Image: Suzanne, AltStudio for GIJN
खोजी पत्रकारिता किसी बाधा को नहीं मानती। एक रास्ता बंद हो, तो दूसरे रास्ते तलाश लेती है। पत्रकार अगर कोई बॉर्डर पार नहीं कर सकते, या बमबारी वाले इलाकों में नहीं जा सकते, तब भी रिपोर्टिंग रुकती नहीं। इसके लिए नए तरीके खोज निकाले जाते हैं। इसका एक उदाहरण सैटेलाइट इमेज है। यह पहले सिर्फ़ सरकारों और खुफिया एजेंसियों के इस्तेमाल तक सीमित थी। लेकिन अब जनता को हुए नुकसान को रिपोर्ट करने और संभावित युद्ध अपराधों की जांच के लिए यह एक रिपोर्टिंग टूल बन गई है।
नवंबर 2025 में मलेशिया के कुआलालंपुर में चौदहवीं ‘ग्लोबल इन्वेस्टिगेटिव जर्नलिज़्म कॉन्फ्रेंस’ (GIJC25) का आयोजन हुआ। इसमें ‘वॉर क्राइम की जांच के लिए सैटेलाइट इमेजरी का इस्तेमाल’ विषय पर एक सत्र रखा गया था। इसमें पत्रकारों ने बताया कि रिमोट सेंसिंग, ओपन सोर्स वेरिफिकेशन और विज़ुअल फोरेंसिक अब कितना उपयोगी है। यह अब उन युद्धों की रिपोर्ट के लिए ज़रूरी हैं, जो पत्रकारों के लिए पहुंच से बाहर हैं या उनके लिए बहुत खतरनाक हैं। सत्र के पैनलिस्टों ने कहा कि पारंपरिक रिपोर्टिंग के साथ इस्तेमाल किए जाने पर सैटेलाइट डेटा काफी असरदार होता है। यह पत्रकारों को टाइमलाइन तय करने, दावों की जांच करने और जब घटनास्थल तक जाना मना हो तो तबाही के पैटर्न को डॉक्यूमेंट करने में मदद करता है।
इस पैनल में ऐसे पत्रकार और डेटा जर्नलिस्ट शामिल हुए, जिन्होंने गाज़ा से लेकर यूक्रेन तक युद्ध की जांच के लिए सैटेलाइट इमेजरी का इस्तेमाल किया है।
‘अरब रिपोर्टर्स फ़ॉर इन्वेस्टिगेटिव जर्नलिज़्म’ (ARIJ) की कार्यकारी संपादक होदा ओस्मान ने इस सत्र को मॉडरेट किया। पैनलिस्ट थे-
- मनीषा गांगुली – ‘द गार्डियन’ में इन्वेस्टिगेटिव कॉरेस्पोंडेंट और विज़ुअल फोरेंसिक लीड।
- येवेनिया ड्रोज़्डोवा – ‘टेक्स्टी’ (Texty.org.ua) (org.ua.) में डेटा जर्नलिज़्म सेक्शन की हेड।
- पोलिना उज़वाक – ‘आईस्टोरीज़ मीडिया’ की पत्रकार
पिक्सल से सबूत तक
मनीषा गांगुली में (इन्वेस्टिगेटिव कॉरेस्पोंडेंट और विज़ुअल फोरेंसिक लीड, ‘द गार्डियन’) ने सैटेलाइट इमेजरी को ओपन सोर्स इंटेलिजेंस की व्यापक श्रेणी का हिस्सा बताया। उन्होंने कहा कि ओपन सोर्स जांच कई डेटा धाराओं पर निर्भर करती है। इसमें सोशल मीडिया इंटेलिजेंस, जियो-स्पेशियल इंटेलिजेंस और पारंपरिक रिपोर्टिंग शामिल हैं।
उन्होंने बताया कि पत्रकारों के लिए जियो-स्पेशियल इंटेलिजेंस एक नई चीज़ है। पहले देश सैटेलाइट को कंट्रोल करते थे। कमर्शियल सैटेलाइट इमेजरी के आने से रिपोर्टिंग का माहौल बदल गया है। अब पत्रकारों को उन युद्धों का हवाई नज़ारा देखने को मिल सकता है, जिन तक पहुंचना पहले मुश्किल या असंभव था।
मनीषा गांगुली ने सीरिया में गृहयुद्ध के दौरान ओपन सोर्स के जरिए युद्ध की जांच का सिलसिला शुरू किया। स्मार्टफोन और इंटरनेट के इस्तेमाल से उन्हें काफी विज़ुअल सबूत मिले। उस समय कई सैटेलाइट टूल मुफ़्त थे। उन्होंने इसे पत्रकारिता के लोकतांत्रिकरण का क्षण बताया।
उनका मानना है कि अब माहौल बदल गया है। कुछ प्रोवाइडर ने यूक्रेन और गाजा में युद्ध के दौरान मुफ़्त में सैटेलाइट तस्वीरें उपलब्ध कराईं। लेकिन ऐसी तस्वीरों तक पहुंच अब भी असमान और सीमित है। (सैटेलाइट तस्वीरें निशुल्क कैसे पाएं, इसकी जानकारी के लिए जीआईजेएन का यह वेबिनार देखें।)
इन परेशानियों के बावजूद आम जनता को हुए नुकसान की जांच के लिए सैटेलाइट तस्वीरें अब ज़रूरी हो गई हैं। मनीषा गांगुली ने बताया कि समय के साथ होने वाले बदलावों का पता लगाने के लिए रडार मैपिंग और ऑप्टिकल इमेजरी का इस्तेमाल कैसे किया जा सकता है। जैसे, टूटी हुई इमारतों और बुलडोज़र से गिराई गई जगहों का पता लगाना। जब पत्रकार किसी इलाके में नहीं जा सकते, तब भी ऐसी जांच कर सकते हैं। सैटेलाइट इमेजरी यह पता लगाने में मदद करती है कि कौन-सी चीजें कब और कहां बर्बाद हुई। युद्ध अपराधों की जांच में यह एक बुनियादी सवाल है। उन्होंने कहा कि युद्ध के नियम होते हैं। जिनेवा कन्वेंशन और इंटरनेशनल क्रिमिनल कोर्ट के रोम स्टैच्यूट जैसे इंटरनेशनल लॉ फ्रेमवर्क महत्वपूर्ण हैं।
यूक्रेन में तबाही का पता लगाना
येवेनिया ड्रोज़्डोवा (हेड, डेटा जर्नलिज़्म सेक्शन, टेक्स्टी) के अनुसार यूक्रेन में युद्ध की जांच के लिए सैटेलाइट इमेजरी का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल हुआ। 2022 में रूस के व्यापक हमले के बाद से सैटेलाइट इमेज एक नियमित रिपोर्टिंग टूल बन गई हैं।
उन्होंने कहा कि सैटेलाइट इमेज केवल तस्वीरें नहीं हैं। सैटेलाइट के जरिए लाइट स्पेक्ट्रम के अलग-अलग हिस्सों से डेटा इकट्ठा किए जाते हैं। इनसे पत्रकार उन बदलावों का पता लगा पाते हैं जो नंगी आंखों से दिखाई नहीं देते। रडार सैटेलाइट के जरिए बादलों के पार भी देखा जा सकता है। इसका इस्तेमाल 2021 के अंत में यूक्रेन की सीमा के पास रूसी सैन्य शिविरों का पता लगाने के लिए किया गया। भले ही अलग-अलग वाहन दिखाई नहीं दे रहे थे, लेकिन रडार सैटेलाइट डेटा के पैटर्न से सैन्य कार्रवाई की तैयारी संबंधी बदलाव देखने को मिले। हम इन सैन्य शिविरों को अपनी आंखों से नहीं देख सकते थे। लेकिन अगर ऐसे पैटर्न अचानक दिखाई देते हैं, जो पहले नहीं थे, तो आप अनुमान लगा सकते हैं कि ये मिलिट्री वाहन हैं।
उन्होंने यह भी बताया कि 2022 के बाद ईरान और रूस के बीच समुद्री ट्रैफिक को ट्रैक करने के लिए रडार इमेजरी का इस्तेमाल कैसे किया गया। दरअसल दोनों देशों के बीच मिलिट्री सहयोग कायम हुआ था। समय के साथ इमेज को इकट्ठा करके अलग-अलग जहाजों को गिने बिना ट्रैफिक में बढ़ोतरी या कमी की पहचान करना संभव है।
उन्होंने एक अन्य टूल को महत्वपूर्ण बताया। वह है- नाइटटाइम इल्यूमिनेशन डेटा । यह रात की रोशनी का पता लगाना है, जो आर्थिक गतिविधि या जनसंख्या के विस्थापन की ओर इशारा कर सकती है। यूक्रेन में रात की रोशनी के कम होने से उन शहरों और कस्बों का पता लग रहा था, जहां से लोगों ने भारी बमबारी के कारण पलायन किया था। उन्होंने ऐसे मैप दिखाए, जिनमें रोशनी खत्म होने की बात नजर आ रही थी। तस्वीरों में दिख रहे लाल धब्बे दरअसल ऐसे शहर या गांव हैं जो अब मौजूद नहीं हैं।
हाई-रिज़ॉल्यूशन इमेजरी से ज़्यादा व्यापक जांच संभव हुई। इसमें नष्ट हुई इमारतों की जांच करना और रशियन डिफेंसिव लाइन्स को फिर से बनाना शामिल था। कुछ मामलों में टेक्स्टी ने बड़े इलाकों में तबाही के पैटर्न को पहचानने के लिए मशीन लर्निंग का इस्तेमाल किया। येवेनिया ड्रोज़्डोवा ने कहा कि जब आपके पास हज़ारों तबाह बिल्डिंग्स हों, तो आप इसे सिर्फ़ अपनी आँखों से नहीं कर सकते।

टेक्स्टी ने 2024 में सेंटिनल से सैटेलाइट इमेजरी का इस्तेमाल किया। इसके जरिए रशियन सेना द्वारा वोवचांस्क गांव (लाल रंग में एरिया) की बड़े पैमाने पर तबाही पर रिपोर्ट की। इमेज : स्क्रीनशॉट, टेक्स्टी
गाज़ा में युद्ध अपराधों की जांच
मनीषा गांगुली ने गाज़ा में जांच की विस्तृत जानकारी दी। इसमें सैटेलाइट इमेजरी को वीडियो, मेडिकल रिकॉर्ड और गवाहों के बयान के साथ मिलाकर कथित युद्ध अपराधों को डॉक्यूमेंट किया गया था। एक जांच में उत्तरी गाज़ा के तीन इलाकों में हॉस्पिटल, स्कूल, मस्जिद और खेती की ज़मीन सहित नागरिक सुविधाओं से जुड़ी इमारतों की तबाही को जांचने के लिए सैटेलाइट इमेजरी का इस्तेमाल किया गया था।
उन्होंने कहा कि इस इंफ्रास्ट्रक्चर को नष्ट करने का कोई साफ़ सैन्य कारण नहीं था। विनाश के इस व्यापक पैमाने ने इंटरनेशनल कानून के तहत प्रोपोर्शनैलिटी पर सवाल खड़े किए। मनीषा गांगुली ने उन इलाकों में 250 से ज़्यादा रिहायशी इमारतों, 17 स्कूलों और यूनिवर्सिटी, 16 मस्जिदों, तीन अस्पतालों और 150 खेती के ग्रीनहाउस के विनाश को डॉक्यूमेंट किया। बाद में हथियारों की बिक्री को चुनौती देने वाले कानूनी समूहों ने इन नतीजों का इस्तेमाल किया।
अस्पतालों के पास हुए हमलों के विश्लेषण के लिए सैटेलाइट इमेजरी का भी इस्तेमाल किया गया। मनीषा गांगुली ने बताया कि अस्पताल किस तरह रडार मैपिंग में क्रेटर और टैंकों से घिरे हुए दिखे। इससे एम्बुलेंस और आम लोगों का आना-जाना मुश्किल हो गया। अस्पतालों और मेडिकल स्टाफ पर हमला करना एक युद्ध अपराध है।
एक अन्य जांच में, मनीषा गांगुली ने गाजा में मदद वितरण वाली जगहों के पास हुई गोलीबारी की जांच की। इसके लिए सैटेलाइट इमेजरी, वीडियो, मेडिकल रिकॉर्ड और इंटरव्यू का इस्तेमाल किया गया। उन्होंने गोली लगने के कारण जख्मों के पैटर्न को डॉक्यूमेंट किया, जो मदद पहुंचाने के समय और जगहों से मेल खाते थे। उन्होंने सैटेलाइट इमेज का ज़िक्र करते हुए बताया कि मदद सामग्री के वितरण वाली जगहों के आसपास लोगों के बड़े समूह दिख रहे थे। अगर लोगों की यह भीड़ स्पेस से देखी जा सकती है, तो इसे झुठलाया नहीं जा सकता।
उन्होंने फ़िलिस्तीनी पत्रकार बिलाल जदल्लाह की हत्या मामले को भी डॉक्यूमेंट किया। इसके लिए सैटेलाइट इमेजरी और गोलियों के विश्लेषण का इस्तेमाल करके हमले को दुबारा एक ऐसे रास्ते पर बनाया गया, जिसे सुरक्षित बताया गया था। मनीषा गांगुली ने कहा- “बिलाल की मौत इज़राइली टैंक की फायरिंग में एक ऐसे रास्ते पर हुई, जिसे सुरक्षित बताया गया था।”
साझेदारी, दायित्व और सीमाएं
पोलिना उजवाक (आईस्टोरीज़ मीडिया की पत्रकार) ने कहा कि सैटेलाइट इमेजरी तब सबसे असरदार होती है, जब उसे साझेदारी के जरिए किया जाता है। कई मीडिया संस्थानों के पास ऐसी जांच के लिए तकनीकी विशेषज्ञों का अभाव होता है। लेकिन साझेदारी की स्थिति में यह काम बेहतर हो सकता है। उन्होंने कहा कि हम एक छोटी मीडिया टीम हैं। हमारे किसी भी सहकर्मी को रिमोट सेंसिंग की तकनीकी जानकारी नहीं हैं।
इसलिए आईस्टोरीज़ ने तकनीकी विश्लेषकों के साथ साझेदारी की। उनकी मदद से मारियुपोल, बखमुट और सेवेरोडोनेत्स्क में हुए नुकसान का आकलन किया। इसके लिए एआई आधारित मॉडल और रडार डेटा का इस्तेमाल हुआ। टीम ने इन शहरों में हुए नुकसान को मैप किया।
पोलिना उजवाक ने कहा कि सैटेलाइट इमेजरी की भी एक सीमा होती है। कुछ नुकसान ऊपर से दिखाई नहीं देते, खासकर किसी सतह के अंदर हुए नुकसान। सैटेलाइट ऊपर से धरती की सतह को देखते हैं। हम सिर्फ़ उन्हीं नुकसानों का पता लगा सकते हैं जो ऊपर से दिखाई देते हैं। फिर भी, यह तरीका पत्रकारों को बड़े क्षेत्र को व्यवस्थित तरीके से डॉक्यूमेंट करने की सुविधा देता है। युद्ध के दौरान पारंपरिक रिपोर्टिंग के जरिए ऐसी जांच नहीं हो सकती।
पोलिना उजवाक के अनुसार, टेक्निकल टीमों के साथ काम करते समय पत्रकारों को अपनी-अपनी भूमिका पर स्पष्ट बात कर लेनी चाहिए। इस जांच के पीछे अपने मीडिया संस्थान के लक्ष्यों के बारे में भी पहले ही स्पष्ट बता देना चाहिए। कारण यह, कि पत्रकार के तौर पर हम अपनी कहानियों को दूसरों से बेहतर जानते हैं।
जीआइजेसी-25 की इस चर्चा का पूरा वीडियो नीचे देखें।
हनान जफर – भारत निवासी पत्रकार, मल्टीमीडिया स्टोरीटेलर और डॉक्यूमेंट्री फिल्म निर्माता हैं। उनका काम दक्षिण एशियाई राजनीति, अल्पसंख्यकों, मानवाधिकारों और पर्यावरण पर केंद्रित है। उनकी रिपोर्टिंग टाइम मैगजीन, द गार्जियन, वाइस, अल जज़ीरा, बिज़नेस इनसाइडर तथा अन्य संस्थानों में प्रकाशित हुई हैं। उन्होंने दक्षिण पूर्व एशिया, अफ्रीका और यूरोप में भी रिपोर्टिंग की है। वह यूएन फाउंडेशन के 2025 पोलियो प्रेस फेलो हैं।
अनुवाद : डॉ. विष्णु राजगढ़िया