Image: Courtesy of the VizChitra community
कैसे एक व्हाट्सऐप समुदाय भारत में डेटा प्रस्तुतीकरण के परिदृश्य को बदल रहा है
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कुछ साल पहले, जब कोविड-19 महामारी के कारण पूरी दुनिया ठहर-सी गई थी, तब भारत में डेटा पर काम करने वाले कुछ पत्रकार, डिजाइनर, शोधकर्ता, डेवलपर और नागरिक विषयों पर काम करने वाले तकनीकी विशेषज्ञों ने आपस में मेलजोल को बढ़ाना चालू किया। उनका उद्देश्य कोई ऑनलाइन कार्यक्रम आयोजित करना नहीं था, बल्कि एक-दूसरे को जानना था। वे केवल यह सुनिश्चित करना चाहते थे की एक दूसरे को पता रहे कि कौन क्या करता है और किस परियोजना पर काम कर रहा है। ऐसा इसलिए ज़रूरी था क्योंकि अलग-अलग जगहों पर काम कर रहे लोग लगभग एक जैसी समस्याओं का समाधान खोज रहे थे, लेकिन वे एक-दूसरे के बारे में जानते तक नहीं थे।
इनमे से ज्यादातर वह लोग थे जो अपने-अपने न्यूज़रूम, विश्वविद्यालयों और संस्थानों में अकेले ही डेटा रिपोर्टिंग या डेटा विजुअलाइज़ेशन का काम कर रहे थे। उनके लिए ऐसा कोई साझा मंच नहीं था, जहाँ वे सवाल पूछ सकें। अपने अनुभव साझा कर सकें या अपने जैसे लोगों से मिल सकें। आज वही सात साल पुरानी अनौपचारिक शुरुआत भारत के सबसे सक्रिय डेटा स्टोरीटेलिंग या डेटा के माध्यम से कहानी बताने वाले समुदाय में बदल चुकी है।
आज VizChitra के व्हाट्सऐप समुदाय में 1,600 से अधिक सदस्य हैं। जुलाई के महीने बेंगलुरु में आयोजित VizChitra 2026 सम्मेलन में 600 से अधिक लोगों ने व्यक्तिगत और ऑनलाइन हिस्सा लिया। इनमें से लगभग 400 लोग देश के बीस राज्यों में स्थित पचपन शहरों से बेंगलुरु पहुँचे थे। यह पूरी तरह व्यक्तिगत रूप से युवाओं द्वारा आयोजित डेटा विजुअलाइज़ेशन और डेटा स्टोरीटेलिंग सम्मेलन था। सम्मेलन में पत्रकारों के साथ डिजाइनर, डेवलपर, शोधकर्ता, शिक्षक, प्रोडक्ट मैनेजर, छात्र और डेटा साइंटिस्ट भी मौजूद थे।
Revisual Labs की संस्थापक और VizChitra की सह-संस्थापक गुरमन भाटिया कहती हैं, “हम इसे सम्मेलन नहीं, बल्कि एक समुदाय कहते हैं।” उनके अनुसार, डेटा में काम करने वाले लोगों को एक ऐसी जगह चाहिए थी जहाँ वे कभी भी एक दूसरे से सहयोग ले या दे सकें। उनके लिए यह स्थान हम लोगों द्वारा स्थापित व्हाट्सऐप समुदाय ने उपलब्ध कराया।
समय के साथ यह एक व्हाट्सऐप समूह से आगे बढ़कर कई विशेष समूहों का नेटवर्क बन गया है। इनमें नौकरी, शिक्षा-जगत, किताबों के पढ़ने वालों, D3 (डेटा-ड्रिवन डॉक्यूमेंट) सीखने वालों, एआई, साउंड विजुअलाइज़ेशन और विजुअलाइज़ेशन पर फीडबैक जैसे अलग-अलग समूह हैं। इन समूहों में सरकारी डेटा खोजने से लेकर जटिल स्प्रेडशीट को साफ करने, चार्ट की समीक्षा करने, कोड साझा करने और करियर से जुड़े सवालों तक पर चर्चा होती है।
इस कम्युनिटी को आरम्भ करने के विचार महामारी के दौरान ही आकार लेने लगे थे। गुरमन भाटिया याद करते हुए बताती हैं कि उस दौरान वे और उनके सहयोगी रसज्ञ शर्मा इस बात पर चर्चा कर रहे थे कि भारत में डेटा विजुअलाइज़ेशन से जुड़े लोग कितने बिखरे हुए हैं। इसी दौरान कम्युनिटी बिल्डर ज़ैनब बावा ने एक सम्मेलन आयोजित करने का सुझाव दिया। शुरुआत में इसे ऑनलाइन करने के बारे में सोचा गया लेकिन बाद में टीम ने तय किया कि जब लोग आमने-सामने मिल सकेंगे, तभी सम्मेलन आयोजित किया जाएगा।
सबसे पहले इस क्षेत्र के सिर्फ 20–30 लोगों से संपर्क किया। इनमें से लगभग 18 लोगों ने जवाब दिया। गुरमन कहती हैं, “हमें सबसे ज्यादा आश्चर्य इस बात पर हुआ कि सभी लोग लगभग एक जैसी समस्याओं से जूझ रहे थे, लेकिन उन्हें एक-दूसरे के अस्तित्व तक का पता नहीं था।” इसके बाद उन्होंने एक व्हाट्सऐप समुदाय बनाया, जिसका शुरुआती नाम डेटाविज़ कम्युनिटी था।

2026 के विजचित्र डेटा सम्मेलन में शामिल प्रतिभागियों का सामूहिक चित्र। चित्र: विजचित्र समुदाय के सौजन्य से।
बाद में सदस्य अर्पित अरोरा के सुझाए नाम विज़चित्र (VizChitra) पर सहमत हुए। भारतीय भाषाओं में ‘चित्र’ का अर्थ तस्वीर या छवि होता है, और यही नाम इस पहल की भावना को सबसे बेहतर ढंग से व्यक्त करता था। डेटाविज़ समुदाय की वृद्धि संस्थापकों की अपेक्षा से कहीं अधिक तेज रही। 2025 में पहले ऑफलाइन सम्मेलन से पहले टीम ने एक ऑनलाइन परिचय कार्यक्रम आयोजित किया। उसमें व्हाट्सऐप समुदाय से जुड़ने के लिए एक QR कोड दिखाया गया। सिर्फ दस दिनों में करीब 800 लोगों ने समूह जॉइन कर लिया। गुरमन भाटिया कहती हैं, “सच कहूँ तो मुझे इतनी बड़ी संख्या की उम्मीद नहीं थी।”
अधिकांश पेशेवर व्हाट्सऐप समूह कुछ समय बाद निष्क्रिय हो जाते हैं या अपने मूल उद्देश्य से भटक जाते हैं। लेकिन VizChitra में ऐसा नहीं हुआ। हाल ही में समुदाय के एक सदस्य ने भारत के ”टाइम यूज़ सर्वे” के लिए एक आसान ऑनलाइन इंटरफ़ेस तैयार किया। इस इंटरफ़ेस से यह बड़ा और तकनीकी रूप से जटिल सरकारी डेटासेट आम लोगों के लिए समझना और इस्तेमाल करना आसान हो गया। उन्होंने इस टूल को अपने तक सीमित रखने के बजाय पूरे समुदाय के साथ साझा किया।

विजचित्र के स्वयंसेवकों ने बेंगलुरु वृक्ष गणना (ट्री सेंसस) के दौरान सार्वजनिक अभिलेखों में दर्ज नहीं किए गए पेड़ों का मानचित्र तैयार करने में मदद की। चित्र: स्क्रीनशॉट।
गुरमन कहती हैं, “यह पब्लिक सर्विस का एक अच्छा उदाहरण है। किसी को मदद की ज़रूरत थी और किसी दूसरे सदस्य ने ऐसा समाधान तैयार किया जिसका लाभ सभी को मिला।” पिछले वर्ष बेंगलुरु में आयोजित एक स्थानीय कम्युनिटी मीटअप के दौरान लगभग बीस सदस्य अलग-अलग इलाकों में गए और सार्वजनिक रिकॉर्ड में दर्ज न होने वाले पेड़ों का नक्शा तैयार किया। केवल दो घंटे में उन्होंने लगभग 100 पेड़ों को एक ओपन डेटाबेस में जोड़ दिया। गुरमन के अनुसार, यही इस समुदाय की असली पहचान है। वे कहती हैं, “डेटा हर जगह मौजूद है।”
VizChitra के सह-संस्थापक अमित कपूर कहते हैं कि हर संस्था में ऐसे लोग होते हैं जो डिजाइन समझते हैं और ऐसे लोग भी जो डेटा समझते हैं। लेकिन बहुत कम लोग ऐसे होते हैं जो इन दोनों को जोड़कर डेटा को आम लोगों की समझ में आने वाली कहानी में बदल सकें। उनके अनुसार, भारत में डेटा विजुअलाइज़ेशन और डेटा स्टोरीटेलिंग का यही सबसे बड़ा खालीपन है।
पिछले साल की तुलना में इस बार सम्मेलन कहीं बड़ा था। लेकिन आयोजकों का कहना है कि उनका लक्ष्य सिर्फ संख्या बढ़ाना नहीं है। अमित कपूर कहते हैं, “हम विविधता वाले लोगों का समुदाय हैं।” यह विविधता पूरे सम्मेलन में दिखाई भी दी। किसी एक पेशे का वर्चस्व नहीं था। जलवायु शोधकर्ता, आर्किटेक्ट, डिजाइनर, अर्थशास्त्री, एआई इंजीनियर, सार्वजनिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ, सॉफ्टवेयर डेवलपर, कलाकार और पत्रकार—सभी एक ही जगह मौजूद थे। पंजीकरण के आंकड़े भी यही बताते हैं। सम्मेलन में 100 से अधिक प्रोडक्ट और UX डिजाइनर, करीब 80 सूचना डिजाइनर, 70 से अधिक शोधकर्ता और शिक्षक तथा 66 पत्रकार और कम्युनिकेशन प्रोफेशनल शामिल हुए। लगभग आधे प्रतिभागी बेंगलुरु से थे, जबकि बाकी देश के विभिन्न हिस्सों से आए थे।
एक और दिलचस्प बात यह रही कि लगभग आधे प्रतिभागियों के पास डेटा विजुअलाइज़ेशन का पाँच साल से कम अनुभव था। वहीं, एक चौथाई से अधिक लोग इस क्षेत्र में दस वर्षों से भी ज्यादा समय से काम कर रहे थे। अमित कपूर कहते हैं, “एक पत्रकार, एक डिजाइनर और एक शोधकर्ता का साथ बैठना ही इस पूरे प्रयास का उद्देश्य है।” उनके अनुसार, VizChitra की शुरुआत भी इसी सोच के साथ हुई थी। जब वे डेटा विजुअलाइज़ेशन पढ़ाते थे, तब उन्होंने महसूस किया कि डिजाइन और डेटा के बीच काम करने वाले लोगों के लिए कोई साझा मंच नहीं है। VizChitra उसी कमी को पूरा करने की कोशिश कर रहा है।

गुरमन भाटिया विजचित्र सम्मेलन को संबोधित करते हुए। चित्र: विजचित्र समुदाय के सौजन्य से।
भारत में इसकी जरूरत और भी अधिक है, क्योंकि डेटा पत्रकारिता अभी शुरुआती दौर में है। खासकर भारतीय भाषाओं के न्यूज़रूम में। पत्रकार और लेखिका रुक्मिणी एस का मानना है कि चुनौती केवल तकनीक की नहीं है। आज चार्ट और ग्राफिक्स बनाना पहले की तुलना में कहीं आसान हो गया है। लेकिन डेटा को समझना और उसकी सही व्याख्या करना अब भी बड़ी चुनौती है। उनके अनुसार, अच्छी डेटा विजुअलाइज़ेशन की शुरुआत अच्छी रिपोर्टिंग और डेटा की मजबूत समझ से होती है। यही संदेश पूरे सम्मेलन में बार-बार सुनाई दिया।
डेटा पत्रकारिता को पारंपरिक रिपोर्टिंग का विकल्प नहीं, बल्कि उसकी मदद करने वाले एक औजार के रूप में प्रस्तुत किया गया गुरमन भाटिया कहती हैं, “डेटा कभी भी पारंपरिक रिपोर्टिंग की जगह नहीं ले सकता। दोनों को एक-दूसरे का पूरक होना चाहिए।” सम्मेलन के कई सत्र इसी सोच को आगे बढ़ाते दिखाई दिए। सबसे लोकप्रिय सत्रों में से एक था ‘‘टेलिंग टाइमली एंड टाइमलेस स्टोरीज विथ डेटा”। द टाइम्स ऑफ इंडिया के मैनेजिंग एडिटर रोहित सरन ने बताया कि सार्वजनिक डेटा पत्रकारों को ऐसी खबरें खोजने में मदद कर सकता है, जो रोज़मर्रा की खबरों से कहीं आगे तक प्रासंगिक बनी रहती हैं। उन्होंने अपनी हालिया पुस्तक ”हंड्रेड वायस तो सी इंडिया” के उदाहरणों के जरिए बताया कि कई महत्वपूर्ण कहानियाँ सरकारी रिपोर्टों में छिपी रहती हैं। उन्हें खोजने, साफ करने, विश्लेषण करने और सरल भाषा में समझाने की जरूरत होती है। रोहित सरन ने प्रतिभागियों से कहा, “डेटा सार्वजनिक है, लेकिन जनता उसके बारे में नहीं जानती।”
आयोजकों ने सम्मेलन के स्वरूप में भी प्रयोग किया। उन्होंने व्याख्यान, कार्यशाला, प्रदर्शनी और चर्चा सत्रों को अलग-अलग उद्देश्य के साथ तैयार किया। हर कार्यक्रम का अपना अलग अनुभव था। सम्मेलन का सबसे आकर्षक हिस्सा ”डेटा अदरवाइज” प्रदर्शनी रही। देबांशु भौमिक और सिद्धार्थ मुखर्जी द्वारा क्यूरेट की गई इस प्रदर्शनी में डेटा को सिर्फ कंप्यूटर स्क्रीन पर नहीं दिखाया गया। उसे छूने, सुनने और महसूस करने का भी अवसर दिया गया।
”पडल बिनीथ थे प्लेट” नामक प्रदर्शन ने रोज़मर्रा के भोजन के पीछे छिपे पानी के उपयोग को दिखाया। पानी के गड्ढे जैसी दिखने वाली छवियों के माध्यम से लोगों को यह समझाया गया कि हमारी थाली तक भोजन पहुँचने में कितना पानी खर्च होता है। दूसरे प्रदर्शन में विलुप्त होती प्रजातियों, बढ़ती शहरी गर्मी, गायब होती गौरैया और वायु प्रदूषण जैसे विषयों पर आधारित विषय थे। इस प्रदर्शनी ने याद दिलाया कि डेटा केवल आंकड़ों का संग्रह नहीं है। वह लोगों को जटिल मुद्दों को महसूस कराने और समझाने का भी माध्यम बन सकता है।

2026 के विजचित्र (VizChitra) सम्मेलन में आयोजित “डेटा अदरवाइज़” प्रदर्शनी। चित्र: विजचित्र समुदाय के सौजन्य से।
VizChitra की सबसे खास बात यह है कि इसका लगभग पूरा काम स्वयंसेवक यानी वॉलंटियर्स संभालते हैं। सभी आयोजकों की अपनी-अपनी पूर्णकालिक नौकरियाँ हैं। देबांशु भौमिक पिछले वर्ष एक स्वयंसेवक के रूप में जुड़े थे। इस वर्ष उन्होंने सम्मेलन के सबसे चर्चित आकर्षणों में से एक ”डेटा अदरवाइज” प्रदर्शनी का नेतृत्व किया। दूसरे स्वयंसेवकों ने कार्यशालाओं, सामुदायिक समूहों, मेंटरशिप और आयोजन की जिम्मेदारी संभाली। आयोजक चाहते हैं कि यह सम्मेलन आगे भी जारी रहे। लेकिन उनका मानना है कि इसकी सबसे बड़ी ताकत सम्मेलन नहीं, बल्कि समुदाय है।
शायद यही वजह है कि वे पंजीकरण की संख्या से ज्यादा इस बात पर ध्यान देते हैं कि लोग एक-दूसरे की कितनी मदद कर रहे हैं। कोई सदस्य किसी डेटासेट की तलाश करता है, तो दूसरा उसे उपलब्ध करा देता है। कोई अपने चार्ट पर सुझाव मांगता है, तो कई लोग प्रतिक्रिया देते हैं। कोई युवा पत्रकार मार्गदर्शन चाहता है, तो कोई अनुभवी डिजाइनर उसकी मदद करता है। कोई डेवलपर नया टूल बनाता है और उसे पूरे समुदाय के लिए मुफ्त उपलब्ध करा देता है। ऐसे छोटे-छोटे सहयोग ही सम्मेलन खत्म होने के बाद भी इस समुदाय को जीवित रखते हैं।
अमित कपूर कहते हैं कि शुरुआत से उनका उद्देश्य यही था। VizChitra उन लोगों के लिए बनाया गया, जो डेटा, डिजाइन और स्टोरीटेलिंग के संगम पर काम करते हैं और अक्सर अपने संस्थानों में अकेले पड़ जाते हैं। पत्रकारों, डिजाइनरों, शोधकर्ताओं, डेवलपरों और शिक्षकों को एक साझा मंच पर लाकर यह समुदाय भारत में विकसित हो रहे डेटा स्टोरीटेलिंग के पूरे इकोसिस्टम को मजबूत बनाने की कोशिश कर रहा है। गुरमन भाटिया कहती हैं कि कोई भी सम्मेलन केवल दो-तीन दिन का होता है। “उसके बाद क्या होता है, वही ज्यादा महत्वपूर्ण है।”
दीपक तिवारी जीआईएजेएन के हिन्दी संपादक हैं। वे वरिष्ठ पत्रकार हैं और माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल के पूर्व कुलपति रह चुके हैं। रिपोर्टर, उप-संपादक, टीवी टिप्पणीकार, मीडिया सलाहकार और एक पत्रकार के रूप में उन्हें 30 वर्षों से अधिक का अनुभव है। वे मध्यप्रदेश के राजनीतिक इतिहास पर दो पुस्तकों के लेखक भी हैं।