पर पड़ने वाले असर को सबसे पहले दर्ज करते हैं। अफ्रीका में विद्रोह से प्रभावित समुदायों से लेकर मध्य पूर्व के युद्ध क्षेत्रों तक उन्हें काम करते देखा जा सकता है। लैटिन अमेरिका के कुछ हिस्सों में कार्टेल हिंसा और एशिया के कुछ हिस्सों में जबरन विस्थापन तक फ्रीलांस रिपोर्टर अक्सर किसी खास संस्थागत सुरक्षा के बगैर फ्रंटलाइन पर काम करते हैं।

संघर्ष इलाकों में काम करने वाले स्वतंत्र पत्रकारों पर शारीरिक खतरों के बारे में काफी जानकारी मौजूद है। लेकिन उन पर मानसिक असर के बारे में बहुत कम बात की गई है। ऐसी रिपोर्टिंग करने वाले ज़्यादातर स्वतंत्र पत्रकारों को बड़े मीडिया संस्थानों का समर्थन नहीं मिलता है। उन्हें अक्सर काउंसलिंग, बीमा या संपादकीय सहयोग के अभाव के कारण बुरे अनुभवों से गुज़रना पड़ता है। यह उनके मानसिक आघात (ट्रॉमा) का कारण बन सकता है।

रिदवान अहमद कहते हैं : “फ्रीलांसरों के लिए लगभग हर सुविधा का अभाव है। व्यवस्थित सपोर्ट और मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े संसाधन नहीं होते। यहां तक कि बुनियादी सुरक्षा कवर भी नहीं होता। अक्सर हम यह सब मांगने से भी डरते हैं।”

संघर्ष वाले इलाकों की रिपोर्टिंग करने वाले पत्रकारों पर एक महत्वपूर्ण रिसर्च देखें। शोध के अनुसार ऐसे पत्रकारों के एक बड़े हिस्से में पोस्ट-ट्रॉमेटिक स्ट्रेस (सदमे के बाद का तनाव), डिप्रेशन और एंग्जायटी (बेचैनी) के लक्षण दिखाई देते हैं। ऐसे पत्रकारों के जीवन पर भी खतरा मंडराता रहता है। इस पर ‘कमेटी टू प्रोटेक्ट जर्नलिस्ट्स’ के आंकड़े देखे जा सकते हैं। इसके अनुसार 1992 से अब तक 2500 से ज़्यादा मीडियाकर्मी मारे जा चुके हैं। इसके बावजूद मानसिक स्वास्थ्य को पत्रकारों की सुरक्षा का हिस्सा माना जाता है। खासकर फ्रीलांसरों के मामले में। कई न्यूज़ संस्थानों में यह उम्मीद की जाती है कि पत्रकार अपने काम से जुड़े शारीरिक और भावनात्मक जोखिमों को खुद झेलें।

‘ग्लोबल सेंटर फॉर जर्नलिज्म एंड ट्रॉमा’ के कार्यकारी निदेशक ब्रूस शापिरो ने कहा कि पत्रकारिता में मानसिक स्वास्थ्य पर बातचीत बढ़ी है। लेकिन सपोर्ट सिस्टम अभी भी ठीक से काम नहीं कर रहा है और अक्सर बहुत देर से मिलता है। जीसीजेटी एक प्रमुख पत्रकारिता संगठन है, जिसका उद्देश्य इस समस्या का समाधान करना है।

वे कहते हैं- “पत्रकारिता का कल्चर बदल रहा है। अब इसमें मानसिक स्वास्थ्य के बारे में बातचीत हो रही है। कुछ बड़े न्यूज़रूम में ऐसी ट्रेनिंग और थेरेपी की सुविधाएं मिल रही हैं। लेकिन ऐसे उपाय अब भी काफ़ी नहीं हैं। ज़्यादातर न्यूज़रूम समुचित मदद नहीं दे रहे हैं। अक्सर मदद तभी मिलती है, जब संघर्ष वाले इलाकों में काम कर रहा कोई पत्रकार पूरी तरह टूट जाए या मानसिक संकट में पड़ जाए।”

फ्रीलांसरों और कम संसाधनों वाले संस्थानों के पत्रकारों को समुचित मदद मिलना और भी मुश्किल है। इमरजेंसी फंड और सुरक्षा से जुड़ी कुछ सहायता उपलब्ध है। लेकिन इनके बारे में कई पत्रकारों को पता ही नहीं होता। संसाधनों की इस कमी के कारण कुछ पत्रकारों को अपने काम से पैदा भावनात्मक असर का सामना अकेले ही करना पड़ता है। बार-बार सदमे का सामना करने से उनके नज़रिए पर असर पड़ सकता है। वे अपने सब्जेक्ट, अपने काम और खुद को अलग तरह से देखने लगते हैं। कभी-कभी ये बदलाव इतने सूक्ष्म होते हैं कि फील्ड में काम करते हुए उन्हें पहचानना मुश्किल होता है।

युद्ध, कैद और इराक में रिपोर्टिंग का लंबा दौर

बगदाद में असद ज़लज़ाली ने 2004 में पत्रकारिता आरंभ की। उस दौरान इराक में रिपोर्टिंग के लिए ऐसे इलाकों में घूमना पड़ता था, जहां किसी भी वक्त हिंसा हो सकती थी। वह 2013 में जब इन्वेस्टिगेटिव रिपोर्टिंग करने लगे, तो जोखिम उठाना रोज़मर्रा की बात हो चुकी थी।

ऐसा ही एक मौका तब आया, जब वह एक खोजी खबर के सिलसिले में बगदाद के अल-मंसूर इलाके में थे। वहां एक भीषण कार बम धमाका हो गया। कुछ ही देर बाद वह घटनास्थल पहुंच गए। देखा कि सड़क पर लाशें बिखरी पड़ी थीं। खुद को संभालते हुए उन्होंने लाइव रिपोर्टिंग शुरू की।

एक बार तो रिपोर्टिंग के दौरान हथियारबंद लोगों ने उनका अपहरण कर लिया। कई घंटों तक लगा कि वह जिंदा नहीं बच पाएंगे। उन्होंने अपनी ही मौत की खबर लिखने की कल्पना तक कर डाली। बाद में उन्हें रिहा कर दिया गया। लेकिन इस अनुभव ने उनके करियर में जोखिम को देखने का नज़रिया बदल दिया।

असद ज़लज़ाली कहते हैं- ”कोई भी घटना हम पर बिना कोई प्रभाव छोड़े नहीं गुजरती। मैंने जितनी घटनाओं की रिपोर्टिंग की है, सबका मुझ पर गहरा मानसिक असर पड़ा है। मुझे नहीं लगता कि कोई भी स्वतंत्र पत्रकार इससे अछूता रह सकता है, चाहे वह कितना भी मजबूत क्यों न दिखे।”

असद ज़लज़ाली ने तथाकथित ऑनर किलिंग (सम्मान के नाम पर हत्या) की शिकार महिलाओं पर पिछले दिनों एक रिपोर्ट की। यह अनुभव उनके लिए ज़्यादा व्यक्तिगत बोझ बन गया। उनमें से कुछ महिलाओं ने मौत से पहले उन्हें अपनी तस्वीरें भेजी थीं। रिपोर्टिंग के काफी समय बाद भी वे कहानियां असद ज़लज़ाली के दिल और दिमाग में बनी रहीं। काफी दिनों तक इसकी वजह से उनकी नींद और मानसिक स्थिति पर इसका असर पड़ा। वह कहते हैं- “इन अनुभवों से निपटने का मेरे पास कोई निर्धारित तरीका नहीं है। आम तौर पर मैं अगली कहानी की ओर आगे बढ़कर खुद को व्यस्त रखते हुए ऐसे सदमे से निपटता हूं।”

इस तनाव का असर सामान्य जीवन पर भी पड़ा। रिपोर्टिंग के दौरान जब उनका अपहरण हुआ या जब वह घायल हुए, तो उनके परिवार पर काफी बुरा असर पड़ा। उनकी मां लगातार डर के साये में जीती थीं। ऐसे अनुभवों ने उन्हें यहां तक सोचने पर मजबूर कर दिया कि क्या पत्रकारिता जारी रखनी चाहिए या नहीं।

कई बातें आपके लिए ऐसे मानसिक सदमे से उबरना मुश्किल बना सकती हैं। दुनिया के कई हिस्सों में मानसिक स्वास्थ्य संबंधी परेशानियों पर बात करना अच्छा नहीं माना जाता है। खासकर पुरुषों के मामले में। कुछ इलाकों में सांस्कृतिक रीति-रिवाज़ मानसिक परेशानी बताने को हतोत्साहित करते हैं।

फ़िलिस्तीन में रहना और काम करना

गाज़ा में पत्रकारों के लिए सब कुछ अकेले संभालने की चुनौती रोज़मर्रा की ज़िंदगी बन जाती है। सुलेमान हिज्जी  अपने काम की शुरुआत किसी ऑफ़िस या न्यूज़रूम से नहीं, बल्कि अस्पताल के मुर्दाघर से करते हैं। वहां मृतकों के परिजन मिलते हैं। हमलों, हताहतों और तबाही की खबरें लगातार आती रहती हैं।

मुर्दाघर के बाद काम के सिलसिले में वह फ़ील्ड में जाते हैं। यदि उन्हें ईंधन मिल जाए और गोलाबारी के कारण सड़कें बंद न हों, तो वे हमले वाली जगहों पर जाते हैं। वहां मलबे से भरी जगहों पर जाकर जांच-पड़ताल करते हैं। घायल नागरिकों और खंडहर बन चुके घरों की रिपोर्टिंग करते हैं। इसके अलावा, बिजली, सेल सिग्नल या इंटरनेट कनेक्टिविटी की तलाश भी बड़ी चुनौती होती है। जो कुछ भी वह रिकॉर्ड या डॉक्यूमेंट करते हैं, उसे भेजने के लिए इन चीजों की जरूरत होती है।

वे बताते हैं- “मेरा काम मुर्दाघर से शुरू होता है। इस दौरान बनाए गए वीडियो को भेजने के साथ खत्म काम होता है। इसके बीच का सारा समय बस खतरों के बीच भाग-दौड़ में बीतता है।”

सुलेमान हिज्जी न सिर्फ़ युद्ध की कवरेज करते हैं, बल्कि खुद भी इस युद्ध का हिस्सा हैं। इतनी नज़दीकी उनके काम करने के तरीके को बदल देती है। हर असाइनमेंट में पेशेवर ज़िम्मेदारी और निजी डर दोनों होते हैं। जिन लोगों से वे मिलते हैं, वे अक्सर पड़ोसी, दोस्त या पहले से परिचित लोग होते हैं। वे घटनाओं को रिकॉर्ड करते समय पीड़ितों को अपने ही परिवार का सदस्य मानते हैं।

उनकी सबसे दर्दनाक यादें किसी एक कहानी से नहीं, बल्कि अपने ही पेशे में नुकसान से जुड़ी हैं। वे कहते हैं- “सबसे मुश्किल काम है युद्ध के दौरान अपने साथी पत्रकारों और दोस्तों को खोना। जिनके साथ हम रोज़ काम करते थे, उन्हें खो दिया। हमारा मकसद एक ही था। हम साथ खाते, दुख-दर्द बांटते और यहाँ तक कि कंबल भी शेयर करते थे। हम अक्सर सड़कों पर सोते थे।”

वेस्ट बैंक में काम करने वाले संघर्ष-क्षेत्र के पत्रकार अयमन अबू रामोज़ के अनुभव भी जानने लायक हैं। उनके लिए काम की शर्तें उस मीडिया संस्थान से तय होती हैं, जहां उनकी खबर छपनी है। उनका कहना है कि कुछ एजेंसियां फ्रीलांसरों और स्थानीय पत्रकारों को भी अच्छा-खासा सहयोग देती हैं।

अबू रामोज़ ने कुछ असाइनमेंट करने से मना कर दिया, क्योंकि उनमें निजी खतरा था। हालांकि उन्हें लगता है कि उनकी कवरेज करनी चाहिए। एक बार उन्हें हेब्रोन में एक चेकपॉइंट पर रोक कर गिरफ्तार कर लिया गया था।

वे मानते हैं- “मुझे कभी-कभी ब्रेक की ज़रूरत होती है। जो कुछ मैं देखता हूं, उसके कारण लगता है कि अब दुबारा वहां नहीं जाना। लेकिन कुछ समय बाद  मैं वापस रिपोर्टिंग के लिए चला ही जाता हूँ।”

खतरे के बीच रिपोर्टिंग और गवाह होने की चुनौती

क्लाउड सेंजेन्या ने दो साल पहले डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ़ कांगो के इतुरी में जुगु इलाके का दौरा किया था। एक अंतरराष्ट्रीय असाइनमेंट के तहत उन्होंने सुनसान इलाकों और हथियारबंद विद्रोहियों के ठिकानों का दौरा किया। विस्थापन व असुरक्षा को रिकॉर्ड किया। वहां से लौटने के कुछ ही दिनों बाद उसी कैंप पर हमला हुआ। इसमें लगभग 50 विस्थापित लोग मारे गए। वे कहते हैं- “मैं बस यही सोचता रहता हूं कि अगर मैं भी वहां होता तो हमले में मेरा क्या होता।”

अब हर असाइनमेंट पर जाने से पहले वह सोचते हैं कि जहां रिपोर्टिंग करने जा रहे हैं, वह अचानक किसी नरसंहार की जगह में बदल सकती है। समय के साथ बार-बार हिंसा को देखने-सुनने से काम को लेकर उनके अनुभव और नज़रिए में भी बदलाव आया है।

वह कहते हैं- “लगातार भयानक घटनाओं और लोगों की आपबीती सुनने की वजह से हम छोटी-मोटी घटनाओं को नज़रअंदाज़ करने लगते हैं। लेकिन ऐसी घटनाएं भी इंसानी ज़िंदगी पर असर डालती हैं। ये सिर्फ़ आंकड़े नहीं हैं। ये प्रभावित लोगों की ज़िंदगी और कभी न भरने वाले ज़ख्म हैं।”

वह आगे कहते हैं- “कभी-कभी रिपोर्ट करने के बाद मुझे रोने का मन करता है। परेशान करने वाली बात यह है कि हरेक संकट के साथ वही कहानियां बार-बार दोहराई जाती हैं। भावनात्मक बोझ सिर्फ़ हिंसा को देखने से नहीं आता। यह तब आता है, जब वे अनुभव जमा होने लगते हैं और आपस में घुल-मिलकर एक धुंधली तस्वीर बनाने लगते हैं।”

अवसाद को समझना और स्वस्थ होना

ब्रूस शापिरो (जीसीजेटी) के अनुसार संघर्ष क्षेत्रों की रिपोर्टिंग पर चर्चा जिस बात से आरंभ होनी चाहिए, उसे ही नज़रअंदाज़ कर दिया जाता है। वे कहते हैं- “पत्रकार मुश्किल हालात का सामना करने और खुद को ढालने में माहिर होते हैं। पत्रकारिता से जुड़े नैतिक नियम और साथियों का सहयोग  उन्हें एक हद तक सुरक्षा देते हैं। लेकिन कई बार यह क्षमता काम नहीं आती। इसमें मानसिक आघात से जुड़ी प्रतिक्रियाएं शामिल हैं। जैसे- पीटीएसडी, यानी शरीर और दिमाग का किसी भयानक को बार-बार महसूस करना। अत्यधिक काम के दबाव से मानसिक और शारीरिक थकान और ‘बर्नआउट’ के खतरे भी होते हैं। यह लंबे समय तक बहुत ज़्यादा तनाव की स्थिति होती है। लगातार हिंसा वाले माहौल में काम करने वाले पत्रकारों में डिप्रेशन (अवसाद) के खतरे भी होते हैं।”

इसलिए ब्रूस शापिरो ने पत्रकारों की देखभाल की सुविधा को आवश्यक बताया। वह हिंसा के कवरेज के लिए पत्रकारों की ट्रेनिंग में ढांचागत कमियों की ओर भी इशारा करते हैं। वे कहते हैं- “कई ज़िम्मेदार न्यूज़ संगठन अब संघर्ष इलाकों के पत्रकारों को सुरक्षा ट्रेनिंग दे रहे हैं। लेकिन अक्सर स्थानीय स्ट्रिंगर और फ्रीलांसरों को नज़रअंदाज़ कर दिया जाता है।”

खतरनाक माहौल में रिपोर्टिंग करने वाले पत्रकारों के लिए कई संगठन प्रोफेशनल सुरक्षा ट्रेनिंग देते हैं। जैसे –

  • ACOS अलायंस (ACOS Alliance)
  • इंटरनेशनल विमेंस मीडिया फ़ाउंडेशन (International Women’s Media Foundation)
  • द रोरी पेक ट्रस्ट (The Rory Peck Trust) – यह खास तौर पर फ्रीलांसरों के लिए काम करता है।

उनका मानना है कि संपादकीय कक्ष में काम करने वाली टीम के मानसिक स्वास्थ्य को भी ध्यान में रखने के उपाय बहुत कम होते हैं। भले ही यह लोग हिंसा वाली जगह से दूर हों, लेकिन उन्हें भी सदमा पहुँचाने वाली सामग्री से गुजरना पड़ता है। जैसे ग्राफ़िक फ़ोटो और तस्वीरें। इसके कारण उन्हें भी मानसिक तनाव का सामना करना पड़ सकता है।

इन कमियों को दूर करने के लिए उन्होंने न्यूज़रूम में प्राथमिकताओं को बदलने का सुझाव दिया। कहा कि संपादकीय नेतृत्व को यह संदेश देना चाहिए कि किसी भी पत्रकार को मदद मांगने पर असाइनमेंट देने से मना नहीं किया जाएगा। यह एक सामान्य बात बन जानी चाहिए। वह बताते हैं कि व्यक्तिगत रणनीतियां भी महत्वपूर्ण हैं। पत्रकारों को अपनी पेशेवर टूल किट में तथ्यों की जांच और अच्छे कोट्स (बयान) लेने जैसी ज़रूरी चीज़ों के साथ ही खुद अपना ख्याल रखने के उपायों को भी शामिल करना चाहिए।

 मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े अतिरिक्त संसाधन

  • ग्लोबल सेंटर फॉर जर्नलिज़्म एंड ट्रॉमा (GCJT) (Global Center for Journalism and Trauma) — पत्रकारों के लिए संसाधन, प्रशिक्षण, ट्रॉमा-इन्फॉर्म्ड रिपोर्टिंग गाइड और मानसिक स्वास्थ्य सहायता।
  • जर्नलिस्ट ट्रॉमा सपोर्ट नेटवर्क (JTSN) (Journalist Trauma Support Network) — मानसिक आघात और काम से जुड़े तनाव का सामना कर रहे पत्रकारों के लिए थेरेपी सपोर्ट नेटवर्क।
  • ACOS अलायंस (ACOS Alliance) — फ्रीलांस और संघर्ष वाले इलाकों के पत्रकारों के लिए सुरक्षा और ट्रॉमा से जुड़े संसाधन।
  • इंटरनेशनल विमेंस मीडिया फ़ाउंडेशन (IWMF) (International Women’s Media Foundation) — पत्रकारों के लिए इमरजेंसी फंड, सुरक्षा संसाधन और मानसिक स्वास्थ्य सहायता।
  • कमेटी टू प्रोटेक्ट जर्नलिस्ट्स (CPJ) (Committee to Protect Journalists) — पत्रकारों की सुरक्षा से जुड़ी सलाह और इमरजेंसी सहायता।
  • रोरी पेक ट्रस्ट (Rory Peck Trust) — संकटपूर्ण स्थितियों में काम करने वाले फ्रीलांस पत्रकारों के लिए सहायता, सुरक्षा प्रशिक्षण और सहायता।
  • डार्ट सेंटर आर्काइव (Dart Center archive) — हिंसा और त्रासदी को कवर करने वाले पत्रकारों के लिए रिपोर्टिंग गाइड और ट्रॉमा से जुड़े संसाधन।

अब्दुलवाहिद सोफीउल्लाही : एक पत्रकार और शोधकर्ता हैं। जलवायु परिवर्तन और पर्यावरण से जुड़ी रिपोर्टिंग करते हैं।

 

अनुवाद : डॉ. विष्णु राजगढ़िया

 

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