GIJN Food Insecurity Reporting Guide
GIJN Food Insecurity Reporting Guide

Illustration: Emil Husnain for GIJN

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भुखमरी और खाद्य असुरक्षा की जांच के लिए गाइड

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दुनिया भर में भुखमरी की समस्या बढ़ती जा रही है। ग्लोबल रिपोर्ट ऑन फूड क्राइसिस, 2025 के आंकड़े भयावह हैं। रिपोर्ट के मुताबिक पिछले दस सालों में 53 देशों में भुखमरी पीड़ितों की संख्या लगभग तीन गुना बढ़कर 29.5 करोड़ हो गई है। युद्ध इसकी प्रमुख वजह है। आर्थिक संकट और खराब मौसम भी अन्य बड़े कारण हैं।

लगातार भूख के कारण लोगों की सेहत और विकास को दीर्घकालिक नुकसान होने का खतरा है। इनकी संख्या भी चौंकाने वाली है। हाल के सालों में कुछ सुधार के बावजूद यूनाइटेड नेशंस का अनुमान चिंताजनक है। इसके अनुसार दुनिया की 67.3 करोड़ यानी 8.2% आबादी अब भी खाने की कमी से जूझ रही है। गरीबी, अक्षम फूड सिस्टम और आर्थिक असमानता इसके लिए जिम्मेवार है।

संयुक्त राष्ट्रसंघ हर साल लगभग तीस बिलियन अमेरिकी डॉलर की मानवीय मदद जुटाता और बांटता है। दस साल पहले इसने 2030 तक दीर्घकालिक भूख को खत्म करने का लक्ष्य रखा था। इसके नए अनुमानों के मुताबिक ऐसे लोगों की संख्या लगभग 50 करोड़ होगी।

यह एक बड़ी नाकामी है। यह इंसानों की तकलीफ़ को समझने का एक पैमाना है। आज भूख का यह संकट खुद इंसानों का बनाया हुआ है। पत्रकारों को यह पहचानना ज़रूरी है कि इसके लिए कौन ज़िम्मेदार है। उन्हें ज़िम्मेदार ठहराना होगा। हालांकि ऐसा करना बहुत मुश्किल हो सकता है।

ऐसी जांच में पत्रकारों के सामने कई बाधाएं आती हैं। इनमें हथियारों की लड़ाई और बहुत खराब मौसम जैसे कारण भी शामिल हैं। प्रभावित इलाके में जाकर भोजन की तलाश करते लोगों और उनकी मदद करनेवालों तक पहुंचने की कोशिश कर रहे पत्रकारों की राह काफी मुश्किल है। ‘कमेटी टू प्रोटेक्ट जर्नलिस्ट्स’ के अनुसार  गाज़ा में इज़राइली युद्ध और इंसानी संकट को कवर करते हुए सितंबर 2025 तक लगभग 200 पत्रकार मारे जा चुके हैं। सूडान में नौ पत्रकार मारे गए, जहां लंबे समय तक सिविल वॉर के कारण अकाल पड़ा है।

हिंसा के कारण तथा रोजी-रोटी के लिए बड़ी संख्या में पलायन करने वाले पीड़ितों की गिनती करना भी मुश्किल काम है। सामाजिक ढांचा बिखरने के कारण भुखमरी और मौत के भरोसेमंद आंकड़े मिलने की संभावना कम हो जाती है। मीडिया की पहुंच पर सरकारी रोक के कारण भी भूख का सही हिसाब रखने में रुकावट आती है।

लेकिन पत्रकारों ने इन मुश्किलों को पार किया है। उन्होंने अपने पक्के इरादे के साथ रचनात्मक तरीकों से पीडितों के दुख को विस्तार से बताया है। ऐसी कुछ खबरों के उदाहरण देखे जा सकते हैं।

  • साजिशाना अकाल : इज़राइल ने भूख की चेतावनी नजरअंदाज करके गाजा को भूखा रखा – इज़राइल के प्रमुख अखबार ‘हारेट्ज़’ (Haaretz ) ने 2025 खबर में यह खबर की। इसमें इज़राइली सरकार के डेढ़ साल के बयानों, गाजा में बढ़ती भुखमरी को लेकर अंतरराष्ट्रीय संगठनों की चेतावनियों और गाजा के सोशल मीडिया का विश्लेषण किया। इस तरह गाजा में अकाल पर अकाउंटेबिलिटी जर्नलिज़्म की यह शानदार खबर बनी।
  • भूख की शिकार दुनिया – ब्रिटिश न्यूज एजेंसी ‘रॉयटर्स’ ने 2024 में यह सीरीज़ की। इसमें सैटेलाइट चित्रों का विश्लेषण करके एक स्थान पर कब्रिस्तानों के विस्तार को डॉक्यूमेंट किया गया। हिंसा के कारण लाखों सूडानी लोगों का पलायन हुआ था। ‘रॉयटर्स’ ने भरोसेमंद स्रोतों की मदद से मोबाइल फ़ोन के जरिए उन लोगों का इंटरव्यू लिया। इसके कारण काफी अहम सबूत मिले। इनके आधार पर ग्लोबल हंगर मॉनिटर ने ज़मज़म में अकाल का खुलासा किया। रिपोर्टर ने ‘रिलीफ वेब’ से यूएन फ़ूड सिक्योरिटी क्लस्टर मीटिंग के मिनट्स डाउनलोड किए। यूएन के वर्ल्ड फ़ूड प्रोग्राम से फ़ूड डिलीवरी के रिकॉर्ड मांगे। इससे मानवीय मदद में असफलता का सच सामने आया। ऐसे उपयोगी संसाधनों के लिंक इस लेख में नीचे दिए गए हैं।

गाजा में भुखमरी की दर के माह-दर-माह आंकड़े। इमेज: स्क्रीनशॉट, हारेट्ज़

कभी-कभी कारण और असर में ज़मीन-आसमान का फ़र्क होता है। अन्य नई जांच में दुनिया भर में पैसे और भोजन के आंकड़े जुटाए गए। इसके जरिए अनदेखे संबंधों का पता चला।

  • यूक्रेन में युद्ध का विश्व की खाद्य आपूर्ति पर कुप्रभाव – गार्डियन ने 2022 में यह खोजी रिपोर्ट की। इस जांच के लिए यूक्रेन में रूसी युद्ध के कारण दुनिया में खाद्य असुरक्षा संबंधी दूरगामी असर की जांच के लिए डेटा सोर्स की एक शानदार रेंज का इस्तेमाल किया गया। इसके प्रमुख स्रोतों में मैरीट्रेस मैरीटाइम इंटेल कंपनी के प्राइवेट शिपिंग डेटा; अमेरिकन एंटरप्राइज़ इंस्टीट्यूट क्रिटिकल थ्रेट्स प्रोजेक्ट से मिले रूसी मिलिट्री डेटा; इंटरनेशनल ग्रेन काउंसिल; से गेहूं इम्पोर्ट संबंधी डेटा का उपयोग हुआ। साथ ही, गेहूं के उत्पादन, कीमत और भूख के डेटा के लिए यूएन के डेटाबेस को भी शामिल किया गया। उनका सोर्स बॉक्स भूख के संकट के जियोपॉलिटिकल कारणों की जांच के लिए पत्रकारों को एक रोडमैप देता है।
  • भूख के मुनाफाखोर – लाइटहाउस रिपोर्ट्स की 2022 की इस जांच ने यूक्रेन में युद्ध के दौरान गेहूं की बढ़ती कीमतों से पैसा कमाने वाले सट्टेबाजों का पर्दाफाश किया। इसके लिए सार्वजनिक तौर पर व्यापार के लिए एग्रीकल्चर फंड के ज़रिए राशि का विश्लेषण किया। फिर सार्वजनिक दस्तावेज कानूनों का इस्तेमाल करके यह दिखाया कि कैसे सट्टेबाजों ने नियामक संस्थाओं को नज़रअंदाज़ करने के लिए लॉबिंग की। उस स्टोरी ने कई ऐसी रिपोर्ट्स की सीरीज़ शुरू कीं जिनसे पता चलता है कि कैसे पेंशन फंड्स ने वैश्विक खाद्य संकट को बढ़ावा दिया। किस तरह हेज फंड्स ने उससे फ़ायदा उठाया। हर स्टोरी में भूख के अर्थशाष्त्र पर रिपोर्टिंग के सोर्स और इनसाइट्स के साथ एक मेथड्स सेक्शन शामिल है।

इस साझा रिपोर्टिंग में उन कंपनियों की जांच की गई, जो यूक्रेन-रूस युद्ध के कारण गेहूं की बढ़ती कीमतों का आकलन कर रही थीं। इमेज: स्क्रीनशॉट, लाइटहाउस रिपोर्ट्स

खोजी रिपोर्टिंग के लिए एक और उभरता हुआ विषय यह है कि पारिस्थितिकी और सामाजिक तौर पर फ़ूड सिस्टम टिकाऊ है, अथवा नहीं।

  • जहरीला जनसंपर्क अभियान – यह ‘लाइटहाउस रिपोर्ट्स’ की 2024 की एक जांच है। इसमें पांच महाद्वीपों के सहयोगी मीडिया संगठन शामिल थे। इसमें सूचना का अधिकार कानून, धन के प्रवाह का विश्लेषण, अदालती दस्तावेजों और पुराने तरीके से सोर्स का उपयोग किया गया। इस जांच ने एक गोपनीय जनसंपर्क अभियान का पर्दाफाश किया। इसके लिए अमेरिकी टैक्सपेयर्स के फंड का दुरूपयोग किया गया था। इस जनसंपर्क अभियान का मकसद स्वास्थ्य और पर्यावरण पर कीटनाशकों के खतरों को कम करके दिखाना था। साथ ही, इसके तहत अफ्रीका, यूरोप और नॉर्थ अमेरिका के पर्यावरण विशेषज्ञों और वैज्ञानिकों को बदनाम किया गया था।
  • आप जो सी-फूड खाते हैं, उसके पीछे मौजूद अपराध – आउटलॉ ओशन प्रोजेक्ट की 2023 की मल्टीमीडिया सीरीज़ का यह पहला हिस्सा है। इसे ‘द न्यू यॉर्कर’ और कई दर्जन दूसरे इंटरनेशनल न्यूज़ आउटलेट्स में प्रकाशित किया गया था। व्यापक सीरीज़ के तहत ग्लोबल सीफूड ट्रेड में चीन की भूमिका को जांचा गया था। इस पहले हिस्से में चीन के दूर के पानी में स्क्विड फिशिंग फ्लीट के जहाजों पर समुद्र में मानवाधिकार हनन और पर्यावरण संबंधी अपराधों के बारे में बताया गया था। सीरीज़ के दूसरे हिस्सों में चीन के सी-फूड प्रोसेसिंग प्लांट्स में सरकार द्वारा प्रायोजित जबरन लेबर के मुद्दे पर फोकस किया गया था। खासकर नॉर्थ कोरियन और उइगर वर्कर्स के इस्तेमाल पर।

एक और विषय पर गौर करने की ज़रूरत है। वह है, दुनिया की भूख मिटाने हेतु दिए जाने वाले खाने में पोषण की गुणवत्ता।

कम आय वाले देशों के बच्चों में नेस्ले किस तरह चीनी की लत लगाता है –  यह स्विस एनजीओ पब्लिक आई की 2024 की एक जांच है। इसे बड़े मीडिया संगठनों ने उठाया। इसके लिए एक लैब टेस्टिंग का एक आसान लेकिन असरदार तरीका इस्तेमाल किया गया। इसने दिखाया कि कैसे यह फ़ूड समूह पहले से ही मोटापे से जूझ रहे गरीब देशों में बेचे जाने वाले बेबी-फ़ूड उत्पादों में चीनी या शहद मिलाता है। यह अंतरराष्ट्रीय स्वास्थ्य दिशानिर्देशों के ख़िलाफ़ है। साथ ही इसमें दोहरा मापदंड भी साफ तौर पर दिखता है। अमीर देशों में मिलने वाले उन्हीं उत्पादों में चीनी नहीं मिलाई जाती।

  • मैकडॉनल्ड्स ने ‘हेल्दी लाइफस्टाइल’ को बढ़ावा देने का दावा किया – यह ‘द ब्रिटिश मेडिकल जर्नल’ की 2025 की जांच है। इंग्लैंड के कुछ हिस्सों में स्थानीय सरकारें इस कंपनी पर रोक लगाने की योजना बना रही थीं। फास्ट फूड की इस बड़ी कंपनी की चालबाजियों का पता लगाने के लिए सूचना के अधिकार का इस्तेमाल किया गया। दरअसल इस कंपनी ने कानूनी कार्रवाई की धमकी देकर इस रोक पर जीत हासिल की। तर्क दिया कि वह हेल्दी लाइफस्टाइल को बढ़ावा देती हैं। कंपनी ने मोटापे के एक विशेषज्ञ के इस दावे का भी उपयोग किया कि मैकडॉनल्ड्स का खाना हेल्दी और पौष्टिक है।

हरित क्रांति

बीसवीं सदी में हुई हरित क्रांति ने एशिया और लैटिन अमेरिका में अनाज, मीट, सब्ज़ियों और फलों के बड़े पैमाने पर उत्पाद से खेती को बदल दिया।

हरित क्रांति ने ज़्यादा पैदावार वाली फ़सल की किस्में सामने लाईं। इसने सिंथेटिक फ़र्टिलाइज़र, कीटनाशक और सिंचाई के नए तरीके लाकर अकाल को टाला। दुनिया के लाखों लोगों को भूख से बचाने और आर्थिक विकास को बढ़ावा देने के लिए हरित क्रांति को श्रेय दिया जाता है। अमेरिका के कृषि विशेषज्ञ नॉर्मन बोरलॉग को ‘ग्रीन रेवोल्यूशन का जनक’ कहा जाता है। उन्हें हरित क्रांति के ज़रिए दुनिया भर में फ़ूड सप्लाई बढ़ाने के लिए नोबेल शांति पुरस्कार मिला।

लेकिन इन फ़ायदों की भारी कीमत चुकानी पड़ी। केमिकल पर निर्भरता बढ़ी। इसके ज़्यादा इस्तेमाल ने पर्यावरण को तबाह किया। भूमिगत जल में कमी आई। मोनोकल्चर पर खतरनाक निर्भरता ने बायोडायवर्सिटी खत्म कर दी। किसान कमजोर हुए। अमीर किसानों को इसका ज़्यादा फ़ायदा हुआ। इसके कारण असमानता और बढ़ गई। नई तकनीक ने पैदावार तो बढ़ाई, लेकिन खेती से होने वाले ग्रीनहाउस गैस एमिशन में काफी बढ़ोतरी हुई। इससे क्लाइमेट चेंज तेज़ हुआ। भविष्य में खाद्य उत्पादन पर खतरा बढ़ा।

हरित क्रांति की विरासत पर अब यह उदाहरण दिया जाता है कि तकनीक कैसे दुनिया का पेट भरने में मदद कर सकती है। लेकिन इक्विटी या सस्टेनेबिलिटी पर समुचित ध्यान दिए बिना उत्पादकता लंबे समय की खाद्य सुरक्षा को कमज़ोर कर सकती है।

मेराउके फूड एस्टेट के भूखे लोग – यह 2022 की एक खोजी रिपोर्ट है। इसे ‘पुलित्ज़र सेंटर’ ने फंड किया था। यह इंडोनेशिया के कोम्पास में प्रकाशित हुई थी। इसमें गैस्ट्रोकोलोनियलिज़्म के सांस्कृतिक, स्वास्थ्य और पर्यावरण पर असर को दिखाया गया। इसमें स्थानीय फ़ूड सिस्टम की जगह कम क्वालिटी वाले और मोनोकल्चर खाद्य आयात का कुप्रभाव दिखाया गया। यह इंडोनेशिया के पापुआ प्रांत में लागू एक खाद्य उत्पादन परियोजना है। जिसका उद्देश्य स्थानीय खाद्य सुरक्षा बढ़ाना है। लेकिन रिपोर्ट के अनुसार यहां के लोग अब भी भूख और कुपोषण से जूझ रहे हैं। सरकार ने देश भर में इस प्रोग्राम को लागू किया था। इस सीरीज़ में उन खोजी पत्रकारों के लिए महत्वपूर्ण सुझाव शामिल हैं, जो अपने देशों या समुदाय में इस मुद्दे पर काम कर रहे हैं।

कांगो बेसिन का पोषण – इस जांच को ‘पुलित्ज़र सेंटर’ ने फंड किया था। इसे 2024 और 2025 में इन्फोनाइल, मोंगाबे और अन्य मीडिया संस्थानों ने प्रकाशित किया था। इसमें जांच की गई कि उपजाऊ ज़मीन, भरपूर पानी और किसानों की बड़ी आबादी होने के बावजूद कांगो बेसिन दुनिया के सबसे बुरे खाद्य संकट का सामना क्यों कर रहा था।

भूख की जांच के लिए यहां कुछ महत्वपूर्ण सुझाव और संसाधनों की जानकारी दी गई है। युद्ध के हथियार के तौर पर भुखमरी के मुद्दे को जीआईजेएन की वॉर क्राइम्स रिपोर्टिंग गाइड (GIJN’s War Crimes Reporting Guide) के एक अध्याय में खास तौर पर कवर किया गया है।

प्रमुख शब्दावली

सरकारों, यूएन और सहायता समूहों की रिपोर्ट्स में भूख को आमतौर पर ‘खाद्य असुरक्षा’ या ‘अल्पपोषण’ लिखा जाता है। वर्ष 1996 में वर्ल्ड फ़ूड समिट का आयोजन हुआ था। इसमें वर्ल्ड फ़ूड सिक्योरिटी पर रोम डिक्लेरेशन को अपनाया गया। इसमें कहा गया था कि खाद्य सुरक्षा तब होती है, जब सभी लोगों के पास, हर समय, सक्रिय और स्वस्थ जीवन के लिए अपनी खुराक की ज़रूरतों और खाने की पसंद को पूरा करने के लिए काफ़ी, सुरक्षित और पौष्टिक खाना उपलब्ध हो।

इस परिभाषा के जरिए विशेषज्ञों ने खाद्य सुरक्षा को चार मुख्य हिस्सों में बांटा:

  1. उपलब्धता: क्या पर्याप्त भोजन उपलब्ध है?
  2. पहुंच: क्या जरूरतमंद लोगों के लिए सस्ता भोजन उपलब्ध है?
  3. इस्तेमाल: क्या खाने में पौष्टिक तत्व मिल रहे हैं? क्या उनके लिए विभिन्न प्रकार को पर्याप्त भोजन उपलब्ध है? क्या उसे सही तरीके से तैयार किया गया है?
  4. स्थिरता: क्या उक्त तीनों चीजों का लगातार पालन हो रहा है?

‘क्रोनिक’ और ‘एक्यूट’ भूख के बीच का अंतर समझना भी पत्रकारों के लिए आवश्यक है।

  • क्रोनिक भूख का मतलब है कोई व्यक्ति लंबे समय तक सामान्य और सक्रिय जीवनशैली बनाए रखने के लिए पर्याप्त भोजन नहीं कर पाता है। यह लंबे समय तक, लगातार पौष्टिक खाने की कमी है। आमतौर पर गरीबी, असमानता, कमजोर फूड सिस्टम और/या खराब डाइट जैसी संरचनागत समस्याओं के कारण ऐसा होता है।
  • वर्ल्ड फूड प्रोग्राम के अनुसार– एक्यूट हंगर का मतलब है- “जब कोई व्यक्ति पर्याप्त भोजन नहीं कर पाता है जिसके कारण उसकी जान या रोजी-रोटी तुरंत खतरे में पड़ जाती है।” यह अक्सर युद्ध, प्राकृतिक आपदाओं या आर्थिक संकट जैसे कारणों से शुरू होता है।
  • अकाल तब होता है जब “पांच में से कम-से-कम एक घर में खाने की अत्यधिक कमी हो। ऐसी भुखमरी और गरीबी के कारण बहुत गंभीर कुपोषण और मौत की नौबत आती है।” आधिकारिक तौर पर यूएन से मान्यताप्राप्त हंगर मॉनिटरिंग ऑर्गनाइजेशन इसे निर्धारित करता है। आइपीसी फेमिन फैक्टशीट देखें।

इंटीग्रेटेड फ़ूड सिक्योरिटी फ़ेज़ क्लासिफ़िकेशन सिस्टम (IPC) और उसका पार्टनर संगठन ‘कैडर हार्मोनिसे’ खाद्य असुरक्षा के स्तर का आकलन करता है। अफ़्रीका, एशिया, लैटिन अमेरिका और मिडिल ईस्ट के जो देश इसमें हिस्सा लेना चाहते हैं, उन देशों में खाद्य असुरक्षा के स्तर और गंभीरता का आकलन किया जाता है। देशों को कई स्तर में बांटा गया है। एक्यूट फ़ूड सिक्योरिटी के लिए एक से पांच के स्केल पर रखा जाता है। क्रोनिक फ़ूड इनसिक्योरिटी और एक्यूट मालन्यूट्रिशन के लिए भी कई स्केल पर रेट किया जाता है। वे अपनी वेबसाइट पर इन स्केल के बारे में पूरी जानकारी देते हैं।

देशों की रिपोर्ट ऑनलाइन पोस्ट की जाती है। समय-समय पर एक्सपर्ट्स की एक टीम और सहायता संगठनों के प्रतिनिधि होस्ट सरकारों के साथ मिलकर उन्हें अपडेट करते हैं। वे यूएन वर्ल्ड फ़ूड प्रोग्राम और बड़े इंटरनेशनल मानवीय एनजीओ को यह तय करने में मदद करते हैं कि किस तरह की मदद (जैसे खाना, दवा, बीज या कैश) कहां और कब भेजनी है।

अकाल को सबसे बुरी स्थिति समझा जाता है। लेकिन एक्यूट फ़ूड इनसिक्योरिटी स्केल पर हर स्टेप मौत की अधिक दर में बढ़ोतरी दिखाता है। यह प्रभावित आबादी के साइज़ के आधार पर भूख से जुड़ी हज़ारों मौतों को दिखा सकता है। यह भी ध्यान रखना ज़रूरी है कि इनमें से कई मौतें सीधे तौर पर भुखमरी से नहीं होतीं। ऐसी मौतों के पीछे खाने की कमी से कई तरह की बीमारियों का खतरा और गंभीरता बढ़ना होता है। डच थिंक टैंक ‘क्लिंगेनडेल’ की रिपोर्ट, ‘फ्रॉम हंगर टू डेथ’ में चार्ट 4, किलो कैलोरी की कमी और समय के हिसाब से इंसान के शरीर पर कुपोषण के असर को दिखाया गया है।

‘फ्रॉम हंगर टू डेथ’ रिपोर्ट 2024 : अलग-अलग एनर्जी इनटेक की कमी पर समय के साथ बीएमआई लेवल का चार्ट। इमेज : स्क्रीनशॉट, नीदरलैंड्स इंस्टीट्यूट ऑफ़ इंटरनेशनल रिलेशंस

भूख की जांच कैसे करें

आईपीसी के नंबर सिर्फ़ एक शुरुआती पॉइंट हैं। आईपीसी एक भरोसेमंद सोर्स है। लेकिन यह आपका अकेला सोर्स नहीं होना चाहिए। एक्यूट असेसमेंट वस्तुत:  अनाज, न्यूट्रिशन और मौत के डेटा पर निर्भर करते हैं। कुछ लोग इसे सिस्टम की ताकत मानते हैं। लेकिन इसे एक बड़ी कमज़ोरी भी समझा जाता है।  गाज़ा और सूडान जैसे कई युद्धग्रस्त क्षेत्रों सही डेटा इकट्ठा करना मुश्किल या नामुमकिन है।

रॉयटर्स की यह रिपोर्ट देखें। इसके अनुसार गाजा में इज़राइली बमबारी और आवागमन पर रोक के कारण कुपोषण, मौतों और अन्य ज़रूरी आंकड़े इकट्ठा करने में रुकावट आई है। सूडान में हिंसा, सेना और सरकार की रुकावटों और टेलीकम्युनिकेशन ब्लैकआउट के कारण कुपोषण की जांच करने, मौतों की गिनती करने और भोजन तक लोगों की पहुंच का सर्वे करने में रुकावट आई है। रॉयटर्स सीरीज़ में यह ग्राफ़िक भी दिया गया है। यह बताता है कि सिस्टम कैसे काम करता है? सूडान में यह कहां फेल हुआ? डेटा और जानकारियों के अन्य सोर्स के लिंक नीचे देखें।

उपलब्धता बनाम भूख

रूस ने फरवरी 2022 में यूक्रेन पर हमला किया था। इससे दुनिया के दो सबसे बड़े सप्लायर से अनाज और फर्टिलाइज़र का एक्सपोर्ट रुक गया। इसका ज़मीनी असर बहुत बुरा हुआ। खासकर उन गरीब परिवारों पर, जो अपनी कमाई का एक बड़ा हिस्सा खाने पर खर्च करते हैं।

एक्सेसिबिलिटी (पहुंच) और अवेलेबिलिटी (उपलब्धता) – यह दोनों अलग चीज हैं। लेकिन कई खबरों में इन दो अलग मुद्दों को मिला दिया गया। यह सच है कि रूस और यूक्रेन दुनिया के गेहूं एक्सपोर्ट के एक चौथाई से एक तिहाई के लिए ज़िम्मेदार थे। लेकिन ग्लोबल मार्केट में जो उपलब्ध है, वह ग्लोबल प्रोडक्शन का एक छोटा-सा हिस्सा है। दुनिया भर में पैदा होने वाला ज़्यादातर अनाज लोकल लेवल पर ही इस्तेमाल किया जाता है। इसमें गेहूं भी शामिल है।

मुख्य समस्या यह थी कि खाने की चीज़ों की कीमतें बढ़ गई, जबकि असली मज़दूरी कम हो गई थी। इससे भोजन बहुत महंगा हो गया था। सालों से प्रभावशीलता और पैदावार को बढ़ावा देने वाली कृषि नीति प्रमुख खद्य सामग्री के आयात पर निर्भर थी। इसलिए उन्हें अपनी आबादी को खिलाने के लिए अधिक कीमत चुकानी पड़ी। कोरोना महामारी और क्लाइमेट चेंज के कारण उत्पादन की अप्रत्याशित स्थितियों में युद्ध से पहले ही अनाज की कीमतें बढ़ रही थीं

गाज़ा एक और उदाहरण है, जहां भूख का मुख्य कारण यह नहीं है कि फसलें गायब हो गई हैं, बल्कि यह है कि खाने तक लोगों की पहुंच नहीं है। यहां खाद्य सामग्री तो है, लेकिन फसलों में कमी, इज़राइल की मदद पर रोक, पड़ोसी देशों से खाने की मदद रोकने और खाने की चीज़ों की बढ़ती कीमतों की वजह से लोगों को इसे पाना मुश्किल है।

आजकल की भूख अक्सर राजनीतिक नाकामी का नतीजा होती है, न कि अनाज की कमी का।

हंगर वॉशिंग और फ़ीड द वर्ल्ड का छलावा

‘हंगर वॉशिंग’ तब होती है जब राजनेता और मुनाफ़ाखोर लोग अनाज की कमी और भूख के डर का फ़ायदा उठाकर कुछ ऐसी पॉलिसी लागू करते हैं। यह अक्सर खाने की कमी के कारणों को बहुत आसान बना देती हैं या गलत तरीके से दिखाती हैं।

जैसे, कुछ लोग अक्सर इंडस्ट्रियल खेती को बढ़ाने, जेनेटिक मॉडिफिकेशन जैसी विवादित टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल करते हैं। ‘दुनिया को खाना खिलाने’ के लिए पर्यावरण के नियमों को खत्म करने की बात करते हैं। वे गरीबी, असमानता, युद्ध या कुशासन जैसे गंभीर मुद्दों को नज़रअंदाज़ कर देते हैं। यह असल में भूख को बढ़ाती है। इसी तरह, राजनेता अपनी ज़िम्मेदारी से बचने या ट्रेड डील, सब्सिडी या ऐसे दखल के लिए समर्थन जुटाने के लिए भूख की कहानियों का इस्तेमाल करते हैं। ऐसी चीजें मुख्य रूप से ताकतवर लोगों के फ़ायदे में काम आती हैं।

इसे ‘सस्ते अनाज का तरीका’ भी कहा जाता है। इसका असली जोर सस्ता और अधिक मात्रा में अनाज पाना है। इसमें इकोसिस्टम को खत्म करने, प्रदूषण और पोषक तत्वों से कम खाने जैसे साइड इफ़ेक्ट पर ज़्यादा ध्यान न देने की बात कही जाती है। ये बातें भूख से लड़ने की नैतिक ज़रूरत का इस्तेमाल करती हैं। लेकिन इसे खत्म करने के लिए असल में ज़रूरी संरचनात्मक सुधारों को नज़रअंदाज़ कर देती हैं।

मीट इंडस्ट्री अपने प्रदूषण फैलाने वाले बिज़नेस मॉडल को छुपाकर क्लाइमेट वॉशिंग कैसे कर रही है – मीट इंडस्ट्री के जनसंपर्क अभियान और लॉबिंग पर 2021 में DeSmog ने यह जांच की। इसमें कंपनियों और ट्रेड एसोसिएशन के सैकड़ों डॉक्यूमेंट्स और बयानों की समीक्षा की गई। इससे पता चला कि कैसे यह कहानी बनाई गई कि ऐसे उत्पादन दुनिया के पोषण के लिए बहुत ज़रूरी हैं। जबकि खेती के ग्रीनहाउस गैस एमिशन में जानवरों के बड़े योगदान के पीछे के साइंस पर सवाल उठाया गया। क्लाइमेट चेंज और बायोडायवर्सिटी, दोनों पर मीट प्रोडक्शन के असर को कम करके दिखाया गया।

इमेज: स्क्रीनशॉट, DeSmog

किसे फ़ायदा हो रहा है?

वैश्विक खाद्य मूल्य श्रृंखला के प्रमुख बिंदुओं पर कुछ बड़े निगम ही हावी हैं। इस दबदबे और शक्ति के केंद्रीकरण का सीधा प्रभाव लोगों की दैनिक भोजन की उपलब्धता और उसकी कीमत पर पड़ता है।

वर्टिकल, हॉरिजॉन्टल और बैकवर्ड इंटीग्रेशन ने कुछ कॉर्पोरेशन को हमारे फ़ूड सिस्टम को कंट्रोल करने दिया है। कुछ लोग इसे ‘ऑवरग्लास’ स्ट्रक्चर कहते हैं। इसमें कॉर्पोरेट बिचौलियों का एक छोटा सा हिस्सा कई छोटे प्रोड्यूसर और कंज्यूमर के बीच खाने के फ्लो पर नज़र रखता है। इससे प्रोड्यूसर के लिए गलत कॉन्ट्रैक्ट, खेत मज़दूरों के खस्ता हालात, ज़्यादा कीमतें और कंज्यूमर के लिए ज़्यादा सीमित पहुंच और कमज़ोर सप्लाई चेन होती हैं।

चैथम हाउस और यूएनईपी की एक रिपोर्ट (report) के मुताबिक, “सबसे बड़े कृषि-व्यवसायों की बाजार शक्ति, साथ ही कॉर्पोरेट राजनीतिक जुड़ाव के कमजोर या अनुपस्थित नियमन ने कुछ कृषि-व्यवसायों द्वारा नियतिगत कब्जे का मार्ग प्रशस्त किया है। ये लोग अपने निहित स्वार्थों की रक्षा करना चाहते हैं।

बड़ी तस्वीर देखें

फ़ूड सिस्टम एक ऐसा शब्द है, जो खाना उगाने, प्रोसेस करने, बांटने, इस्तेमाल करने से जुड़े सभी लोगों, प्रोसेस और इंफ्रास्ट्रक्चर के नेटवर्क को इंगित करता है। इनमें पॉलिसी, इकोनॉमिक्स और माहौल शामिल हैं जो इनके बीच संबंध बनाते हैं।

दुनिया भर में इंसानों द्वारा बनाए गए कुल ग्रीनहाउस गैस एमिशन के एक तिहाई हिस्से के लिए फ़ूड सिस्टम ज़िम्मेदार हैं, जो धरती को गर्म कर रहे हैं। फिर लंबे समय तक सूखे, ज़्यादा तेज़ और बार-बार आने वाले तूफ़ान और बाढ़, लगातार बढ़ते तापमान में योगदान देते हैं। इन आपदाओं से किसानों को अरबों डॉलर का नुकसान हो सकता है। ज़रूरी फसलों की कटाई कम हो सकती है। खेत में काम करने वालों के लिए जानलेवा काम करने की स्थिति पैदा हो सकती है । वैज्ञानिकों ने यह भी चेतावनी दी है कि वातावरण में कार्बन लेवल का घनत्व ज़्यादा होना फसलों को कम पौष्टिक बना सकता है। इसका मतलब है कि क्लाइमेट चेंज दरअसल भविष्य के फ़ूड प्रोडक्शन की मात्रा और गुणवत्ता, दोनों के लिए खतरा है।

हालांकि, लगातार बढ़ती भूख के लिए क्लाइमेट शॉक को ज़िम्मेदार ठहराना अधूरा है। अभी, सरकारें हर साल 460 बिलियन अमेरिकी डॉलर से ज़्यादा ऐसी पॉलिसी को सपोर्ट करने में खर्च करती हैं जो “अकुशल, असमान, अनाज के दाम बढ़ाने वाली, लोगों की सेहत को नुकसान पहुंचाने वाली और पर्यावरण को खराब करने वाली हैं।”

खबरों के लिए आइडिया

  • आपका देश या समुदाय भूख को कैसे माप रहा है? कौन से पैरामीटर इस्तेमाल किए जा रहे हैं? किन चीज़ों को नज़रअंदाज़ किया जा रहा है?
  • आपके समुदाय में भूख की मुख्य वजहें क्या हैं? क्या यह सच में खाने की कमी है या कुछ और कारण? जैसे, पौष्टिक आहार का न मिलना या महंगा होना? अगर यह महंगा है, तो ऐसा क्यों है? इसका फ़ायदा किसे हो रहा है?
  • ज़्यादातर सरकारें खेती पर सब्सिडी देती हैं। यह पता लगाना ज़रूरी है कि वे असल में किस चीज़ पर सब्सिडी दे रही हैं, और क्यों? क्या इससे समुदाय में भूख और कुपोषण का स्तर कम होगा।
  • इन सब्सिडी के मामले में एक सामान्य कमी होती है। यह ज़्यादा रिसोर्स वाली फसलों और जानवरों के ज़्यादा प्रोडक्शन को बढ़ावा देती हैं। पौष्टिक आहार की चीज़ों को बहुत कम सपोर्ट मिलता है। क्या आपके समुदाय में भी ऐसा ही है?
  • अगर आप किसी खेती करने वाले समुदाय में/उसके आस-पास रहते हैं, तो यह समझना फायदेमंद होगा कि क्या उगाया जा रहा है और किसके लिए। खेती की सारी पैदावार इंसानों या जानवरों के लिए नहीं होती। कुछ का इस्तेमाल इंडस्ट्रियल कामों के लिए किया जाता है।
  • लोगों के स्वास्थ्य पर डाइट के असर और सरकारी पॉलिसी (या उनकी कमी) कैसे भूख और कुपोषण के हालात पैदा कर सकती हैं, इसमें दिलचस्पी बढ़ रही है। लेटेस्ट EAT-लैंसेट रिपोर्ट ने शहरी इलाकों में तीन तरह के खाने के माहौल की पहचान की है – फ़ूड वॉइड्स (खाने की कमी वाला माहौल), फ़ूड डेज़र्ट (जहां पौष्टिक खाना मिलना मुश्किल है), और फ़ूड स्वैम्प (जहां अनहेल्दी और अल्ट्रा-प्रोसेस्ड खाना बहुत ज़्यादा, आसानी से और सस्ता मिलता है)। क्या आप इनमें से किसी जगह पर रहते हैं?
  • इमर्जिंग हंगर हॉटस्पॉट्स– इस सीरीज की खबरों में भूख के उभरते हुए हॉटस्पॉट को दिखाया गया। इसमें मध्य आय वाले देशों में बढ़ती खाद्य असुरक्षा पर रोशनी डाली गई।  पहले इन्हें मानवीय मदद की ज़रूरत नहीं पड़ती थी। खबरों में यह सवाल पूछा गया कि इन देशों की ऐसी हालत कैसे हुई। यह जांच किए बिना गंभीर रिपोर्टिंग का एक अच्छा तरीका है।
  • भूख के एंगल को समझने का एक और तरीका है फ़ूड सिस्टम के बड़े मुद्दों की जांच करना। फ़ूड सिस्टम को ज़्यादा स्वास्थ्यपूर्ण और स्वच्छ बनाने से तीन मुख्य और एक-दूसरे से जुड़ी चुनौतियां  जुड़ी हैं। इन नज़रियों का इस्तेमाल करके खाद्य असुरक्षा पर राजनीतिक बयानबाज़ी और असलियत के बीच की कमियों, ट्रेंड्स और अंतर को पहचानने में मदद मिल सकती है।
  • संरचनागत असमानता और शक्ति असंतुलन इस बात में अहम भूमिका निभाते हैं कि किसी समुदाय में खाद्य सुरक्षा है या नहीं। 2021 के यूएन फ़ूड सिस्टम्स समिट का यह कथन भूख की कहानियों और नंबरों को समझने के लिए याद रखने लायक है- “असमान संबंध और बाजारों, घरों, और नीति प्रक्रियाओं में शक्ति की गतिशीलता यह तय करती है कि संसाधनों तक पहुंच किन लोगों को मिलती है और किसे नहीं।” इससे यह निर्धारित होता है कि कौन भूखा और कुपोषित है और कौन नहीं।

भूख पर रिपोर्टिंग के टूल

महत्वपूर्ण रिपोर्ट्स 

  • द स्टेट ऑफ़ फ़ूड सिक्योरिटी एंड न्यूट्रिशन इन द वर्ल्ड (SOFI) – यूनाइटेड नेशंस के फ़ूड एंड एग्रीकल्चर ऑर्गनाइज़ेशन (FAO) की चार सहयोगी यूएन एजेंसियों के साथ मिलकर बनाई गई यह सालाना रिपोर्ट है। यह पिछले साल की भूख का ग्लोबल डेटा देती है। ग्लोबल रिपोर्ट प्रकाशित होने के बाद डेटा को रीजनल रिपोर्ट में बांटा जाता है। कुछ महीने बाद इसे भी प्रकाशित किया जाता है।
  • हंगर हॉटस्पॉट्स – यह ग्लोबल नेटवर्क अगेंस्ट फ़ूड क्राइसिस की साल में दो बार आने वाली रिपोर्ट है। यह मानवीय और विकास संबंधी एनजीओ का एक नेटवर्क है। यह गंभीर भूख पर फोकस करता है।
  • ज़्यादा अप-टू-डेट आंकड़ों के लिए अलग-अलग देशों की नेशनल सांख्यिकी भी चेक करें। फ़ूड एंड एग्रीकल्चर ऑर्गनाइज़ेशन (FAO) के SOFI में ऐसे डेटा को एक साथ करने से पहले रैपिड सर्वे डेटा या सिचुएशनल रिपोर्ट जारी करते हैं।

भूख का डेटा कैसे निकालें

इंटीग्रेटेड फ़ूड सिक्योरिटी फेज़ क्लासिफिकेशन सिस्टम (IPC): अफ्रीका, एशिया, लैटिन अमेरिका और मिडिल ईस्ट में खाद्य असुरक्षा के पैमाने और गंभीरता का आकलन करने वाली आधिकारिक इंटरनेशनल संस्था।

संयुक्त राष्ट्रसंघ

अनाज की कीमतों पर रखें नजर

अनुदान और खर्च पर नजर रखें

  • फाइनेंसिंग फ़्लो और फ़ूड क्राइसिस – यह एक वार्षिक प्रकाशन है। इसमें बताया जाता है कि खाद्य संकट से निपटने के लिए कितना पैसा कहां जा रहा है। इसे भूगोल, लाभुक देश और सेक्टर के हिसाब से ऑर्गनाइज़ किया जाता है।
  • रिलीफ़वेब – यह एक सूचना प्लेटफ़ॉर्म है। इसे यूएन ऑफ़िस की ओर से ‘फ़ॉर द कोऑर्डिनेशन ऑफ़ ह्यूमैनिटेरियन अफ़ेयर्स’ (OCHA) द्वारा चलाया जाता है। यह ग्लोबल ह्यूमैनिटेरियन क्राइसिस पर रिपोर्ट, प्रेस रिलीज़, मैप और इन्फोग्राफ़िक्स प्रदान करता है।
  • OCHA की फ़ाइनेंशियल ट्रैकिंग सर्विस – इसमें दुनिया भर में मानवीय संकट पर फंडिंग फ़्लो का डेटा मिलता है। इसमें किसी देश की मॉनिटरिंग के लिए उसके विकास पर नजर रखी जाती है। साथ ही, यह भी बताया जाता है कि पैसा कहां से आ रहा है और कहां जा रहा है।

अंतरराष्ट्रीय एनजीओ

  • एक्शन अगेंस्ट हंगर
  • AGRA (अलायंस फॉर ए ग्रीन रेवोल्यूशन इन अफ्रीका)
  • BRAC इंटरनेशनल
  • ब्रेड फॉर द वर्ल्ड
  • केयर इंटरनेशनल
  • डेनिश रिफ्यूजी काउंसिल
  • ग्लोबल अलायंस अगेंस्ट हंगर एंड पॉवर्टी
  • हेइफ़र इंटरनेशनल
  • हंगर प्रोजेक्ट
  • इंटरनेशनल कमिटी ऑफ़ द रेड क्रॉस
  • इंटरनेशनल फ़ूड पॉलिसी रिसर्च इंस्टीट्यूट, जो 14 ग्लोबल एग्रीकल्चरल रिसर्च सेंटर्स के CGIAR नेटवर्क का हिस्सा है
  • मेडिसिन्स सैंस फ्रंटियर्स
  • मर्सी कॉर्प्स
  • नॉर्वेजियन रिफ्यूजी काउंसिल
  • ऑक्सफैम इंटरनेशनल
  • पार्टनर्स इन हेल्थ
  • रिलीफ इंटरनेशनल
  • सेव द चिल्ड्रन
  • व्हाईहंगर
  • वर्ल्ड विज़न

जीआईजेएन के संसाधन


थिन लेई विन ‘लाइटहाउस रिपोर्ट्स’ के ‘फूड सिस्टम्स न्यूज़रूम’ की प्रमुख रिपोर्टर हैं। वह फूड सिस्टम्स न्यूज़लेटर ‘थिन इंक’ का समन्वय करती हैं। वह एक द्विभाषी समाचार एजेंसी ‘म्यांमार नाउ’ और म्यांमार पर केंद्रित एक नॉन-प्रॉफ़िट स्टोरीटेलिंग प्रोजेक्ट ‘द काइट टेल्स’ की सह-संस्थापक हैं।

 

 

डेबोरा नेल्सन पुलित्ज़र पुरस्कार विजेता पत्रकार हैं। ‘फिलिप मेरिल कॉलेज ऑफ़ जर्नलिज़्म’ (यूनिवर्सिटी ऑफ़ मैरीलैंड) में खोजी पत्रकारिता की प्रोफ़ेसर हैं। वह रॉयटर्स की एक इंटरनेशनल टीम का हिस्सा थीं जिसने 2024 में ‘द स्टार्विंग वर्ल्ड’ नामक सीरीज़ बनाई थी। इसमें ‘ग्लोबल हंगर रिलीफ़ क्राइसिस’ की जांच की गई थी।

अनुवाद : डॉ. विष्णु राजगढ़िया

 

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