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दुनिया भर में प्रवासन एक बड़ी समस्या है। विस्थापितों की त्रासदी पर खोजी पत्रकारिता की भरपूर संभावना है। युद्ध अथवा संघर्ष के क्षेत्रों से लेकर जलवायु परिवर्तन से बुरी तरह प्रभावित क्षेत्रों तक यह समस्या फैली है। आर्थिक कठिनाई और पर्यावरणीय संकट के कारण बड़ी आबादी अपना घर छोड़ने को मजबूर होती है।
यूएनओ की एजेंसी ‘संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी उच्चायुक्त’ (UNHCR) ने इस समस्या का आकलन किया है। इसका अनुमान है कि युद्ध अथवा संघर्ष, हिंसा और उत्पीड़न के कारण 2025 के मध्य तक दुनिया में लगभग 11.7 करोड़ लोग विस्थापित हुए। इनमें से तीन-चौथाई लोग जलवायु संबंधी खतरों से प्रभावित देशों के थे। ऐसे लोग राजनीतिक अस्थिरता, जलवायु चरम सीमाओं और विस्थापन के दुष्चक्र में फंस जाते हैं।
किसी आपात स्थिति में सुरक्षित आवागमन के अभाव और हताशा में भी लोग पलायन करते हैं। रेगिस्तानों को पार करने वाले सीलबंद मालवाहक ट्रकों से लेकर यूरोप की सीमाओं के पास गोपनीय अस्थायी हिरासत केंद्रों जैसे मुद्दे अहम हैं। विभिन्न देशों के बीच प्रवासियों का आवागमन आज पत्रकारों के लिए महत्वपूर्ण विषय बन चुका है।
नवंबर 2025 में मलेशिया के कुआलालंपुर में चौदहवीं ‘ग्लोबल इन्वेस्टिगेटिव जर्नलिज्म कांफ्रेंस’ का आयोजन हुआ। इसमें ‘प्रवासन : लोगों के आवागमन की जांच’ विषय पर एक सत्र रखा गया। इसमें प्रवासी मूल और गंतव्य देशों के पत्रकारों ने अपने विचार रखे। बताया कि वे प्रवास की जांच के लिए खुले स्रोतों से किए गए शोध, जमीनी रिपोर्टिंग और स्व-निर्मित डेटाबेस का उपयोग कैसे करते हैं।
कार्ला मिनेट (प्यूर्टो रिको के सेंट्रो डी पेरियोडिस्मो इन्वेस्टिगेटिवो की कार्यकारी निदेशक) ने इस पैनल का संचालन किया। इसके पैनलिस्ट इस प्रकार थे-
- रॉनी रोजास (खोजी पत्रकार, नोटिशियास टेलेमुंडो)
- मे बुलमैन (संपादक, लाइटहाउस रिपोर्ट्स)
- इमाने बेलामीन (पत्रकार, ma , मोरक्को)
कार्ला मिनेट ने कहा कि प्रवास की समस्या केवल अपनी सीमा से पार जाने तक सीमित नहीं है। इसकी एक व्यापक परिघटना के बतौर रिपोर्टिंग होनी चाहिए। पैनल के वक्ताओं ने उन आधिकारिक बयानों को चुनौती पर जोर दिया, जो अत्याचार के लिए सीमा सुरक्षा का बहाना बनाते हैं। इन विषयों के विश्लेषण के लिए डेटा संकलित करने और अपना डेटाबेस बनाने पर भी बात हुई। वक्ताओं ने कहा कि प्रवासन के साथ ही उन प्रवासियों की जरूरतों को केंद्र में रखना होगा, जिनका पत्रकारों पर अविश्वास बढ़ गया है।
साक्ष्यों का डेटाबेस बनाएं
चर्चा में एक व्यापक सीमा-पार जांच का उदाहरण सामने आया। यह जांच एक दुखद घटना से शुरू हुई थी। टेक्सास के सैन एंटोनियो में तस्करी करके लाए गए 53 प्रवासी मृत पाए गए थे। अमेरिका के मीडिया संस्थान ‘नोटिशियास टेलेमुंडो’ के पत्रकार रॉनी रोजास ने इसकी गहन जांच की। उन्होंने इस मामले ने कई अहम सवाल खड़े किए। जैसे, ऐसी यात्राएं कितनी बार हो रही थीं? इनकी शुरूआत कहां से हुईं?
टेलेमुंडो न्यूज़रूम ने ऐसे पाठकों से अपने अनुभव साझा करने की अपील की, जिन्होंने ऐसी ही परिस्थितियों में यात्रा की थी। पाठकों से मिली जानकारियों से एक बड़ी कहानी सामने आई। महिलाओं और बच्चों सहित प्रवासियों को कई दिनों तक मालवाहक ट्रेलरों में ठूंस-ठूंस कर ले जाया जाता था। इनमें हवा, भोजन और पानी की कमी होती थी।
रॉनी रोजास ने कहा- “उन्हें ग्वाटेमाला से उठाकर उत्तरी सीमा तक ले जाया जा रहा था। यह हजारों मील की दूरी है। महिलाओं और बच्चों को इन ट्रैक्टर-ट्रेलरों में कई दिनों तक बिना पानी, बिना भोजन और कम हवा के ठूंस-ठूंस कर भरा गया था।”
मानव तस्करी के पैमाने का आकलन करने के लिए रॉनी रोजास और उनकी टीम को आंकड़ों की आवश्यकता महसूस हुई। लेकिन आधिकारिक आंकड़े उपलब्ध नहीं थे, अथवा बेहद कम थे। उन्होंने कहा- “हमारे पास आंकड़े नहीं थे। तो हम क्या करते? क्या हम इस कहानी को भुला देते? या बस कुछ लोगों का साक्षात्कार लेते?”
ऐसे में टेलेमुंडो न्यूज़रूम ने सीमा के दोनों किनारों को जोड़ने के लिए अपना डेटाबेस बनाने का फैसला किया। रॉनी रोजास और उनकी टीम टेक्सास (अमेरिका) की ओर से रिपोर्टिंग कर रही थी। लेकिन गवाहियों से पता चला कि उनकी यात्रा सीमा के दूसरी ओर से शुरू हुई थी, जो ग्वाटेमाला से मैक्सिको तक फैली हुई थी।
उनकी टीम ने प्रेस विज्ञप्तियों, स्थानीय समाचारों और मैक्सिको भर में घटनाओं के कवरेज को संकलित किया। महत्वपूर्ण विवरण को मैन्युअल रूप से निकाला गया। जैसे, तिथियां, स्थान, प्रवासियों की संख्या, राष्ट्रीयता, चोटें और मौतें।
लेकिन रॉनी रोजास ने आंकड़ों को कहानी समझने की गलती न करने की चेतावनी दी। उन्होंने समझाया- “डेटाबेस आपको संदर्भ प्रदान करता है। यह आपको समस्या के वास्तविक पैमाने को देखने की अनुमति देता है। लेकिन आपको बाहर जाकर लोगों से बात करनी होगी। असली कहानी वहीं छिपी है।”
टेलेमुंडो न्यूज़ रूम अमेरिका की तरफ से रिपोर्टिंग कर रहा था। इसके कारण उनके पास मेक्सिको और मध्य अमेरिका में ज़मीनी हालात की जानकारी सीमित थी। टेलेमुंडो ने लैटिन अमेरिकी खोजी पत्रकारिता केंद्र (एल क्लिप) के साथ साझेदारी की। स्थानीय पत्रकारों के नेटवर्क ने महत्वपूर्ण संदर्भ, पहुंच और सत्यापन प्रदान किया।
मालवाहक ट्रक: प्रवासियों के लिए एक जाल- इस तरह यह गहन खोजी रिपोर्ट तैयार हुई। इसमें ज़मीनी रिपोर्टिंग को कहानी कहने के कई प्रारूपों के साथ जोड़ा गया। इसके केंद्र में एक डेटाबेस था। इसने पहली बार लगभग 19,000 प्रवासी यात्राओं का दस्तावेजीकरण किया। इसमें कम-से-कम 111 मौतों और सैकड़ों लोगों के घायल होने के मामले शामिल थे। इस परियोजना में एक 40 मिनट का वृत्तचित्र और एक गहन मल्टीमीडिया विशेष भी शामिल था। व्यापक दर्शकों तक निष्कर्षों को पहुंचाने के लिए एनिमेटरों, चित्रकारों और सोशल मीडिया विशेषज्ञों की मदद से इन्हें तैयार किया गया था।

ट्रैलेरेस, ट्रैम्पा पैरा माइग्रेंट्स (CLIP के लिए एलेजांद्रा सावेद्रा लोपेज़ द्वारा बनाई गई इमेज, अनुमति लेकर पुनः प्रकाशित)
डेटाबेस बनाने के लिए विचारणीय बिंदु
- इस डेटाबेस से हम किन सवालों के जवाब चाहते हैं?
- उन जवाबों के लिए जानकारी को किस तरह संरचित करना होगा?
- क्या जानकारी को एक समान तरीके से एकत्र करना संभव है?
- क्या हमारे पास फ़ॉर्मेटिंग और कोडिंग के लिए स्पष्ट मानक हैं?
- क्या हमने एक साझा डेटा शब्दकोश बनाया है?
रॉनी रोजास ने कहा कि इस आधारभूत तैयारी के बिना ऐसे डेटा को संकलित करने में समय बर्बाद न करें। इसका तरीका ऐसा हो, जिसका विश्लेषण करके कोई कहानी बताई जा सके।
सीमा–पार अत्याचारों की सीमा–पार रिपोर्टिंग
यूरोप की ब्लैक साइट्स– लाइटहाउस रिपोर्ट्स और नौ रिपोर्टिंग सहयोगियों ने यह जांच रिपोर्ट की। इसमें बुल्गारिया, हंगरी और क्रोएशिया में यूरोपीय संघ की सीमाओं के पार खुलेआम संचालित हो रहे गुप्त हिरासत स्थलों के एक नेटवर्क का खुलासा किया गया।
ऐसी ‘ब्लैक साइट्स’ की चर्चा लंबे समय से थी। लेकिन पहले कभी भी दृश्य प्रमाण या सटीक स्थान डेटा के साथ इनकी रिपोर्टिंग नहीं हुई थी। पत्रकारों ने 11 महीनों से अधिक समय तक जमीनी स्तर पर जांच की। इसके नतीजों को ओपन सोर्स रिसर्च के साथ जोड़ा। प्रवासियों द्वारा फिल्माए गए वीडियो का विश्लेषण किया। चारदिवारी, इमारतों और भूभाग जैसे दृश्य सुरागों का उपग्रह इमेजरी के साथ मिलान किया। इसके जरिए स्थलों का भौगोलिक स्थान निर्धारित किया।
इस तरह जुटाए गए सबूतों से बड़ा खुलासा हुआ। पता चला कि बुल्गारिया में शरणार्थियों को पिंजरे जैसी संरचना में रखा गया था। क्रोएशिया में अत्यधिक गर्म वैन में बंद रखा गया था। हंगरी में कंटेनरों में और एक सुनसान पेट्रोल स्टेशन पर हिरासत में रखा गया था। चूंकि ये सुविधाएं आधिकारिक हिरासत प्रणालियों से बाहर संचालित होती हैं, इसलिए इन पर जनता की निगरानी नहीं होती।
ऐसे केंद्र अवैध हिरासत और वापस भेजने की एक व्यापक प्रणाली का हिस्सा थे। कुछ मामलों में इनके वित्तपोषण का पता यूरोपीय संघ से लगाया जा सकता था। ये फ्रोंटेक्स अधिकारियों की पूरी निगरानी में संचालित हो रहे थे।
ऐसे अत्याचार स्वयं सीमाओं को पार करते हैं। इसलिए इनकी रिपोर्टिंग भी सीमाओं को पार करके ही संभव है। लाइटहाउस ने कई देशों में भागीदारों के साथ काम किया। क्षेत्रीय विशेषज्ञता, भाषा कौशल और स्थानीय स्रोत नेटवर्क को मिलाकर सबूतों को सत्यापित किया गया। प्रभावित समुदायों तक भी पहुंच बनाई गई।
मे बुलमैन (संपादक, लाइटहाउस रिपोर्ट्स) ने कहा- “सीमा-पार सहयोग बेहद जरूरी है। इसका लाभ यह है कि आपको कौशल और क्षेत्रीय ज्ञान की एक व्यापक श्रृंखला मिलती है। जिन विभिन्न देशों पर आप ध्यान केंद्रित कर रहे हैं, वहां से ठोस जानकारी की आवश्यकता होती है।”
सीमा-पार सहयोग ने तथ्य-जांच को भी मजबूत किया। इसके कारण स्रोतों तक पहुंच का विस्तार हुआ। इसके आधार पर बनी खबर को विभिन्न प्लेटफार्मों और भाषाओं में प्रकाशित करना भी संभव हुआ।

लाइटहाउस रिपोर्ट्स, यूरोप के ब्लैक साइट्स। इमेज : स्क्रीनशॉट, लाइटहाउस रिपोर्ट्स
स्रोतों की सुरक्षा जरूरी
सीरियाई गृहयुद्ध के कारण 2015 में व्यापक विस्थापन हुआ। इसके बाद से पश्चिमी देशों में प्रवासन के प्रति राजनीतिक और सामाजिक दृष्टिकोण में बड़ा बदलाव आया है। अमेरिका और यूरोप के कई देशों में प्रवासन एक राजनीतिक विवाद का विषय और चुनावी रणनीति बन गया।
विस्थापित लोगों के लिए यह बदलाव हर तरफ से जोखिम लेकर आता है। किसी पत्रकार से बात करने मात्र पर सरकारी अधिकारियों को प्रतिशोध, हिरासत या निर्वासन का सामना करना पड़ सकता है। मानव तस्करों से उन्हें हिंसा और धमकी का सामना करना पड़ सकता है। यह खतरा उनके घर और परिवारों तक भी पहुंच सकता है।
पैनल के वक्ताओं ने इस बात पर सहमति जताई कि जोखिम के इस बढ़े हुए माहौल में स्रोत की सुरक्षा करना बेहद जरूरी है। यह केवल एक नैतिक कदम नहीं बल्कि एक ऐसी जीवन रक्षा रणनीति है, जो धीरे-धीरे विश्वास कायम करने से शुरू होती है।
इमाने बेलामीन (ENASS.ma मोरक्को की पत्रकार) ने एक ऐसे देश में काम करने के अपने अनुभव बताए, जहां प्रेस की स्वतंत्रता और प्रवासियों का विश्वास, दोनों ही नाजुक स्थिति में हैं। उन्होंने कहा- “जब आप किसी सीमित स्वतंत्रता वाले देश में रिपोर्टिंग कर रहे हों, तो एक वैकल्पिक तरीका अपनाएं। आप समुदाय से संपर्क करें और उनके भीतर रहकर काम करें। इसमें सावधानी और संवेदनशीलता का संतुलन जरूरी है। प्रवासियों का विश्वास जीतना दिन-प्रतिदिन कठिन होता जा रहा है। कई लोगों को लगता है कि मीडिया उनसे केवल डेटा और कहानियां ही निकाल रहा है।”
इमाने बेलामीन का स्वतंत्र मीडिया संगठन ENASS.ma साक्षात्कार की विशेष पद्धति पर काम करता है। इसमें प्रवासियों को यह तय करने की अनुमति होती है कि वे क्या साझा करना चाहते हैं और कैसे साझा करना चाहते हैं। यह प्रवासियों को निष्क्रिय पीड़ितों के बजाय विशेषज्ञों के रूप में देखने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। वह कहती हैं- “हम इन समुदायों और स्रोतों को विशेषज्ञ मानते हैं, पीड़ित नहीं। वे अपनी कहानी के स्वयं खोजकर्ता हैं।”
जीआईजेसी-25 पैनल का पूरा वीडियो नीचे देखें।
एना पी. सैंटोस
दस वर्षों से अधिक अनुभव वाली पत्रकार हैं। रैपलर, डीडब्ल्यू जर्मनी, द अटलांटिक और द लॉस एंजिल्स टाइम्स में उनकी खबरें प्रकाशित हुई हें। यौन प्रजनन स्वास्थ्य, एचआईवी और यौन हिंसा से संबंधित लैंगिक मुद्दों पर रिपोर्टिंग में विशेषज्ञता है। पुलित्जर सेंटर 2014 पर्सेफोन मीएल फेलो के रूप में उन्होंने यूरोप और मध्य पूर्व में श्रम प्रवासन पर रिपोर्टिंग की है।
अनुवाद: डॉ. विष्णु राजगढ़िया