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ट्रोल और ऑनलाइन उत्पीड़न का मुकाबला कैसे करें पत्रकार?

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एरिक लिट्के ने पंद्रह बरसों तक एक तेजतर्रार पत्रकार के बतौर काम किया। इस दौरान अपनी खबरों में जिन लोगों का भंडाफोड़ किया, उनकी नाराजगी कई रूपों में दिखती थी। कई बार उन्हें ईमेल और सोशल मीडिया में अनर्गल संदेश मिलते थे। पत्रकारों को अक्सर ऐसी समस्या का सामना करना पड़ता है।

लेकिन जब उन्होंने USA TODAY  और PolitiFact Wisconsin के लिए तथ्य-जांच शुरू की, तब ऐसे संदेशों की संख्या काफी बढ़ गई। वह हमेशा अपने सोशल मीडिया प्लेटफाॅर्म पर अपनी खबरें साझा करते थे। लेकिन पिछले तीन वर्षों में उन्हें काफी व्यक्तिगत और अपमानजनक संदेश मिलने लगे। उन्हें ऐसे संदेश अपने ही दायरे के बीच के लोगों की ओर से मिल रहे थे। PolitiFact फैक्ट-चेकिंग का यह काम Milwaukee Journal Sentinel और गैर-लाभकारी संगठन PolitiFact की साझेदारी के तहत किया जा रहा था।

एरिक लिट्के जब एक पत्रकार के बतौर खोजपूर्ण खबरें लिखते थे, तब अलग किस्म की प्रतिक्रिया आती थीं। लेकिन अब फैक्ट-चेकिंग की इस नई भूमिका में उन्हें अलग किस्म की प्रतिक्रिया देखने को मिल रही है। इस काम में वह पूरी निष्पक्षता के साथ तथ्य-जांच करते हैं। उनकी जांच के कारण कई बार फेसबुक को अपनी सामग्री को सुधारना पड़ता है। जानकार लोगों के अनुसार उनका यह काम काफी मायने रखता था। इसके बावजूद उन्हें सच उजागर करने के कारण ट्रोलिंग झेलनी पड़ती है। उन्हें कुछ लोगों के तर्कहीन और घटिया प्रतिक्रिया का सामना करना पड़ता है।

एरिक लिट्के कहते हैं- ”आम तौर पर बहुत से लोग तथ्यों और तर्कों और डेटा को गंभीरता के साथ समझने में रुचि नहीं रखते हैं। वे बस इतना ही देखते हैं कि आपने फलां व्यक्ति के बारे में ऐसी रिपोर्ट लिखी है, तो आप बहुत बुरे पत्रकार हैं, या बहुत अच्छे पत्रकार हैं।”

एक बार किसी अजनबी ने एरिक लिट्के को धमकी भरा ईमेल भेजा। यहां तक कि पुलिस को खबर करनी पड़ी। ऐसा उनके पत्रकारिता के करियर में पहले कभी नहीं हुआ था। यह इस बात का संकेत है कि चीजें कितनी खतरनाक मोड़ पर पहुंच गई हैं।

दुुनिया भर में दिख रही प्रवृतियां बताती हैं कि पत्रकारों पर पहले की तुलना में बढ़ते खतरों पर विचार करना जरूरी है। इनमें शारीरिक हिंसा, मानसिक उत्पीड़न, व्यक्तिगत सूचनाओं को उजागर करना, डिजिटल सुरक्षा का उल्लंघन और पत्रकारों की तस्वीरों में हेरफेर करके फर्जीवाड़ा करना शामिल है। ऐसी चीजें पत्रकारों के जीवन को भी खतरे में डालती हैं। इसके कारण उनकी स्वतंत्र अभिव्यक्ति सीमित हो सकती है। यहां तक कि उन्हें मीडिया का पेशा छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ सकता है। जिस तरह ऑनलाइन जगत में सच पर हमला हो रहा है, वैसे ही पत्रकार भी निशाने पर हैं। इसलिए उन्हें अपनी डिजिटल सुरक्षा के बारे में गंभीरता से सोचना चाहिए।

ऑनलाइन उत्पीड़न और दुष्प्रचार का आपसी संबंध

ऑनलाइन उत्पीड़न के तहत एक व्यक्ति या समूह द्वारा पत्रकारों को निशाना बनाया जाता है। इसमें अभद्र भाषा, यौन उत्पीड़न की धमकी, ईमेल या सोशल मीडिया एकाउंट्स की हैकिंग सहित कई प्रकार की रणनीति शामिल है। इसमें एक नई प्रवृति डॉक्सिंग भी है, यानी व्यक्तिगत सूचनाओं को ऑनलाइन फैलाना। ऐसा करके किसी व्यक्ति को डराने और बदनाम करने की कोशिश की जाती है। डॉक्सिंग के तहत कई बार किसी व्यक्ति का मोबाइल नंबर आॅनलाइन जारी कर दिया जाता है जिस पर अवांछित फोन करके परेशान किया जाता है।

महिला पत्रकारों को ऐसे हमलों का ज्यादा शिकार होना पड़ता है। UNESCO और International Center for Journalists की ताजा रिपोर्ट के अनुसार महिला पत्रकारों पर ऑनलाइन उत्पीड़न ज्यादा हो रहा है। लगभग 700 महिला पत्रकारों के बीच एक वैश्विक सर्वेक्षण में 73 फीसदी ने बताया कि उन्हें विभिन्न रूपों में ऑनलाइन हिंसा का शिकार होना पड़ा है।

उत्तरदाता महिला पत्रकारों ने बताया कि उन्हें विभिन्न रूपों में यौन हमले और शारीरिक हिंसा, डिजिटल सुरक्षा पर हमलों, तस्वीरों में छेड़छाड़, अपमानजनक और अवांछित संदेश, उनकी व्यक्तिगत प्रतिष्ठा और पेशेवर विश्वसनीयता को कमजोर करने का प्रयास और वित्तीय खतरों की धमकी मिली है। लगभग 40 फीसदी महिला पत्रकारों पर हुए हमले सुनियोजित दुष्प्रचार अभियानों से जुड़े थे।

नोरा बेनाविदेज ‘पेन अमेरिका‘ में फर्स्ट एमेंडमेंट एंड वोटिंग राइट्स एडवोकेट के बतौर कार्यरत हैं। इसके तहत पत्रकारों और न्यूज रूम को ऑनलाइन उत्पीड़न से सुरक्षा का प्रशिक्षण दिया जाता है।

नोरा बेनाविदेज ने कहा- ”ऑनलाइन उत्पीड़न आम तौर पर किसी दुष्प्रचार अभियान के साथ जुड़ा होता है। यह समाचार पत्रों और अन्य लोकतांत्रिक संस्थानों अथवा किसी पत्रकार को व्यक्तिगत रूप से बदनाम करने के लिए किया जाता है।”

वह कहती हैं- ”ऑनलाइन उत्पीड़न के विभिन्न तरीकों को हथियार के रूप में उपयोग किया जाता है। इसके तहत सच्ची खबरों को बदनाम करने और किसी मामले पर संदेह पैदा करने की रणनीति पर काम किया जाता है।”

आनलाइन उत्पीड़न और दुष्प्रचार, दोनों चीजें काफी सुनियोजित और समन्वित होती हैं। भले ही देखने में यह लगता हो कि किन्हीं अलग-अलग लोगों द्वारा ऐसा अनायास किया जा रहा हो। Media Manipulation Casebook के तहत कई मामलों की गंभीर जांच की गई है। इनसे पता चलता है कि ऑनलाइन उत्पीड़न और दुष्प्रचार अभियानों में परस्पर गहरा संबंध है। इसमें कोविड-19 के संबंध में भी कुप्रचार शामिल है। इस महामारी की शुरुआत में अश्वेत समुदायों के खिलाफ ऑनलाइन दुष्प्रचार चलाया गया था।)

‘पेन अमेरिका‘ में डिजिटल सुरक्षा कार्यक्रम निदेशक विक्टोरिया विल्क ने कहा – ”मुझे लगता है कि ऑनलाइन उत्पीड़न और दुष्प्रचार दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। दोनों का लक्ष्य हमारे परिदृश्य को प्रदूषित करने के लिए गलत सूचना फैलाना है। प्रतिष्ठित स्रोतों से आने वाली सटीक जानकारी को बदनाम किया जाता है। इसमें पत्रकारों को बदनाम करने और अविश्वसनीय साबित करने की कोशिश होती है। इस तरह पत्रकारों को डराना और चुप कराना इनका मकसद होता हैं।”

लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि ऑनलाइन उत्पीड़न और दुष्प्रचार दोनों चीजें हमेशा एक साथ हो। कोई जरूरी नहीं कि सभी ऑनलाइन उत्पीड़न हमेशा किसी अभियान का हिस्सा हों। कई बार यह किसी सुनियोजित साजिश के तहत नहीं होता, बल्कि किसी अराजक व्यक्ति की कार्रवाई होती है। कई बार सोशल मीडिया का कोई नाराज उपयोगकर्ता अपने गुस्से या उन्माद के तहत खुद ही ऐसा करता है।

ऑनलाइन उत्पीड़न और दुष्प्रचार, दोनों में काफी समानता के बावजूद इनमें फर्क समझना जरूरी है। दुष्प्रचार फैलाने के मामलों की जांच से बुरे प्रभाव पैदा करने वाले कई नेटवर्क का पता चलता है। जबकि सोशल मीडिया में आॅनलाइन उत्पीड़न पर अब तक वैज्ञानिक तरीके से पर्याप्त अध्ययन नहीं हुआ है। शोधकर्ताओं ने आम तौर पर ऑनलाइन उत्पीड़न के शिकार लोगों के मामलों पर शोध किया है। जबकि कुछ व्यक्तियों पर केंद्रित करने के बजाय ऐसी परिघटना की समग्र प्रक्रिया पर अध्ययन होना चाहिए।

विक्टोरिया विल्क ने कहा – ”ऑनलाइन उत्पीड़न की समुचित फोरेंसिक जांच नहीं होती। इसलिए हमारे पास पर्याप्त तथ्य उपलब्ध नहीं हैं। संभव हो कि किसी ऑनलाइन उत्पीड़न के पीछे किसी दुष्प्रचार नेटवर्क का हाथ हो। लेकिन हमारे पास ऐसे आनलाइन उत्पीड़न को किसी संगठित अभियान का हिस्सा साबित करने के लिए समुचित प्रमाण नहीं होते हैं।”

अपनी ऑनलाइन सुरक्षा मजबूत करें

स्थानीय पत्रकारों के सामने डाॅक्सिंग का खतरा अभी कम है। लेकिन राष्ट्रीय तथा अन्य देशों के पत्रकारों पर इसका काफी खतरा है। एरिक लिट्के कहते हैं- ”यह एक नए किस्म का उत्पीड़न का है। जिन लोगों को इसका प्रत्यक्ष अनुभव नहीं हुआ है, उन्हें यह खतरा वास्तविक नहीं लगता।”

जैसे-जैसे सार्वजनिक जीवन में गलत सूचनाओं और दुष्प्रचार का प्रभाव बढ़ता जाता है, पत्रकारों के ऑनलाइन उत्पीड़न की संभावना बढ़ती जाती है। ‘पेन अमेरिका‘ के Online Harassment Field Manual में ऐसे विषयों पर महत्वपूर्ण सुझाव दिए गए है। इसमें बताया है कि ऐसे उत्पीड़न के लिए काफी तैयारी की जानी है जबकि पत्रकारों के पास उससे बचाव अथवा प्रतिक्रिया उतनी प्रभावी नहीं है।

दक्षिण फ्लोरिडा में ‘सेमिनोल ट्रिब्यून‘ के पत्रकार डेमन स्कॉट के अनुसार दुष्प्रचार पर रिपोर्ट करना अन्य बीट्स से बिलकुल अलग है। 2020 में उन्होंने वैश्विक तथ्य-जांच संगठन First Draft की फेलाशिप के तहत काम किया था। इस दौरान डेमन स्कॉट ने गलत सूचनाओं और कुप्रचार के काफी मामलों की जांच की। इससे पहले उन्हें कभी ऐसे दुष्प्रचार का अनुभव नहीं हुआ था।

डेमन स्कॉट कहते हैं- ”पहले मैंने कभी गलत सूचना का विश्लेषण नहीं किया था। फेलोशिप के दौरान हमें काफी हैरान करने वाली चीजों का पता चला। यह पूरा अनुभव जितना मैंने सोचा था, उससे कहीं अधिक परेशान करने वाला था। यह काफी आंखें खोलने वाला था।”

डेमन स्कॉट ने महसूस किया कि सोशल मीडिया को प्रभावित करने वाली बड़ी संख्या में ऐसे लोग हैं, जो अपने मोबाइल फोन का बेहद गैर-जिम्मेदाराना उपयोग कर रहे हैं। ऐसे लोगों को काफी फाॅलोअर होने के कारण इनके द्वारा फैलाए गए कुप्रचार का बेहद नुकसानदायक असर होता है।

डेमन स्कॉट एक स्थानीय रिपोर्टर के रूप में कार्यरत हैं। वह पर्दे के पीछे रहकर मुख्यतया फ्लोरिडा से संबंधित गलत सूचनाओं पर न्यूजलेटर बनाते हैं। इसके कारण वह सीधे तौर पर सोशल मीडिया के खलनायकों के निशाने पर नहीं आते हैं। इसके बावजूद उन्हें अपनी डिजिटल सुरक्षा के बारे में चिंता थी। लिहाजा, उन्होंने अपने फेसबुक में सबको अनफ्रेंड करके अपना उपयोगकर्ता नाम बदल लिया। साथ ही, अपने फेसबुक एकाउंट को पेशेवर तरीके से अपनी सोशल मीडिया सुरक्षा को मजबूत किया।

उन्होंने कहा- ”ऐसा नहीं है कि इन फेसबुक, समूहों में किसी को पता नहीं चलेगा कि मैं कौन हूं। अगर कोई मुझे ट्रैक करने की कोशिश करे, तो पता लगा सकता है।”

एक सहयोगी नेटवर्क बनाना भी सक्रिय होने का अच्छा तरीका है। ठोस व्याख्यात्मक कार्य करने वाले पत्रकार अपने ऑनलाइन समुदायों में विश्वसनीय संसाधन बन जाते हैं। ऐसे में उन्हें हैकर्स और ट्रोल्स से कम खतरा होता है।

विक्टोरिया विल्क ने कहा- ”आपके पास एक अच्छा ब्रांड हो, तो आप सबको बता सकते हैं कि आपके साथ क्या हो रहा है। ऐसे मेें लोग आपकी सहायता के लिए आगे आएंगे। बेहतर होगा कि आप यह भी बताएं कि कैसी मदद चाहिए।”

उदाहरण के लिए, यदि सोशल मीडिया में आपके फर्जी एकाउंट बनाए गए हों, तो नागरिकों से इसके खिलाफ रिपोर्ट करने की अपील करें। ऐसे में उन फर्जी एकाउंट्स को जल्द हटा दिया जाएगा।

विक्टोरिया विल्क ने कहा- ”अपने फर्जी एकाउंट्स के बारे सबको बताना काफी महत्वपूर्ण है। आप साफ बताएं कि यह मैं नहीं हूं, कृपया इस खाते की रिपोर्ट करने में मेरी सहायता करें। मेरा फर्जी एकाउंट बनाया जा रहा है, कृपया इस पर विश्वास न करें।”

नोरा बेनाविदेज ने कहा कि आप सोशल मीडिया का उपयोग करके अपने पाठकों के नेटवर्क को अपनी समाचार संकलन की प्रक्रिया के संबंध में जागरूक करके अंतर्दृष्टि प्रदान करें। यह पत्रकारों के लिए अपनी सुरक्षा का सबसे अच्छा तरीका है।

उन्होंने कहा- ”ऐसे छोटे दिखने वाले तरीके आपको एक होमवर्क जैसा दिख सकते हैं। लेकिन ऐसी चीजें  आपके पाठकों के लिए काफी शक्तिशाली हो सकती है। जब कोई दुष्प्रचार अभियान आपको या आपके न्यूजरूम को निशाना बनाए, तो पाठक आपकी सुरक्षा में मदद कर सकते हैं।”

विक्टोरिया विल्क ने कहा- ”आप ऐसे आॅनलाइन उत्पीड़न करने वालों से खुद को एक कदम आगे रखें। इसके लिए अपने सोशल मीडिया अकाउंट्स को सुरक्षित करते हुए अपनी ऑनलाइन उपस्थिति को मजबूत करें। पत्रकारों के साथ यह खास बात है कि उन्हें चीजों की जांच करने का तरीका मालूम है। लेकिन वे कभी इसे खुद पर लागू नहीं करते हैं। उन्हें खुद एक डाॅक्सर की तरह सोचना चाहिए। आप अपने सोशल मीडिया एकाउंट्स में अपने फूटप्रिंट सर्च करके देखें कि उनमें क्या है।

ऐसे मामलों में पत्रकारों के लिए मुख्य सलाह इस प्रकार है:

  1. खुद को ‘गूगल सर्च‘ करें: विक्टोरिया विल्क ने कहा कि यह बात भले की हास्यास्पद लगे, लेकिन आप खुद को गूगल करके देखें। विभिन्न सर्च इंजनों में अपना नाम, खाता हैंडल, फोन नंबर और घर का पता डालकर सर्च करें। गूगल से शुरू करें, लेकिन वहां तक सीमित न रहें। गूगल प्रत्येक व्यक्तिगत उपयोगकर्ता के लिए अलग खोज परिणाम तैयार करता है। इसका अर्थ है कि कोई डाॅक्सर जब आपकी व्यक्तिगत जानकारी की खोज करेगा, तो उसे अलग परिणाम प्राप्त होंगे। इसलिए DuckDuckGo जैसे सर्च इंजन का उपयोग करें। यह उपयोगकर्ताओं की गोपनीयता को प्राथमिकता देता है। अपने ऑनलाइन फूटप्रिंट की संपूर्ण जानकारी के लिए चाइनीज सर्च इंजन Baidu का उपयोग करें।
  2. अलर्ट सेट करें: आप सोशल मीडिया में चौबीसों घंटे अपने नाम और व्यक्तिगत जानकारी के उल्लेख की निगरानी नहीं कर सकते। आपको ऐसा करने की आवश्यकता भी नहीं है। आप अपने नाम, सोशल मीडिया एकाउंट्स के हैंडल, फोन नंबर और घर के पते के लिए ‘गूगल अलर्ट‘ सेट कर दें। विक्टोरिया विल्क ने कहा कि इससे आपको यह पता चल जाएगा कि आपकी जानकारी ऑनलाइन प्रसारित हो रही है। आप अपने दोस्तों और परिजनों के लिए भी ऐसे अलर्ट सेट कर सकते हैं।
  3. अपनी ऑनलाइन उपस्थिति की ऑडिट करें:  सबसे जरूरी काम है अपने सोशल मीडिया अकाउंट्स की सेटिंग्स को कठोर करना। इससे ट्रोलिंग करने वालों को आपकी या परिजनों की व्यक्तिगत जानकारी नहीं मिल पाएगी। विक्टोरिया विल्क ने कहा कि आप किस सोशल मीडिया एकाउंट का उपयोग किस उद्देश्य से कर रहे हैं, इस पर सचेत रहें। यदि आप एक रिपोर्टर हैं और अपनी स्टोरीज शेयर करने, सहकर्मियों के साथ बने रहने और पाठकों से संवाद के लिए ट्विटर का उपयोग कर रहे हों, तो इसे पूरी तरह से पेशेवर रखें। यह आपकी बिल्ली की फोटो या रिश्तेदारों के साथ छुट्टियों की फोटो शेयर करने की जगह नहीं है। अगर आपने ऐसी सामग्री शेयर कर रखी हो, तो उसे डिलीट करना ही बुद्धिमानी है। अपना पता, जन्मदिन, मोबाइल फोन नंबर या ऐसी कुछ भी जानकारी शेयर न करें, जिसका दुरूपयोग आपको ट्रैक करने के लिए किया जा सकता है। यदि आप अपने कुत्ते और अपने बच्चे की तस्वीरें शेयर करना चाहते हैं, तो अपने इंस्टाग्राम की सेटिंग ‘प्राइवेट‘ कर दें। इसके बाद आप जो कुछ भी चाहते हैं, वहां डाल दें। लेकिन ऐसी चीजें आपके सार्वजनिक खातों से अलग होनी चाहिए। उन्होंने कहा।
  4. पुराने बायोडाटा की खोज करें:  इंटरनेट के प्रारंभिक दौर में काफी पत्रकारों और अकादमिक शोधकर्ताओं द्वारा व्यक्तिगत जानकारी सहित अपने बायोडाटा को व्यक्तिगत वेबसाइटों पर अपलोड करना आम बात थी। ऐसे पुराने दस्तावेजों की खोज करें जो अभी भी ऑनलाइन हैं। इनसे आपके खिलाफ सक्रिय डॉक्सरों को आपकी काफी जानकारी मिलने का खतरा होगा।
  5. डेटा ब्रोकरों को न भूलें:  एक पत्रकार के रूप में आप अपने महत्वपूर्ण स्रोतों तक पहुंचने के दौरान स्पोको और व्हाइटपेज जैसे डेटा ब्रोकर वेबसाइटों के संपर्क में आ सकते हैं। ऐसी वेबसाइटें व्यक्तिगत जानकारी के लिए इंटरनेट को खंगालती हैं और उसे बेचती हैं। इनसे डॉक्सरों को आपकी तलाश का एक आसान तरीका मिल जाता है। अगस्त 2020 तक की स्थिति के अनुसार वेबसाइट के सहायता पृष्ठ पर दिए गए निर्देशों का पालन करते हुए कोई भी उपयोगकर्ता Whitepages.com में अपनी व्यक्तिगत जानकारी हटाने का अनुरोध सकता है। जिन वेबसाइटों के पास कोई स्पष्ट प्रोटोकॉल नहीं हो, उन्हें आप ईमेल भेजकर मांग कर सकते हैं कि आपकी व्यक्तिगत जानकारी को हटा दिया जाए। यदि इन चीजों में आपका बहुत ज्यादा समय लगने वाला हो, तो आप DeleteMe या PrivacyDuck जैसी सदस्यता सेवा का उपयोग कर सकते हैं। हालांकि किसी पत्रकार के लिए इसका खर्च उठाना मुश्किल हो सकता है।
  6. अपना पासवर्ड मजबूत करें: यह केवल पत्रकारों के लिए नहीं, बल्कि सबके लिए है। यदि आप अपने सभी ऑनलाइन खातों के लिए अपनी जन्मतिथि का उपयोग करते हैं, तो अपने हैकर्स का रास्ता आसान कर रहे हैं। आपका पासवर्ड जितना लंबा होगा, उतना ही सुरक्षित होगा। Two-factor authentication दो-चरण प्रमाणीकरण और भी बेहतर है। प्रत्येक खाते के लिए एक अलग पासवर्ड का उपयोग करना बुद्धिमानी है।

न्यूजरूम अपने स्टाफ की सहायता कैसे करें:

ऑनलाइन उत्पीड़न और दुष्प्रचार के रूप में दो राक्षसों का मुकाबला करने का दायित्व सिर्फ पत्रकारों पर नहीं छोड़ना चाहिए।

यूनेस्को की रिपोर्ट के अनुसार कई मीडिया संस्थान अपने पत्रकारों पर होने वाले ऑनलाइन उत्पीड़न को गंभीरता से नहीं लेते। (ऑनलाइन उत्पीड़न के बारे में ‘पेन अमेरिका‘ की गाइड देखें।)

विक्टोरिया विल्क के अनुसार सभी पत्रकारों को इन चीजों पर काम करना जरूरी है। मीडिया संस्थानों को भी ज्यादा गंभीर होने की आवश्यकता है। सभी पत्रकारों को अपनी सुरक्षा के लिए बेहतर टूल और सुविधाओं से लैस करना चाहिए। यह एक बड़ी समस्या है। सिर्फ किसी पत्रकार की समस्या नहीं बल्कि पूरे संस्थान की समस्या के बतौर इसका समाधान होना चाहिए। दुष्प्रचार अभियान का सामना कर रहे पत्रकारों की मदद के लिए न्यूजरूम को स्पष्ट प्रोटोकॉल बनाने चाहिए।

उन्होंने कहा – ”इससे यह संदेश जाएगा कि दुष्प्रचार अभियान वास्तविक है और मीडिया संस्थान ने इसे गंभीरता से लिया है। इससे एक ऐसी संस्कृति बनेगी, जहां पत्रकार आगे आकर अपनी समस्या बताने में सहज महसूस करेंगे।”

विक्टोरिया विल्क ने मीडिया संस्थानों को लगातार इस दिशा में प्रेरित किया है कि पत्रकारों पर ऐसे खतरों को चिह्नित करने के लिए एक आंतरिक रिपोर्टिंग तंत्र बनाना चाहिए। इसके आधार पर किसी तकनीकी कंपनी, कानूनी सलाहकार की मदद लेना संभव होगा। जरूरत पड़ी तो किसी एक निजी सुरक्षा कंपनी की सहायता भी ले सकते हैं। विषम परिस्थितियों में पत्रकारों को क्या करना चाहिए, इस पर स्पष्ट दिशानिर्देश बनाना जरूरी है।

अगर किसी मीडिया संस्थान के पास ऐसे मामलों से निपटने के लिए कोई स्पष्ट दिशानिर्देश नहीं होता, तो अचानक आई किसी मुसीबत के समय अनावश्यक परेशानी होगी। ऐसे में किसे क्या करना है, यह स्पष्ट नहीं होने के कारण ज्यादा उलझन आएगी। लेकिन यदि आपके पास प्रोटोकॉल है तो आपको मालूम होगा कि संस्थान में किससे बात करनी है।

मीडिया संस्थान अपने पत्रकारों को साइबर सुरक्षा संबंधी विभिन्न सेवाओं की सब्सक्रिप्शन लेने में भी आर्थिक मदद कर सकते हैं। पत्रकारों के मानसिक स्वास्थ्य की देखभाल और कानूनी सलाह में भी मदद करनी चाहिए। अगर किसी पत्रकार के घर का पता शेयर करके असुरक्षा पैदा की गई हो, तो मीडिया संस्थान को समुचित सुरक्षा के उपाय करने चाहिए। विक्टोरिया विल्क ने ऐसे सुझाव देते हुए कहा कि ऐसे कदम जरूर उठाने चाहिए, हालांकि अब तक मीडिया संस्थानों ने इन चीजों पर पर्याप्त काम नहीं किया है।

जिन मीडिया संस्थानों के आर्थिक संसाधन सीमित हैं, वहां अपने पत्रकारों को ऐसी सुविधाएं प्रदान करना ज्यादा मुश्किल दिखता है। जब दुष्प्रचार और ऑनलाइन उत्पीड़न के कारण स्वतंत्र पत्रकारिता पर खतरा बढ़ रहा हो, तो इस पर समुचित ध्यान देना जरूरी है। विक्टोरिया विल्क के अनुसार यह बात संतोषजनक है कि कई समाचार संगठनों ने कोविड-19 महामारी के दौरान उच्चस्तरीय रिपोर्टिंग के लिए परस्पर भागीदारी की है। उन्होंने कहा कि साझेदारी की यही भावना अपने पत्रकारों को उत्पीड़न से बचाने के लिए भी लागू हो सकती है। कई मीडिया संस्थान मिलकर एक साझा सुरक्षा विशेषज्ञ की सेवा लेकर आंतरिक रिपोर्टिंग प्रणाली बना सकते हैं।

विक्टोरिया विल्क कहती हैं- ”मुझे लगता है कि भविष्य में यही होगा, क्योंकि दुष्प्रचार और आॅनलाइन उत्पीड़न अभियान कभी समाप्त होने वाले नहीं हैं।”

यह भी पढ़ें :

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Digital Self-Defense for Journalists: An Introduction

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यह लेख मूल रूप से विस्कॉन्सिन-मैडिसन विश्वविद्यालय में Center for Journalism Ethics की वेबसाइट पर प्रकाशित हुआ था। इसे अनुमति लेकर यहां पुनर्प्रकाशित किया गया है।

हॉवर्ड हार्डी  मैडिसन, विस्कॉन्सिन स्थित स्वतंत्र पत्रकार। उन्होंने 2020 में Wisconsin Center for Investigative Journalism और ‘फर्स्ट ड्राफ्ट’ फेलो के रूप में चुनाव रिपोर्टर के रूप में सोशल मीडिया की गलत सूचनाओं को कवर किया। उन्होंने कैलिफोर्निया में प्राकृतिक आपदा और वन स्वास्थ्य पर विस्तार से लिखा है।

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