रेखांकन: मार्सेल लौ

संपादकीय टिप्पणी: ‘डिजिटल खतरों की जांच‘ हेतु पत्रकारों के लिए जीआईजेएन गाइड प्रकाशित कर रहा है। इस गाइड का यह पहला अध्याय है। सितंबर 2023 में ग्लोबल इन्वेस्टिगेटिव जर्नलिज्म कॉन्फ्रेन्स में संपूर्ण गाइड जारी की जाएगी। 

पिछले 15 वर्षों में सोशल मीडिया नेटवर्क का अभूतपूर्व विकास हुआ है। दुनिया भर में काफी अधिक लोग ऑनलाइन आ चुके हैं। ऐसे उपयोगकर्ता अब सोशल मीडिया के दुरूपयोग में भी काफी माहिर हो गए हैं। दरअसल सोशल मीडिया प्लेटफॉर्मों ने इन खतरों से बचाव के लिए मॉडरेशन, सावधानी और अन्य सुरक्षा उपायों के लिए पर्याप्त खर्च नहीं किया है। सोशल मीडिया में झूठ और दुष्प्रचार फैलाने के रूप में नकारात्मक जनसंपर्क ने नया एवं व्यापक स्वरूप हासिल किया है। इसके कारण पारंपरिक प्रचार रणनीति की तुलना में झूठी सूचनाओं के प्रसार को नई गति मिल रही है। पत्रकारों द्वारा रिपोर्टिंग के दौरान कई तरह के नियंत्रण और संतुलन के साधन होते हैं। इसके कारण सही खबर सामने आती है। लेकिन सोशल मीडिया में ऐसी कोई प्रक्रिया नहीं होने के कारण गलत सूचनाओं के प्रसार की समस्या बढ़ रही है। इसलिए दुष्प्रचार और डिजिटल खतरों के बारे में पत्रकारों को जानना आवश्यक है।

एक महत्वपूर्ण बात ध्यान रहे। हमें ‘डिस-इन्फोरमेशन‘ (दुष्प्रचार) और ‘मिस-इन्फोरमेशन‘ (गलत सूचना) के बीच फर्क को समझना होगा। दोनों शब्दों का अक्सर एक ही अर्थ में उपयोग किया जाता है। लेकिन दोनों की परिभाषा के बीच बारीक अंतर है। खोजी पत्रकारों को यह फर्क अच्छी तरह समझना चाहिए। ‘मिस-इन्फोरमेशन‘ (गलत सूचना) का मतलब ऐसी झूठी या भ्रामक जानकारी से है, जिसे अनजाने में फैलाया जा सकता है। दूसरी ओर, ‘डिस-इन्फोरमेशन‘ (दुष्प्रचार) का मतलब किसी गलत जानकारी को जानबूझकर फैलाना है। इसमें जानबूझकर किसी समुदाय या आबादी के भीतर भय या संदेह फैलाने के लिए दुर्भावनापूर्ण सामग्री फैलाने की साजिश की जाती है। सोशल मीडिया के नकली खातों या वेबसाइटों के लिए ‘ऑनलाइन हेराफेरी‘ (मेनिपुलेशन) शब्द का उपयोग किया जा सकता है। ऐसे नकली खातों या वेबसाइटों द्वारा कई बार सही जानकारी फैलाई जाती है, लेकिन उसमें बेहद चालाकी से कोई हेराफेरी करके दुष्प्रचार भी कर दिया जाता है।

पिछले कुछ वर्षों में विभिन्न देशों में कई तरह के गोपनीयता कानून पारित हुए हैं। नए-नए सोशल मीडिया नेटवर्क का उदय हुआ है। ऑनलाइन हेराफेरी की समस्या के बारे में समझ भी बढ़ती जा रही है। इसलिए ऐसे मामलों की रिपोर्टिंग हम कैसे करें, इसका तरीका भी बदल रहा है। अब भी वेबसाइटों का दुरूपयोग झूठी जानकारी फैलाने के लिए किया जा रहा है। वीडियो और तस्वीरों का भी नए रूपों में काफी प्रभावशाली उपयोग किया जा रहा है। कई देशों में झूठी जानकारी फैलाने का सबसे महत्वपूर्ण प्लेटफार्म ‘फेसबुक‘ है। लेकिन टिकटॉक, टेलीग्राम और मैसेजिंग ऐप भी झूठ फैलाने या जानबूझकर भ्रम फैलाने के शक्तिशाली साधन बन गए हैं।

फोटो: आनाहिम (कैलिफोर्निया) में विडकोन 2022 के दौरान लगा टिकटोक का लोगो (प्रतीक)। टिकटॉक झूठ फैलाने और भ्रम फैलाने का एक शक्तिशाली माध्यम बन गया है। इमेज – एंथनी क्विंटानो, फ्लिकर/क्रिएटिव कॉमन्स

एक पत्रकार के बतौर ऐसे दुष्प्रचार और डिजिटल खतरों को समझना हमारा दायित्व है। आइए, देखा जाए कि हम इस विशाल पारिस्थितिकी तंत्र (इको-सिस्टम) में गहन जांच कैसे कर सकते हैं?

पहले हमें इसे सिर्फ एक पारिस्थितिकी तंत्र के रूप में देखना होगा। यह देखना होगा कि क्या कोई गलत सूचना किसी व्यक्ति की एक बार अनजाने में हुई चूक मात्र है? या फिर इसे जानबूझकर किसी नेटवर्क के जरिए प्रसारित किया जा रहा है। इन दोनों का फर्क हमें समझना होगा। पत्रकार को सबसे पहले यह पूछना चाहिए कि कोई फर्जी मैसेज क्या कोई इकलौता मामला है या बड़े पैमाने पर हेराफेरी (मेनिपुलेशन) का प्रयास किया जा रहा है। किसी पारिस्थितिकी तंत्र के कई पहलू हो सकते हैं। हमें अपनी जांच में इसे अच्छी तरह से परिभाषित करने के लिए सावधानी बरतनी चाहिए। इसका सबसे कारगर तरीका यह पता लगाना है कि एक ही संदेश को फैलाने के लिए विभिन्न सोशल मीडिया नेटवर्क पर जिन खातों का उपयोग हुआ, उनके बीच क्या संबंध है?

निम्नलिखित संकेतक (इंडिकेटर) और प्रश्नों पर विचार करें:

  • सोशल मीडिया के ऐसे खाते कब बनाए गए?
  • वह सामग्री कब साझा की गई?
  • विभिन्न प्लेटफार्मों पर उस सामग्री को किन लोगों ने फैलाया?
  • उन संदेशों में क्या समानता है?

संभव है कि एक वेबसाइट की उसी सामग्री को फेसबुक और ट्विटर इत्यादि हर जगह प्रचारित कर दिया गया हो। या फिर उस मुद्दे पर लगभग उसी भाषा में बोलने के लिए कुछ प्रभावशाली लोगों (इन्फ्लुएंसर) का टिकटॉक तथा अन्य माध्यमों में उपयोग किया गया हो। किसी संदेश को किस वक्त शेयर किया गया, इसकी जांच से भी कई बातों को पता चल सकता है। क्या एक समान विशेषताओं वाले खातों में कोई सामग्री कुछ ही मिनटों भीतर साझा की गई है, इसका पता लगा सकते हैं।

ऑनलाइन हेराफेरी की जांच के दौरान पता करें कि किसी संदेश की उत्पति कहां से हुई है? उसकी मंशा क्या है? इसका सही जवाब पाने के लिए सभी उपलब्ध पारंपरिक और डिजिटल तरीकों का उपयोग करें। सरकारी एजेंसियों या निजी निगमों द्वारा समर्थित ऐसे प्रचार अभियान तथा व्यक्तिगत लोगों के प्रचार के बीच फर्क होता है, जो किसी चीज पर वास्तव में यकीन करते हैं। ऐसे सभी प्रकार के डिजिटल हेरफेर का प्रभाव पड़ता है। लेकिन उसमें सफलता का स्तर कम या अधिक होता है। किसी दुष्प्रचार अभियान की शुरूआत कहां से हुई, उसके मूल तक पहुंचना हमेशा संभव नहीं होता है। आजकल अपने ग्राहकों की सुरक्षा को ध्यान में रखकर गलत सूचना फैलाने के लिए लॉन्ड्रोमैट के रूप में इस्तेमाल होने वाली सार्वजनिक जनसंपर्क कम्पनियों की संख्या बढ़ी है। इसके कारण वेब पर असल में कौन है, यह पता लगाना पहले से ज्यादा मुश्किल हो चुका है। कोई संदेश किन लोगों के दौरान प्रचारित किया जा रहा है, इसकी तह में जाना आपके लिए चुनौती है।

डिजिटल दुष्प्रचार एक शक्तिशाली उपकरण है। इसका दुरूपयोग धर्म, जाति या नस्ल के नाम पर जनसंहार , हिंसा और युद्ध की मानसिकता तैयार करने के लिए किया जाता है। डिजिटल दुष्प्रचार ने दुनिया भर में स्वास्थ्य देखभाल प्रणालियों पर प्रभाव डाला है । पिछले एक दशक में प्रमुख चुनावों में भी डिजिटल दुष्प्रचार ने बड़ी भूमिका निभाई है । डिजिटल दुष्प्रचार के कारण प्रेस की स्वतंत्रता में भी कमी आई है  ।

इसलिए डिजिटल दुष्प्रचार अपना असर दिखाए, इससे पहले ही पत्रकारों को इसकी पहचान करनी चाहिए। आपको समझना होगा कि किन समुदायों को निशाना बनाया जा सकता है। ऐसी रिपोर्टिंग के लिए आपको चारों ओर देखना और समझना होगा कि समस्या किस गहराई तक पहुंची है। ऑनलाइन हेराफेरी के लिए हमारे समाज में मौजूद धार्मिक, जातीय, नस्लीय तथा अन्य विभाजनों और पूर्वाग्रहों का इस्तेमाल किया जाता है। उन चीजों को और अधिक बढ़ावा दिया जाता है। अक्सर यह बेहद खतरनाक रूप से किया जाता है। उन विभाजनों को समझे बिना हम डिजिटल हेराफेरी और दुष्प्रचार पर रिपोर्ट नहीं कर सकते।

नीचे बताए गए उपकरणों और दृष्टिकोण के जरिए आप किसी सूचना का  सच उजागर करने और डेटा को करीब से देखने का प्रयास कर सकते हैं। लेकिन यह पारंपरिक पत्रकारिता की कड़ी मेहनत का विकल्प नहीं है और न ही उनका ऐसा इरादा है। ऑनलाइन हेराफेरी पर रिपोर्टिंग का सबसे अच्छा तरीका यह है कि आप ऑनलाइन खोजी तकनीक का उपयोग करते हुए इसके साथ पुराने जमाने के स्रोत कार्य और दस्तावेजीकरण का भी उपयोग करें। इसमें एक अच्छी खबर यह है कि इस खोज में आप अकेले नहीं हैं। शोधकर्ताओं, पत्रकारों और शिक्षाविदों की बड़ी संख्या है, जो ऑनलाइन हेराफेरी के हानिकारक पहलुओं को उजागर कर रहे हैं। इस गाइड को पढ़कर आप भी उनमें से एक बन रहे हैं। इस काम में किसी से मदद मांगने और किसी का सहयोग करने में कभी हिचकिचाएं नहीं।

व्यवस्थित रहें – अपनी जांच शुरू करने से पहले आप यह तय करें कि जिन सोशल मीडिया खातों और अन्य ऑनलाइन संस्थाओं की आप जांच कर रहे हैं, उन पर नजर कैसे रखेंगे? ब्राउजर टैब का उपयोग करने की एक सीमा है। अपनी जांच को व्यवस्थित करने और सामग्री संग्रहित करने के लिए एक प्रणाली होना महत्वपूर्ण है। इसके लिए ‘हंचली‘ (Hunchly), एक सशुल्क टूल है। इसमें ऑटो-आर्काइविंग क्षमता होने के कारण इसे पसंद किया जाता है। इसके अलावा आप एक ही स्थान पर खातों, वेबसाइटों, तस्वीरों, वीडियो और अपनी रुचि की किसी भी सामग्री को संकलित करने के लिए एक विस्तृत स्प्रैडशीट बना सकते हैं। अलग-अलग पोस्ट के लिए खाता निर्माण की तारीख और प्रकाशन की तारीख और समय दर्ज करें ताकि आप समयरेखा आसानी से देख सकें। अपनी जांच के लिए ऐसी जानकारी एकत्र करने के दौरान स्क्रीनशॉट लेना और नोट्स लेना भी जरूरी है। ध्यान रहे, किसी भी पोस्ट और किसी भी खाते को किसी भी समय हटाया जा सकता है।

जिस विषय की जांच करनी है, उस पर नजर रखना और अपने विचारों को व्यवस्थित करना भी महत्वपूर्ण है। आप अपने नोट्स और स्क्रीनशॉट संग्रहित करने के लिए केंद्रीय भंडार के रूप में एक या अधिक गूगल डॉक्स का उपयोग कर सकते हैं। ऐसी सामग्री को सार्वजनिक रूप से संग्रहित करना भी महत्वपूर्ण है। ‘इंटरनेट आर्काइव‘ (Internet Archive) में साइन अप करके आप अपना खाता बना सकते हैं। इससे आप उसके मुफ्त बल्क आर्काइविंग टूल का उपयोग कर सकते हैं। यह गूगल शीट्स से जुड़ता है और आपके द्वारा जुटाए गए प्रत्येक लिंक को सहेजता (सेव करता) है। किसी जानकारी का ट्रैक रखने के लिए स्क्रीनशॉट की तुलना में ‘इंटरनेट आर्काइव‘ ज्यादा बेहतर तरीका है। इसमें हेरफेर करना मुश्किल है। इसमें लिंक को आर्काइव करने के बाद अपनी रिपोर्टिंग में उस सामग्री को आप लिंक भी कर सकते हैं। हालाँकि फेसबुक, इंस्टाग्राम और लिंक्ड-इन जैसे कई सोशल मीडिया नेटवर्क में आर्काइव करना मुश्किल है। उनके लिए आप एक अलग स्क्रीनशॉट फोल्डर रख सकते हैं। यह भी ध्यान रखें कि वीडियो स्वचालित रूप से आर्काइव नहीं होते हैं। आपको उन्हें एक अलग फोल्डर में भी रखना होगा।

समुदाय को समझें – दुष्प्रचार करने वालों की एक सामान्य रणनीति होती है। वे किसी देश या समुदाय में मौजूदा सामाजिक विभेद के किसी मुद्दे की पहचान करके उनके बीच तनाव और विभाजन को बढ़ाते हैं। सोशल मीडिया में लोगों को आकर्षित करने के लिए विभाजनकारी या पक्षपातपूर्ण सामग्री पोस्ट की जाती है। इसलिए यह समझना जरूरी है कि किन समुदायों को इस दुष्प्रचार का निशाना बनाया जा रहा है। वैसे लक्षित समुदायों के लोगों से बात करें और उनकी वास्तविकता को समझने का प्रयास करें। इन मुद्दों के कारण क्या हुआ और क्या दुष्प्रचार का प्रयास सफल हुआ? ऐसी कौन सी सामग्री है, जो चालाकी भरी लगती है? इस तरह की डिजिटल हेराफेरी वाली सामग्री में खुद को डुबोकर आप गलत सूचनाओं को समझने में सक्षम होंगे। कई मामलों में आप ऐसे दुष्प्रचार को फैलने से पहले ही रोक सकते हैं।

दुष्प्रचार का संभावित असर क्या होगा, इस पर विचार करें- किस प्रकार के दुष्प्रचार को उजागर करना है, यह तय करने का भी एक विज्ञान है। एक ओर आप इसके सच का प्रसार कर सकते हैं। दूसरी ओर, आप दुष्प्रचार अभियान को विफल कर सकते हैं। अपने खुद से पूछें कि किसी गलत संदेश का संभावित प्रभाव कितना गंभीर हो सकता है? क्या वह गलत संदेश पारिस्थितिकी तंत्र से बाहर या समुदाय में चला गया है? क्या इससे किसी शारीरिक नुकसान की संभावना है? क्या इसे पोस्ट करने वालों को आर्थिक रूप से लाभ हुआ है? क्या इसे किसी विशेष प्रभावशाली व्यक्ति द्वारा फैलाया गया था? ऐसा निर्णय एक टीम के रूप में लिया जाना चाहिए। इसमें सभी संभावित हानियों और लाभों पर विचार करना चाहिए।

आपकी रिपोर्ट से दुष्प्रचार को फैलने का अवसर न मिले- किसी झूठ का सच बताने में सावधानी जरूरी है। वरना अनजाने में उस दुष्प्रचार को ही वायरल करने की गलती हो सकती है। इसलिए किसी झूठी जानकारी को उजागर करने के लिए आपको जिम्मेदार रिपोर्टिंग की सर्वोत्तम प्रथाओं का पालन करना चाहिए। उदाहरण के लिए, यदि आप एक तथ्य-जांच (फैक्ट-चेक) लिख रहे हैं, तो शीर्षक में सटीक जानकारी डालें। पाठ के मुख्य भाग में ‘सच का सैंडविच‘ बनाएं। यानी ‘सच-झूठ-सच‘ के नियम का पालन करें। पहले उस मामले का सच बताएं। फिर लिखें कि इस पर क्या झूठ फैलाया जा रहा है। इसके बाद दुबारा उसका सच बताएं। इस तरह झूठ को सच के बीच सैंडविच के रूप में दबा दें। इससे पाठकों को झूठी जानकारी के बजाय सच याद रखने में मदद मिलेगी। कोई लिंक भेजते समय अपने पाठकों को गलत सूचना का आर्काइव संस्करण भेजें ताकि वैसी सामग्री को ट्रैफिक लाने से रोका जा सके। यदि आप किसी स्क्रीनशॉट का उपयोग करते हैं, तो उस फोटो पर लाल रंग से क्रोस का चिन्ह बना दें या ‘फेक‘ शब्द लिख दें। आपका लक्ष्य यह सुनिश्चित करना है कि आपकी जांच से कोई नुकसान नहीं हो। ऐसा करके आप अनजाने में गलत या हानिकारक दुष्प्रचार को आगे फैलने से रोकते हैं।

अधिकतम सबूत जुटाने का प्रयास करें- किसी दुष्प्रचार के पीछे कौन लोग हैं, इसका पता लगाने के लिए गहन जांच करें। उदाहरण के लिए, कई फर्जी ट्विटर खाते एक ही वेबसाइट की सामग्री को एक साथ साझा करते हैं। जबकि उस वेबसाइट में भ्रामक जानकारी की भरमार होती है। उसका डोमेन रिकॉर्ड देखने से पता चलता है कि वह रूस में पंजीकृत है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि इसके पीछे रूसी प्रचार अभियान ही है। ऑफलाइन जाँच वाली परंपरागत रिपोर्टिंग की तरह डिजिटल जाँच में भी आप जितने अधिक प्रमाण जुटाएंगे, आपकी रिपोर्ट उतनी ही बेहतर होगी। जब तक आपके पास अपनी बात को साबित करने के लिए पर्याप्त सबूत नहीं हैं, तब तक किसी पर उंगली न उठाएं।

इसलिए अधिक सबूत जुटाने के लिए आप फेसबुक में भी शेयर की गई उस वेबसाइट की सामग्री की जांच करें। किसी पोस्ट के ‘पेज ट्रांस्पेरेंसी‘ बॉक्स में जाएं। क्या सभी ‘एडमिनिस्ट्रेटर‘ रूस के हैं? क्या कोई रूसी जनसंपर्क कंपनी उसकी ‘पेज आॅनर‘ है। ऐसा करने पर आपके पास ज्यादा सबूत होंगे। लेकिन अभी एक और चुनौती है। किसी पेज के डिजिटल सिग्नल, यानी उसके डोमेन रिकॉर्ड और फेसबुक पेज मैनेजर इत्यादि की जानकारी में भी फर्जीवाड़ा किया जा सकता है। इसलिए आप वैसी एजेंसी के पूर्व कर्मचारियों की तलाश करें, जो किसी ऑपरेशन का विवरण बता सकते हैं। उनसे पता चल सकता है कि जनसंपर्क फर्म का मालिक कौन है। उनसे अन्य जानकारी की भी पुष्टि करें। अब आपके पास किसी दुष्प्रचार अभियान को संचालित करने वाली एजेंसी को उजागर करने के लिए पर्याप्त सबूत होंगे। हमेशा अपने आप से पूछें कि इस दुष्प्रचार ऑपरेशन के पीछे कौन है? क्या हमें जिस पर संदेह है, उसके बदले कोई और हो सकता है? क्या हमारे पास अकाट्य प्रमाण है?

दुष्प्रचार के मकसद का पता लगाएं- दुष्प्रचार एक रणनीति है। इसका उपयोग वित्तीय या राजनीतिक लाभ के लिए किया जाता है। कुछ ताकतें अपना वर्चस्व स्थापित करने या किसी कानून को बदलने के लिए भी ऐसा करती है। यदि आपको किसी ऑनलाइन दुष्प्रचार अभियान चलाने वाले किसी व्यक्ति का नाम मिल गया है, तो इतने पर ही संतुष्ट न हों। दुष्प्रचार फैलाने वाली कंपनियों तथा उसे मिले चंदे या दान के रिकॉर्ड के अलावा राजनीतिक संबद्धता की भी जांच करें। दुष्प्रचार के मकसद का पता लगाने में आप जितना सफल होंगे, आप सच्चाई के उतने ही करीब पहुंचेंगे।

सोशल मीडिया के विभिन्न प्लेटफॉर्म पर जांच करें- पत्रकार आम तौर पर सिर्फ ऐसे प्लेटफॉर्म का अध्ययन करते हैं, जो सहज सुलभ हैं। इसमें ट्विटर प्रमुख है। ज्यादातर शोध इसमें ही किया जाता है। अन्य प्लेटफार्मों की तुलना में इसका डेटा हासिल करना आसान होता है। हालांकि ट्विटर के एपीआई एक्सेस में नए बदलावों के कारण अब ऐसा नहीं है । यूट्यूब या पॉडकास्ट जैसे प्लेटफॉर्म पर अपेक्षाकृत कम जांच की जाती है। पत्रकार को किसी सामग्री जांच के लिए सबको देखना चाहिए। जिस प्लेटफॉर्म से हम कम परिचित हैं या जिनके लिए अधिक समय लगाने की आवश्यकता है, उनसे दूर रहकर हम अपनी जांच के लिए महत्वपूर्ण जानकारी खो सकते हैं। सोशल मीडिया पर कोई भी व्यक्ति केवल एक प्लेटफॉर्म तक सीमित नहीं रहता है। इसलिए रिपोर्टर को भी एक तक सीमित रहने के बजाय हर प्लेटफॉर्म पर जांच करनी चाहिए।

एडवांस्ड सर्च करें- ऑनलाइन जांच के उपकरण काफी अस्थिर हैं। आप उनके भरोसे नहीं रह सकते। वे सोशल मीडिया के अधिकारियों की पर निर्भर हैं, जो किसी भी समय सार्वजनिक रूप से सुलभ डेटा के प्रकार को बदल सकते हैं। इसलिए जांच के लिए केवल उपकरणों पर निर्भर रहना उचित नहीं। इसलिए आप एडवांस्ड सर्च करें। यह किसी भी जांच में उपयोगी है। ताजा समाचारों स्थितियों पर नजर रखने के लिए ‘ट्वीटर एडवांस्ड सर्च‘ का उपयोग करें। ‘गूगल एडवांस्ड सर्च का उपयोग करने पर आपको वैसी वेबसाइटों से भी जानकारी प्राप्त मिल सकती है, जहां तक पहुंचना अपाके लिए अन्यथा कठिन हो सकता है। सर्च करना किसी भी डिजिटल खोजी कार्य का प्रमुख काम है। इसके लिए आपको प्रश्न तैयार करने और विभिन्न प्लेटफार्मों का उपयोग करने में कुशल होने की आवश्यकता है। इसकी जानकारी के लिए जीआइजेएन के पास एक शानदार ट्यूटोरियल है।

जंकीपीडिया टूल – इसे ‘एल्गोरिद्मिक ट्रांसपेरेंसी इंस्टीट्यूट‘ (Algorithmic Transparency Institute) ने विकसित किया है। ‘जंकीपीडिया‘ को गलत सूचना और ‘जंक न्यूज‘ की निगरानी के लिए डिजाइन किया गया था। लेकिन इसका दायरा बढ़ाया जा रहा है। इस साल के अंत में इसे एक नया नाम मिलेगा। यह अब उपयोगकर्ताओं को ‘गेटर‘ और ‘गैब‘ जैसे फ्रिंज साइटों सहित एक दर्जन विभिन्न प्लेटफार्मों से सोशल मीडिया खातों की सूची पर नजर रखने और बनाने की अनुमति देता है। टिकटॉक, फेसबुक और टेलीग्राम के लिए भी यह उपयोगी है। जंकीपीडिया स्वचालित रूप से अंग्रेजी भाषा के पॉडकास्ट को ट्रांसक्राइब और सर्च कर सकता है। जीआईजेएन ने ‘जंकीपीडिया‘ की सर्च क्षमता पर विस्तृत जानकारी दी है

वी-वेरीफाई टूल (WeVerify)- यह भी एक विश्वसनीय और अनोखा टूल है। इसे फैक्ट-चेकर्स द्वारा फैक्ट-चेकर्स के लिए बनाया गया है। आप ‘रिवर्स सर्च‘ के जरिए तस्वीरों या वीडियो की जांच के लिए इसका उपयोग कर सकते हैं। इससे आप हेराफेरी की गई तस्वीरों की जांच और तुलना कर सकते हैं। इस ‘वी-वेरीफाई टूल‘ के जरिए आप ट्विटर विश्लेषण भी कर सकते हैं। यह फैक्ट-चेक करने वाले पत्रकारों के लिए शानदार हथियार है। यह उन्नत विकल्पों के साथ काफी अच्छा काम करता है। यदि आपके पास ऑफिस का ईमेल पता है, तो इसके निःशुल्क खाते के लिए साइन अप कर सकते हैं।

दुष्प्रचार की जांच के लिए कई और उपकरण हैं। ऑनलाइन हेराफेरी पर रिपोर्टिंग का दायरा लगातार बढ़ रहा है। जैसे-जैसे सोशल मीडिया कंपनियां विकसित होती हैं, उसके साथ हमारी पत्रकारिता भी विकसित होनी चाहिए। हमेशा नए तरीकों की तलाश करें। आपने यहां जो सीखा है, वह सिर्फ एक शुरुआत है।

केस स्टडीज

यूक्रेन – यूक्रेनी खोजी संस्थान ‘टेक्स्टी‘ के एक जांच प्रोजेक्ट का उदाहरण देखें। इसमें दिखाया गया कि यूक्रेन पर रूस के बड़े आक्रमण के तुरंत बाद किस तरह नकली ‘टेलीग्राम‘ चैनल बनाए गए थे। इन चैनलों को स्थानीय समाचार स्रोतों के रूप में पेश किया गया था। लेकिन वास्तव में रूस के पक्ष का प्रचार करने और कब्जाधारियों के समर्थन के लिए इनका इस्तेमाल किया गया था। जांच में पाया गया कि क्षेत्र मुक्त होते ही इन ‘टेलीग्राम‘ चैनलों ने काम करना बंद कर दिया। टेलीग्राम डेटा सभी सामाजिक नेटवर्कों में सबसे अधिक सुलभ है। आपको संपूर्ण चैनल की फीड डाउनलोड करने या इसकी सामग्री और जुड़ाव के बारे में डेटा एकत्र करने के लिए विशेष उपकरणों की आवश्यकता नहीं है। ‘टेक्स्टी‘ ने टेलीग्राम डेटा के आधार पर जमीन पर सैनिकों के बीच संबंध और ऑनलाइन प्रचार की जांच की।

फोटो: रूस की शुरुआती सैन्य हमले के दौरान ‘टेक्स्टी‘ ने टेलीग्राम चैनल की जांच की। इमेज- स्क्रीनशॉट, टेक्स्टी

फिलिस्तीन: 2021 में इजरायली सेना ने अल-अक्सा मस्जिद पर हमला करके 150 से अधिक लोगों को घायल कर दिया। इसके बाद इजरायल और फिलिस्तीन ने युद्धविराम कर लिया। लेकिन इसके बावजूद ऑनलाइन तरीकों से नफरत फैलाने का सिलसिला जारी रहा। एक शोधकर्ता ने इन प्रवृतियों को ‘ऑनलाइन-प्रेरित लिंचिंग‘ की संज्ञा दी। दुष्प्रचार की जांव और निगरानी करने वाले समूह ‘फेक रिपोर्टर‘ ने तेल अवीव के दक्षिण में एक समुद्र तटीय शहर बैट याम में एक जांच की। टीम ने अरबों पर हमलों का समन्वय करने वाले 100 से अधिक व्हाट्सएप और टेलीग्राम हिब्रू-भाषा समूहों पर जांच की। इससे पता चला कि हिंसा के आह्वान के कारण वास्तविक हिंसा भड़क उठी। एक आदमी को अरब वासी होने के कारण समुद्रतट के रास्ते में पीटा गया। वह चार लोगों का पिता था। उसे अस्पताल में भर्ती कराया पड़ा। इजराइल की कुछ प्रमुख हस्तियों और इस मामले की रिपोर्टिंग करने वाले मीडिया संस्थानों ने नफरत फैलाना जारी रखा। ऑनलाइन माध्यमों से भी नफरत फैलाई गई। यह पता लगाना मुश्किल था कि टेलीग्राम और व्हाट्सएप में ऐसे नफरती ग्रूप किन लोगों ने शुरू किए। लेकिन इस मामले ने स्पष्ट रूप से दिखाया कि कैसे ऑनलाइन हेराफेरी के कारण नफरत फैलती है। यह वास्तविक दुनिया को नुकसान पहुंचाती है।

संयुक्त राज्य अमेरिका: पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने वर्ष 2020 के चुनाव में धोखाधड़ी के फर्जी दावे किए। इसके कारण छह जनवरी को व्हाइट हाउस में हिंसा और अराजकता की अभूतपूर्व घटना हुई। इस पर ‘न्यूयॉर्क टाइम्स‘ के जिम रुटेनबर्ग की खोजी रिपोर्ट महत्वपूर्ण है। इसमें रिपब्लिकन पार्टी द्वारा वर्ष 2016 से 2020 के चुनाव से ठीक पहले तक लोकतांत्रिक संस्थानों को कमजोर करने के प्रयासों का वर्णन है। रिपोर्ट में कई राज्यों से जुड़े झूठे दावों की जांच की गई है। रिपोर्ट में उन कानूनी बदलावों की भी जानकारी दी गई है, जिनका उपयोग गलत को सही ठहराने के लिए किया गया था। राजनीतिक शक्ति से जुड़ी गलत सूचनाओं को कैसे समझा जाए, इस पर यह एक शानदार रिपोर्ट है।

कांगो लोकतांत्रिक गणराज्य: यह बेहद खतरनाक उदाहरण है। कांगो के कुछ फेसबुक पेज चलाने वालों ने कोविड-19 महामारी के दौरान एक भयानक दुष्प्रचार अभियान शुरू किया। इनलोगों ने कोविड टीका-विरोधी प्रचार को बढ़ावा दिया। इसके तहत फर्जी इलाज के बारे में भी साजिश के सिद्धांतों को फैलाया गया। ऐसे झूठ को सच साबित करने के लिए कई बड़ी हस्तियों के झूठे उद्धरणों का हवाला दिया गया। यहां तक कि फ्रांसीसी संक्रामक रोग विशेषज्ञ तथा डब्ल्यूएचओ के निदेशक और मेडागास्कर तथा फ्रांस के राष्ट्रपतियों के भी फर्जी उद्धरणों का सहारा लिया गया। फ्रांस-24 ऑब्जर्वर टीम ने जांच के दौरान किंशासा के एक 20 वर्षीय छात्र का पता लगा लिया। उसने स्वीकार किया कि झूठ फैलाने के पीछे उसका मकसद सोशल मीडिया में अपने पेजों की उपस्थिति बढ़ाना था।

फिलीपींस: यह किसी मीडिया की स्टोरी नहीं बल्कि एक अकादमिक रिपोर्ट है। यह फैक्ट-चेकरों के लिए महत्वपूर्ण है। लेखक जोनाथन कॉर्पस ओंग और सैमुअल कैबबाग ने फिलीपींस में वर्ष 2019 के चुनाव में फर्जी नाम वाले ट्रोल की भूमिका का खुलासा किया। वे पाते हैं कि ऑनलाइन विमर्श चलाने और राजनीतिक संदेश को बढ़ावा देने के लिए इंटरनेट काफी महत्वपूर्ण है। इस रिपोर्ट में वर्ष 2020 में अमेरिकी राष्ट्रपति के लिए माइकल ब्लूमबर्ग के अभियान के लिए कुछ समानताओं का उल्लेख है। इस रिपार्ट की खोजी तकनीक और इसके निष्कर्ष दोनों के लिए पढ़ने लायक है।

कोस्टा रिका: दो शिक्षाविदों ने यह श्वेतपत्र प्रस्तुत किया। इसमें वर्ष 2018 के बाद से कोस्टा रिकान के चुनावों और राजनीति में तथाकथित ‘साइबर सैनिकों‘ यानी आइटी सेल की भूमिका के बारे में बताया गया है। इन साइबर सैनिकों को सरकारी पक्ष या राजनेता के रूप में सार्वजनिक राय में हेरफेर करने का काम सौंपा गया था। इन लोगों ने 2018 के राष्ट्रपति चुनावों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। राजकोषीय और सिविल सेवा सुधार के लिए भावी राष्ट्रपति की योजनाओं के विरोध में भी इनका उपयोग किया गया। इन लोगों ने फर्जी जनमत संग्रह के जरिए जन भावनाओं को गलत तरीके से पेश किया। फर्जी खबरों के माध्यम से अपने विरोधियों की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाने का प्रयास किया। इस तरह, लैटिन अमेरिका का सबसे स्थिर समझे जाने वाले इस देश में अराजकता और कलह पैदा की।

अतिरिक्त संसाधन

Digital Threats: A Cyber Investigations Training Course

Reporter’s Guide to Investigating Organized Crime: Cybercrime

Mexico Wages Cyber Warfare Against Journalists


जेन लिट् विनेंको एक स्वतंत्र पत्रकार और हार्वर्ड के शोरेनस्टीन सेंटर में शोधकर्ता हैं। उनकी लिखी खबरें वॉलस्ट्रीट जर्नल, द गार्जियन, द अटलांटिक और अन्य प्रकाशनों में छपी हैं। पहले वह बजफीड न्यूज में वरिष्ठ प्रौद्योगिकी लेखिका थीं, जहां उन्होंने दुष्प्रचार को कवर किया। वह कीव (यूक्रेन) से हैं और वारसॉ (पोलैंड) में रहती हैं।

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इमेज: मैसूर में एक मतदाता सहायता केंद्र पर जानकारी लेते हुए भारतीय नागरिक, अप्रैल 2024, इमेज - शटरस्टॉक

भारतीय चुनावों में फ़ैक्ट चेकिंग के सबक

लोकतंत्र के मूल्यों को बनाए रखने के लिए तथ्यों के आधार पर मतदाताओं को निर्णय लेने का अवसर मिलना आवश्यक है। इसके लिए ‘शक्ति‘ – इंडिया इलेक्शन फैक्ट चेकिंग कलेक्टिव का निर्माण किया गया। इस प्रोजेक्ट में गूगल न्यूज इनीशिएटिव की मदद मिली। इस पहल का नेतृत्व डेटालीड्स ने किया। इसके साझेदारों में मिस-इनफॉर्मेशन कॉम्बैट एलायंस (एमसीए), बूम, द क्विंट, विश्वास न्यूज, फैक्टली, न्यूजचेकर तथा अन्य प्रमुख फैक्ट चेकिंग (तथ्य-जांच) संगठन शामिल थे। इंडिया टुडे और प्रेस ट्रस्ट ऑफ इंडिया (पीटीआई) जैसे मीडिया संस्थानों ने भी इसमें भागीदारी निभाई।

Recorder panel at IJF24

रिकॉर्डर : रोमानिया में स्वतंत्र मीडिया का अनोखा राजस्व मॉडल

रिकॉर्डर को वर्ष 2017 में एक विज्ञापन राजस्व मॉडल की योजना के साथ लॉन्च किया गया था। अब इसकी 90 प्रतिशत आय दर्शकों से आती है। यह रोमानिया का एक स्वतंत्र खोजी मीडिया संगठन है। वीडियो और वृत्तचित्रों में इसकी विशेषज्ञता है।

समाचार और विश्लेषण

जब सरकारें प्रेस के खिलाफ हों तब पत्रकार क्या करें: एक संपादक के सुझाव

जिन देशों में प्रेस की आज़ादी पर खतरा बढ़ रहा है, वहां के पत्रकारों के साथ काम करने में भी मदद मिल सकती है। पत्रकारों को स्थानीय या अंतर्राष्ट्रीय मीडिया संगठनों के साथ गठबंधन बनाकर काम करने की सलाह देते हुए उन्होंने कहा- “आप जिन भौगोलिक सीमाओं तथा अन्य चुनौतियों का सामना कर रहे हों, उन्हें दरकिनार करने का प्रयास करें।“