Screenshot: John Hopkins University and Medicine COVID-19 map as of March 26, 2020.

स्क्रीनशॉट: जॉन्स हॉपकिन्स यूनिवर्सिटी और मेडिसिन कोविड-19 मानचित्र (26 मार्च, 2020 की स्थिति)

जॉन्स हॉपकिन्स यूनिवर्सिटी एंड मेडिसिन कोविड-19 मानचित्र के अनुसार दुनिया भर में नए कोरोना वायरस से संक्रमितों की संख्या लगातार बढ़ने के कारण यह पूरी दुनिया का सबसे बड़ा संकट है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) द्वारा हाल के वर्षों में घोषित छह में से यह एक प्रमुख वैश्विक सार्वजनिक स्वास्थ्य आपातकाल है। इस सिलसिले की शुरुआत वर्ष 2009 के स्वाइन फ्लू से हुई थी। कोविड-19 के संकट ने वैश्विक अर्थव्यवस्था को अरबों डॉलर का नुकसान पहुंचाया है। ब्लूमबर्ग के अनुसार विश्व अर्थव्यवस्था को कुल 2.7 ट्रिलियन डॉलर  की कीमत चुकानी पड़ सकती है।

इस महामारी के संबंध में आधिकारिक तौर पर काफी आंकड़े और जानकारियां उपलब्ध हैं। इसके बावजूद यह समझना मुश्किल है कि कोविड-19 कितनी दूर तक फैल सकता है, और इसके अंतिम परिणाम क्या होंगे। तमाम अनिश्चितताओं के बीच दुनिया भर के पत्रकारों को महामारी कवर करने में कई चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। एक तरफ पत्रकारों को गलत सूचना से बचना है और खुद स्वास्थ्य जोखिम उठाते हुए सही रिपोर्टिंग करनी है। दूसरी तरफ उसके सामने यह चुनौती भी है कि उसकी रिपोर्टिंग से लोगों में अनावश्यक भय अथवा घबराहट पैदा न हो।

जीआईजेएन की ओर से मिराज अहमद चौधरी ने कोविड-19 का बेहतर कवरेज करने में पत्रकारों की मदद के लिए यह गाइड तैयार की है। इसके लिए उन्होंने विभिन्न पत्रकारिता संगठनों, अनुभवी पत्रकारों और विशेषज्ञों से सलाह ली है। हमने रिपोर्टिंग के लिए ऐसे विभिन्न संसाधन लगातार उपलब्ध कराने की योजना बनाई है। क्षेत्रीय भाषाओं में जीआईजेएन के गाइड और हमारे सोशल मीडिया चैनल  के माध्यम से ऐसे संसाधन उपलब्ध कराना भी हमारी इस योजना में शामिल है। बांग्ला भाषा में कोविड-19 गाइड यहां उपलब्ध है। चीनी मीडिया में कोविड-19 विजुअलाइजेशन के बारे में जीआईजेएन-चाइनीज की स्टोरी भी महत्वपूर्ण है। सार्स और पोलियो पर पुस्तकों के लेखक संक्रमण रोग विशेषज्ञ थॉमस अब्राहम के सुझाव  भी काफी उपयोगी हैं।

जवाबदेही पूर्ण रिपोर्टिंग

कैरिन वाहल-जोर्गेन्सन (कार्डिफ विश्वविद्यालय में पत्रकारिता की प्रोफेसर) का नया शोध काफी जानकारी पूर्ण है। उन्होंने अपनी जांच के जरिए बताया कि दुनिया भर के उच्च प्रसार वाले 100 समाचार पत्रों में किस तरह कोविड-19 के कवरेज ने भय फैलाने में अपनी भूमिका निभाई है। इस तरह की 9 स्टोरीज में से एक स्टोरी में ‘डर‘ या इससे संबंधित शब्दों का उल्लेख है।

नीमेन लैब में प्रकाशित इस आलेख में वह लिखती हैं – “इन खबरों में अक्सर अन्य डरावनी भाषा का भी प्रयोग किया गया। जैसे, 50 लेखों में ‘हत्यारा वायरस‘ शब्द का प्रयोग हुआ।“

हम पत्रकारों को ऐसी महामारी का गहन और संतुलित कवरेज करना चाहिए। हमारी पूरी कोशिश होनी चाहिए कि किसी भी प्रकार का अनावश्यक भय न फैलाएं। हमें यह समझना होगा कि ऐसी रिपोर्टिंग कैसे करें। पोयंटर के अल टॉमपकिंस के अनुसार इसका समाधान यही है कि हम जवाबदेही पूर्ण रिपोर्टिंग करें। वह कोविड-19 पर एक दैनिक न्यूज़लेटर  निकालने की योजना बना रहे हैं। यहां उनके सुझावों का सारांश प्रस्तुत है:

  1. रिपोर्टिंग में व्यक्तिपरक विशेषणों का उपयोग करने से बचें। जैसे- ‘घातक‘ रोग।
  2. चित्रों का सावधानी से उपयोग करें ताकि कोई गलत संदेश न फैले।
  3. राहत एवं बचाव संबंधी गतिविधियों की व्याख्या करें। इससे आपकी खबर को कम डरावना बनाया सकता है।
  4. याद रखें, किस्से कहानियों की तुलना में सांख्यिकी और तथ्यों वाली खबरें कम डरावनी होती हैं।
  5. सनसनीखेज शीर्षक से बचें, रचनात्मक तरीके से प्रस्तुति करें।

पोयन्टर के एक अन्य लेख में टॉम जोन्स ने भाषणों के बजाय तथ्यों को खोजने पर जोर दिया है। उन्होंने लिखा- “कोविड-19 का संकट चिकित्सा विज्ञान संबंधी मामला है। यह कोई राजनीतिक विषय नहीं है। बेशक, राजनीति का अपना महत्व है। लेकिन पक्षपातपूर्ण राजनीतिक स्रोतों से कोविड-19 संबंधी जानकारी लेने के बजाय चिकित्सा विशेषज्ञों पर भरोसा करें।

नामकरण को समझें

कोरोना संकट के बाद से पत्रकारों ने इस वायरस के लिए अलग-अलग नामों का उपयोग किया है। जैसे, ‘कोरोना वायरस‘, ‘नया कोरोना वायरस‘, या ‘नोवल कोरोना वायरस।‘ मेरिल पर्लमैन ने सीजेआर में प्रकाशित लेख में इसका कारण बताया – “ऐसा इसलिए हुआ है क्योंकि यह कोरोना वायरस अन्य कोरोना वायरसों से अलग है, जो महामारी का कारण बना है। प्रत्येक वायरस को एक नाम मिलता है। प्रत्येक वायरस में किसी न किसी बिंदु पर कुछ नयापन होता है।“

ऐसे नामों के बारे में अधिक जानकारी के लिए डब्ल्यूएचओ का विश्लेषण पढ़ें – वायरस के अलग-अलग नाम क्यों हैं।

आप इस संकट को क्या नाम देना चाहते हैं? ‘सीएनएन‘ वर्तमान कोरोना वायरस प्रकोप के लिए ‘महामारी‘ शब्द का उपयोग कर रहा है। सीएनएन ने बताया कि वह ऐसा क्यों कर रहा है। लेकिन ‘डब्ल्यूएचओ‘ ने अब तक इसे ‘महामारी‘ नहीं कहा है। इसके अपने कारण भी हैं। (संपादकीय टिप्पणी – ‘डब्ल्यूएचओ‘ ने अपने आकलन को अपडेट किया। 11 मार्च 2020 की स्थिति के अनुसार कोविड-19 को एक महामारी का नाम दिया गया।)

‘शब्द‘ काफी मायने रखते हैं। ‘एपी‘ की स्टाइल बुक के अनुसार- ‘एपिडेमिक‘ का मतलब किसी एक निश्चित आबादी या क्षेत्र में तेजी से फैलने वाली बीमारी है। जबकि ‘पेंडेमिक‘ का मतलब ऐसी महामारी है, जो दुनिया भर में फैल गई हो। इसलिए ऐसे शब्दों के उपयोग में संयम बरतें। सरकारी स्वास्थ्य अधिकारियों की घोषणाओं के अनुसार शब्दों का चयन करें। कोरोना वायरस पर एपी स्टाइलबुक में अन्य टिप्स भी काफी उपयोगी हैं।

खुद सुरक्षित रहें

किसी बीमारी का वैश्विक प्रकोप होने पर पत्रकार खुद को एकांत में रखकर पत्रकारिता नहीं कर सकते। हमें फील्ड में जाना जरूरी है। इसमें स्वयं संक्रमित होने का भी खतरा है। कमेटी टू प्रोटेक्ट जर्नलिस्ट्स (सीपीजे) ने कोविड-19 कवर करने हेतु पत्रकारों के लिए एक विस्तृत एडवाइजरी जारी की है। इसमें प्री-असाइनमेंट तैयारी, प्रभावित क्षेत्रों में संक्रमण से बचने के टिप्स, यात्रा योजना और असाइनमेंट के बाद की सावधानियां शामिल हैं। क्षेत्र में कवरेज के लिए इसके प्रमुख सुझाव इस प्रकार हैं:

  • किसी संक्रमित स्थान या अस्पताल में रिपोर्टिंग के लिए जाते समय सुरक्षात्मक दस्तानों का उपयोग करें। आवश्यकतानुसार मेडिकल पर्सनल प्रोटेक्टिव इक्विपमेंट (पीपीई) जैसे बॉडीसूट और फुल फेस मास्क का उपयोग भी उचित होगा।
  • जहां ताजा मांस या मछली बेची जाती है, ऐसे प्रभावित क्षेत्र में या बाजारों न जाएं। जीवित या मृत जानवरों और उनके पर्यावरण के सीधे संपर्क से बचें। जानवरों के मल-मूत्र तथा अन्य दूषित होने वाली सतहों को न छुएं।
  • यदि आप किसी स्वास्थ्य सुविधा, बाजार या फार्म में काम कर रहे हैं, तो अपने उपकरण को कभी भी जमीन या फर्श पर न रखें। इन्हें एंटीमाइक्रोबियल वाइप्स जैसे मेलिसेप्टोल के साथ उपकरणों को कीटाणुरहित करें। साथ ही इनका पूरी तरह से कीटाणुशोधन करें।
  • जानवरों को छूते हुए या बाजार या खेत के पास कभी भी कुछ न खाएं-पिएं।
  • प्रभावित क्षेत्र में काम के दौरान और लौटते समय अपने हाथ गर्म पानी और साबुन से अच्छी तरह धोएं।

क्या कहते हैं विशेषज्ञ

फोटो:पिक्साबे

कोविड-19 की रिपोर्टिंग के दौरान नवीनतम जानकारियां पाने के लिए आधिकारिक वेबसाइटों को लगातार देखते रहें। आपके लिए ‘डब्ल्यूएचओ‘  की वेबसाइट काफी महत्वपूर्ण है। साथ ही, अमेरिका स्थित ‘सेंटर फ़ॉर डिजीज कंट्रोल एंड प्रीवेन्शन‘  तथा यूनाइटेड किंगडम के ‘पब्लिक हेल्थ इंग्लैंड‘ की वेबसाइट भी जरूर देखें। इसके अलावा, जॉन्स हॉपकिन्स यूनिवर्सिटी एंड मेडिसिन कोविड-19 मैप भी देखें। इसका कोरोना वायरस संसाधन केंद्र और न्यूजलेटर अपडेट्स भी उपयोगी है। साथ ही, आपके देश में कोरोना वायरस संबंधी जानकारी देने के लिए अधिकृत सरकारी एजेंसियों के द्वारा जारी सूचनाओं पर हमेशा नजर रखें।

द सोसाइटी ऑफ प्रोफेशनल जर्नलिस्ट्स द्वारा जर्नलिस्ट्स टूलबॉक्स में प्रमुख संसाधनों और स्रोतों की सूची बनाई है:

इस पर और अधिक जानकारी के लिए वाशिंगटन, डीसी स्थित नेशनल प्रेस क्लब का यह वेबिनार (webinar) देखें। यूनिवर्सिटी ऑफ सदर्न कैलिफोर्निया एनेनबर्ग के सेंटर फॉर हेल्थ जर्नलिज्म का यह वेबिनार भी काफी जानकारी देता है।

इस महामारी के विशेषज्ञों को ढूंढना आसान काम नहीं है। कोरोना वायरस एक अज्ञात और अप्रत्याशित संकट है। इसके लिए विशेषज्ञ शोधकर्ता या डॉक्टरों की संख्या सीमित है। ऐसे विशेषज्ञों का चयन करते समय, हार्वर्ड के टी.एच. चान स्कूल ऑफ पब्लिक हेल्थ में महामारी विज्ञान के एसोसिएट प्रोफेसर विलियम हैनेज के निम्नलिखित पांच सुझावों पर विचार करें।

  • विशेषज्ञों को ध्यान से चुनें। किसी एक वैज्ञानिक विषय में नोबेल पुरस्कार मिलने से किसी को हर विषयों पर बोलने का अधिकार नहीं मिल जाता है। न ही किसी प्रतिष्ठित मेडिकल स्कूल में पढ़ाने या पीएचडी करने से कोई विशेषज्ञ हो जाएगा।
  • इन चीजों का फर्क समझें कि किस चीज को सच माना जाता है, किस चीज को सच समझा जाता है? कौन सी बात महज अटकल है और कौन सी बात किसी का विचार है। इन चीजों में अंतर समझें।
  • अप्रकाशित अकादमिक पेपरों तथा पूर्व प्रकाशित आलेखों के निष्कर्षों का हवाला देते समय सावधानी बरतें।
  • नए सिद्धांतों और दावों में कितना सच है और इनमें न्यूज होने लायक कोई बात है या नहीं, इसका आकलन करने के लिए शिक्षाविदों की मदद लें। गलत सूचना को फैलने से रोकने के लिए मीडिया संगठनों को संपादकीय पेज पर प्रकाशित होने वाले विशेषज्ञों के वैचारिक आलेखों की तथ्य-जांच करनी चाहिए।
  • विज्ञान विषयों की रिपोर्टिंग करने वाले अच्छे पत्रकारों की खबरें पढ़ें।

अन्य पत्रकारों से सलाह लें

जीआईजेएन की प्रश्नोत्तरी के सुझाव देखें। यह थॉमस अब्राहम के साथ सवाल जवाब पर आधारित है। वह एक अनुभवी स्वास्थ्य पत्रकार, संक्रामक रोग और वैश्विक स्वास्थ्य सुरक्षा के विशेषज्ञ हैं। वह ‘ट्वेंटी-फस्र्ट सेंचुरी प्लेग: द स्टोरी ऑफ सार्स‘  नामक पुस्तक के लेखक हैं। उनकी एक अन्य पुस्तक  ‘पोलियो : द ओडिसी ऑफ इरेडिकेशन‘  भी चर्चित है।

कैरोलीन चेन ‘प्रोपब्लिका‘ में स्वास्थ्य रिपोर्टिंग करती हैं। तेरह साल की उम्र में वह हांगकांग में सार्स के प्रकोप से बची थीं। बाद में एक रिपोर्टर के बतौर उन्होंने सार्स और इबोला पर रिपोर्टिंग की। इस लेख में  कैरोलीन चेन ने बताया है कि कोविड-19 को कवर करते समय किस तरह के सवाल पूछने हैं। तेजी से बदलती जानकारी के साथ दौरान खबरों को सटीक कैसे रखें, और सुरक्षित कैसे रहें।

स्वास्थ्य पत्रकारिता में दो दशकों के अनुभवी पत्रकार जॉन पोप ने स्वाइन फ्लू को कवर करने के लिए 11 सुझाव लिखे हैं। यह कोविड-19 के लिए भी प्रासंगिक हैं। उन्होंने बुनियादी तथ्य प्राप्त करने का महत्व, प्रकोप का मानचित्रण, खबरों को सरल और संक्षिप्त रखने, रोकथाम पर जोर देने और शब्दों पर ध्यान देने की सलाह दी है।

आई-जे-नेट ने पत्रकारों की सलाह के साथ कोविड-19 पर रिपोर्टिंग के लिए सुझाव दिए हैं। प्रमुख बिंदु इस प्रकार हैं:

  • फ़ील्ड पर चीजों और वास्तविकता को समझें, फिर इसे अपनी रिपोर्टिंग में उतारें।
  • रिपोर्टिंग पर ध्यान दें, विश्लेषण पर नहीं।
  • अपने शीर्षक को ध्यान से लिखें।
  • याद रखें, सभी आंकड़े सटीक नहीं होते हैं।
  • जितना संभव हो, अधिकतम एवं अलग-अलग लोगों से बात करें।
  • नस्लवादी टिप्पणियों एवं पूर्वाग्रहों से बचें।
  • विशेषज्ञों का साक्षात्कार लेने के तरीके पर विचार करें।
  • ऐसी कहानियों की उपेक्षा न करें जो रोमांचक या सनसनीखेज न हों।
  • अपनी सीमा निर्धारित करें। कभी-कभी संपादक को ‘नहीं‘ कहना बेहतर होता है।

फोटो: डब्ल्यूएचओ ने झूठ उजागर करने वाली तस्वीरें संकलित की है, जिसका उपयोग कोई भी कर सकता है। इमेज: डब्ल्यूएचओ।

 

फैक्ट-चेकिंग कोविड-19

फोटो: महामारी के मैप में भी गलत सूचना मिलना संभव है। स्क्रीनशॉट:फर्स्ट ड्राफ्ट

“हम सिर्फ कोरोना महामारी से नहीं लड़ रहे हैं बल्कि हम ‘इन्फोडेमिक‘ यानी झूठ की महामारी से भी लड़ना पड़ रहा है।“ 15 फरवरी को म्यूनिख सुरक्षा सम्मेलन में डब्ल्यूएचओ के महानिदेशक टेड्रोस अदनोम गेब्रेयेसस ने कहा। उन्होंने कहा कि गलत सूचनाओं के इस युग में ऑनलाइन झूठ और साजिश के सिद्धांत से बचना होगा। पत्रकारों को ऐसी गलत सूचनाओं को खारिज करने में मदद करनी चाहिए। जैसे, यह चीन में निर्मित वस्तुओं के माध्यम से फैलने वाली बीमारी है, या इसे वैज्ञानिकों ने बनाया है, या यह किसी विशेष शोध प्रयोगशाला से आई बीमारी है।

पोयन्टर ने एक लेख में बताया कि अमेरिका, भारत, इंडोनेशिया, घाना और केन्या जैसे देशों में एक अफवाह काफी फैली। इसके अनुसार चीन की सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय से 20,000 कोरोना संक्रमित लोगों की हत्या की अनुमति मांगी है।

ऐसे मामलों पर झूठ का पर्दाफाश करने और फैक्ट-चेकिंग के लिए इंटरनेशनल फैक्ट-चेकिंग नेटवर्क की पहल देखें। इसमें 39 देशों के 90 फैक्ट-चेकर्स शामिल हैं, जो झूठ की इस सुनामी का मुकाबला कर रहे हैं। फरवरी के अंत तक, ‘कोरोना वायरस फैक्ट्स‘ तथा ‘डेटोज कोरोना वासरस‘ गठबंधन ने 558 तथ्य-जांच प्रकाशित की है। डब्ल्यूएचओ का एक ‘मिथ बस्टर्स‘  पेज है जो कोरोना वायरस पर अफवाहों को खारिज करता है। इसमें पत्रकारों और मीडिया संगठनों के लिए साझा करने योग्य चित्र शामिल हैं। एएफपी ने भी ‘बस्टिंग कोरोना वायरस मिथ्स‘ नामक पहल की है। फर्स्ट ड्राफ्ट की सलाह भी काफी उपयोगी होती है। गलत सूचना को रोकने पर इसका नवीनतम लेख  और ऑनलाइन सामग्री को सत्यापित करने के त्वरित तरीके पर यह गाइड शामिल है। संपादकीय टिप्पणी – फर्स्ट ड्राफ्ट ने कोरोना वायरस : पत्रकारों के लिए संसाधन भी तैयार किये हैं। )

दुनिया में ऐसे अनगनित मीडिया संस्थानों के पास तथ्य-जांच करने वाली टीम नहीं है। उनके पास ऐसे कौशल वाला कोई व्यक्ति भी नहीं होता। यदि आपको कोई संदिग्ध जानकारी मिलती है, तो किसी विश्वसनीय स्थानीय और क्षेत्रीय तथ्य-जांच समूह की मदद लें। आमतौर पर वे सोशल मीडिया पर सक्रिय रहते हैं और हमेशा ऐसे मामलों की तलाश में रहते हैं।

पीड़ितों के साथ कैसा व्यवहार करें

हमें हमेशा किसी हादसे के शिकार लोगों से मिलना पड़ता है। उनके घरों और कार्यस्थलों पर जाकर उनसे असहज प्रश्न पूछने की आवश्यकता होती है। लेकिन इस वैश्विक प्रकोप में पीड़ितों को आघात पहुंचा है। वे अपनी पहचान बताना और संक्रमणों पर चर्चा करना नहीं चाहते हैं। जहां पीड़ित रहते हैं, उसका उल्लेख करने से भी समाज में डर फैल सकता है। इससे पीड़ित का परिवार और भी असुरक्षित हो जाता है।

द डार्ट सेंटर फॉर जर्नलिज्म एंड ट्रॉमा ने कोविड-19 रिपोर्टिंग पर संसाधनों की सूची बनाई है। इसमें गाइड, टिपशीट, सलाह, सर्वोत्तम अभ्यास, के अलावा पीड़ितों और बचे लोगों के साक्षात्कार पर विशेषज्ञों की सलाह और हादसे के संपर्क में आने वाले सहयोगियों के साथ काम करना शामिल है।

सेंटर फॉर हेल्थ जर्नलिज्म  के इस लेख में हादसे में बचे लोगों के साक्षात्कार के उपाय बताए गए हैं। यहां सुझावों का सारांश दिया गया है:

  • पीड़ितों के साथ सम्मान से पेश आएं। पीड़ित को अपनी कहानी खुद कहने दें।
  • पीड़ित को साक्षात्कार का समय निर्धारित करने दें। उन्हें अपने साथ किसी सहयोगी या सलाहकार को रखने की भी सुविधा दें।
  • हमेशा पारदर्शी रहें। खबर में पीड़ित की पहचान कैसे बताई जाएगी, इस संबंध में उसकी सहमति लें।
  • खबर में मानवता को सबसे पहले रखें। पीड़ित की भलाई को प्राथमिकता दें।
  • पीड़ित को शुरू में ही कठिन सवाल पूछकर भावुक न बनाएं। उनके साथ सहानुभूति रखें, उनकी बात ध्यानपूर्वक सुनें।
  • पीड़ितों के साथ बार-बार मिलने से आप भी भावनात्मक आघात के शिकार हो सकते हैं।

मिराज अहमद चौधरी  जीआईजेएन बांग्ला के संपादक हैं। उन्हें पत्रकारिता विशेषतः प्रसारण में 14 वर्षों का अनुभव है। वह प्रबंधन और संसाधन विकास पहल (एमआरडीआई) में कार्यक्रमों और संचार का प्रबंधन करते हैं। यह एक प्रमुख मीडिया विकास संगठन है। यह बांग्लादेश में जीआईजेएन का सदस्य संगठन है।

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