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डिजिटल घोटाले, जानलेवा अस्पताल, भयावह आप्रवासन : 2025 में भारत की सर्वश्रेष्ठ खोजी खबरें

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भारत में खोजी पत्रकारिता के समक्ष चुनौतियां बढ़ती जा रही हैं। इसके बावजूद वर्ष 2025 में खोजी पत्रकारों ने अपना काम जारी रखा। सूचना तक सीमित पहुंच की परिस्थितियों में भी पत्रकारों ने महत्वपूर्ण खबरें खोज निकालीं। इन खबरों से पता चलता है कि धन, नीति, दबाव, उपेक्षा और चुप्पी के माध्यम से सत्ता कैसे अपना काम करती है।

हिंदी के कई अखबार और स्वतंत्र यूट्यूब पत्रकार, खासकर स्थानीय भाषाओं में खोजी पत्रकारिता में तरह तरह के प्रयोग कर रहे हैं। भारत में प्रेस की स्वतंत्रता के लिए बिगड़ते हालात के बीच ऐसा महत्वपूर्ण काम देखने को मिल रहा है। हालांकि 2025 में वैश्विक प्रेस स्वतंत्रता रैंकिंग में भारत की स्थिति में मामूली सुधार हुआ है। लेकिन कानूनी उत्पीड़न, निगरानी, समाचार कक्षों पर दबाव और असहमति व्यक्त करने के लिए सीमित होते दायरे को लेकर चिंताएं कम नहीं हुई हैं। सत्ता में बैठे लोगों को चुनौती देने वाली रिपोर्टिंग के लिए पत्रकारों को आज भी मानहानि के मुकदमों, आपराधिक जांचों, छापेमारी और लंबी कानूनी लड़ाइयों का सामना करना पड़ता है। सार्वजनिक आंकड़ों तक पहुंच लगातार सीमित होती गई है। दूसरी ओर, पारदर्शिता को रोकने और रिपोर्टिंग को दबाने के लिए राष्ट्रीय सुरक्षा, सार्वजनिक विधि व्यवस्था और आतंकवाद विरोधी कानूनों का दुरूपयोग बढ़ गया है। ऐसे माहौल में खोजी पत्रकारिता न केवल कठिन है, बल्कि एक दुस्साहस जैसा काम बन गया है।

इतने सख्त प्रतिबंध के बावजूद खोजी पत्रकारों की एक नई पीढ़ी सामने आई है। यहां सूचीबद्ध कई कहानियां युवा पत्रकारों की छोटी टीमों, स्वतंत्र समाचार कक्षों और गैर-लाभकारी समूहों ने लिखी हैं। वे अक्सर डेटा विश्लेषण, सीमा पार टीम वर्क और दस्तावेज़-आधारित रिपोर्टिंग का उपयोग करते हैं। सीमित संसाधनों और जोखिमों के बावजूद वे धैर्यपूर्वक जांच करते हैं। ऐसे पत्रकार आज के भारत में जवाबदेही पत्रकारिता के मायने को फिर से परिभाषित कर रहे हैं।

खोजी पत्रकारिता धीरे-धीरे अंग्रेजी मीडिया से निकलकर स्थानीय भाषा के समाचार पत्रों के दफ्तरों की ओर बढ़ रही है। हिंदी अखबार और स्वतंत्र यूट्यूब पत्रकार, खोजी पत्रकारिता को अपना रहे हैं। इनमें खास तौर पर स्थानीय भाषाओं के पत्रकार महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।

डिजिटल धोखाधड़ी का भंडाफोड़

इमेज : स्क्रीनशॉट, इंडियन एक्सप्रेस

इंडियन एक्सप्रेस की जांच ने भारत में डिजिटल धोखाधड़ी का खुलाया किया। इसमें ठगी की रकम मिनटों के भीतर कई बैंकों और देश की सीमाओं के पार स्थानांतरित हो जाती है। खबर में कानून प्रवर्तन अधिकारियों के साथ साक्षात्कार तथा आधिकारिक आंकड़ों का उपयोग किया गया। पता चला कि साइबर अपराधी “घोस्ट“ या “म्यूल“ खातों के नेटवर्क के जरिए करोड़ों रुपये भेजते हैं। चिह्नित किए जाने के बावजूद ऐसे नेटवर्क का बार-बार इस्तेमाल होता है। ये खाते जाली या दुरुपयोग की गई पहचान का उपयोग करके खोले जाते हैं। कई बैंकों में स्थानांतरित होने के कारण इनकी वसूली मुश्किल हो जाती है। रिपोर्ट में बताया गया कि बैंकों, पुलिस और साइबर अपराध इकाइयों के बीच समन्वय में देरी होती है। इसके कारण खातों को फ्रीज किए जाने से पहले ही धनराशि निकाल ली जाती है। खबर ने वास्तविक समय निगरानी प्रणालियों की कमजोरियों और ग्राहक को जानें (केवाईसी) मानदंडों के असमान प्रवर्तन को भी उजागर किया। रिपोर्ट में अधिकारियों ने स्वीकार किया कि संदिग्ध लेनदेन का पता लगाया जा सकता है। लेकिन संस्थागत कमियों के कारण समय पर कार्रवाई नहीं हो पाती है। जांच ने इस बात पर जोर दिया कि प्रणालीगत विफलताएं संगठित डिजिटल धोखाधड़ी को फलने-फूलने देती हैं। पीड़ित लोग अपने खोए हुए पैसे को वापस पाने के लिए संघर्ष करते रहते हैं।

ब्रिटेन से आयातित पुराने टायरों की भारत में डंपिंग

इमेज : स्क्रीनशॉट, दैनिक भास्कर

भारत के प्रमुख हिंदी दैनिक, दैनिक भास्कर ने मध्यप्रदेश में ब्रिटेन से आयातित पुराने टायरों की अवैध डंपिंग और प्रोसेसिंग पर दो भागों में रिपोर्ट प्रकाशित की। जांच में पता चला कि तेल निकालने के लिए कम-से-कम 37 स्थानों पर बड़ी मात्रा में इन बेकार टायरों को अवैध रूप से प्रोसेस किया जा रहा है। इससे हवा में जहरीली गैसें निकलती हैं। अवशेष व अपशिष्ट मिट्टी और जल निकायों को दूषित करते हैं। यह काम पर्यावरण संबंधी मंजूरी या सुरक्षा मानकों के बिना होता है। स्थानीय निवासियों ने सांस लेने में कठिनाई, आंखों में जलन और फसलों को नुकसान की शिकायत की। जांच में पता चला कि स्पष्ट पर्यावरणीय उल्लंघनों के बावजूद नियामक निगरानी कमजोर है। प्रवर्तन बेहद अनियमित है। आधिकारिक रिकॉर्ड में बंद दिखाए गए कई संयंत्र जमीनी स्तर पर काम कर रहे थे। दस्तावेजों, आधिकारिक आंकड़ों और जमीनी रिपोर्टिंग के आधार पर यह खबर बनी। इस श्रृंखला ने उजागर किया कि कैसे खतरनाक अपशिष्ट प्रबंधन की विफलताएं पर्यावरण प्रदूषण को फैलने दे रही हैं। इससे सार्वजनिक स्वास्थ्य, नियामक जवाबदेही और सीमा पार अपशिष्ट डंपिंग प्रथाओं के बारे में गंभीर चिंताएं पैदा हो रही हैं।

भारतीयों की अमेरिका में मानव तस्करी

इमेज : स्क्रीनशॉट, द वीक (भारत)

द वीक की इस पड़ताल ने अमेरिका में अवैध अप्रवासन में वृद्धि को उजागर किया। इनमें से कितने प्रवासियों को निर्वासित किया जाता है, इस पर प्रकाश डाला गया। खबर में बताया गया है कि पंजाब, हरियाणा, गुजरात और अन्य भारतीय राज्यों के लोग नौकरी के वादे में फंस जाते हैं। वे लैटिन अमेरिका के लंबे, जोखिम भरे रास्तों से अमेरिका में सुरक्षित प्रवेश के लिए एजेंटों को बड़ी रकम देते हैं। कई प्रवासी खतरे, हिरासत और अनिश्चितता का सामना करते हैं। पकड़े जाने पर उन्हें अमेरिकी हिरासत केंद्रों में कठोर परिस्थितियों में रखा जाता है। रिपोर्ट में इस नेटवर्क में मानव तस्करों, जाली दस्तावेजों और सोशल मीडिया की भूमिका की भी जांच की गई है। खबर में आधिकारिक आंकड़ों और प्रवासी साक्षात्कारों का उपयोग किया गया। इसने दिखाया कि अमेरिकी प्रवर्तन बढ़ा दिया गया है और निर्वासन बढ़ रहे हैं। इसने इस प्रवासन प्रवृत्ति के पीछे आर्थिक दबावों और भारत लौटने के लिए मजबूर होने की त्रासदी को भी उजागर किया।

भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण का राजनीतिकरण

इमेज : स्क्रीनशॉट, द कारवां

द कारवां पत्रिका की इस रिपोर्ट ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) पर राजनीतिक दबाव को उजागर किया। सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) पुरातात्विक व्याख्या को हिंदुत्ववादी इतिहास के अनुरूप ढाल रही है। खबर ने बताया कि औपनिवेशिक काल में विद्वतापूर्ण पद्धति पर आधारित यह संस्था आज एक ऐसे संगठन में तब्दील हो गई है जहाँ उत्खनन, रिपोर्ट और आधिकारिक बयान अक्सर वैचारिक अपेक्षाओं से प्रभावित होते हैं। चर्चित स्थलों, अदालती कार्यवाही, एएसआई की आधिकारिक रिपोर्टों और विशेषज्ञों की राय के उदाहरणों का उपयोग करते हुए यह खबर की गई। इसमें दिखाया गया है कि कैसे पुरातात्विक निष्कर्षों को प्राचीन हिंदू सनातन या विवादित धार्मिक स्थलों के नीचे दबे मंदिर अवशेषों के दावों का समर्थन करने के लिए चुनिंदा रूप से प्रस्तुत किया जाता है। कई बार उनमें देरी की जाती है या बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया जाता है। रिपोर्ट में एएसआई के पूर्व अधिकारियों, इतिहासकारों और पुरातत्वविदों द्वारा स्थापित वैज्ञानिक पद्धतियों से विचलन, पारदर्शिता की कमी और सहकर्मी समीक्षा पर प्रतिबंधों का भी खुलाया किया गया है। रिपोर्ट के अनुसार यह राजनीतिकरण एक विषय के रूप में पुरातत्व की विश्वसनीयता को कमज़ोर करता है। यह भारत के इतिहास के बारे में जनता की समझ को नया रूप देता है, जिसका शैक्षणिक स्वतंत्रता, विरासत प्रबंधन और सांप्रदायिक संबंधों पर दीर्घकालिक प्रभाव पड़ता है।

घाना सरकार ने भारत में आयातित अवैध सोने को वैध बनाया

इमेज : स्क्रीनशॉट, रिपोर्टर्स कलेक्टिव

रिपोर्टर्स कलेक्टिव की इस जांच में घाना में अवैध सोने के खनन और भारत में इसके भारी मात्रा में आयात का पता लगाया गया। लीक हुए दस्तावेजों, सीमा शुल्क रिकॉर्ड और व्यापार डेटा का उपयोग करते हुए यह रिपोर्ट बनाई गई है। इसने घाना की सरकारी एजेंसियों की संलिप्तता का खुलासा किया। खबर बताती है कि कैसे अनौपचारिक तथा हानिकारक तरीकों से खनन किए गए सोने को जाली दस्तावेजों के माध्यम से “शुद्ध“ किया जाता था। फिर भारत सहित विदेशों में निर्यात किया जाता था। जांच ने अवैध खदानों से रिफाइनरियों और राज्य समर्थित निर्यात चैनलों तक के मार्ग का पता लगाया। इसमें कमजोर नियंत्रण और खराब प्रवर्तन की ओर इशारा किया। रिपोर्ट में घाना में पर्यावरणीय क्षति, श्रम शोषण और सार्वजनिक राजस्व की हानि का भी दस्तावेजीकरण किया गया। इससे वैश्विक सोने की आपूर्ति श्रृंखलाओं और कमजोर विनियमन के कारण इस तरह के व्यापार के जारी रहने पर सवाल उठते हैं। 2025 के अंत में घाना के नवगठित प्राधिकरण घाना गोल्ड बोर्ड ने एक भारतीय सोने के व्यापारी के लिए 90,000 अमेरिकी डॉलर का इनाम जारी किया। लेकिन देश के राष्ट्रपति ने यह भी घोषणा की कि गोल्ड बोर्ड अब कानूनी या अवैध रूप से खनन किए गए सोने के बीच कोई अंतर नहीं करेगा। उनके अनुसार सभी सोना बिक्री और निर्यात के लिए योग्य है।

भारतीय अस्पतालों में जानलेवा संक्रमण

इमेज : स्क्रीनशॉट, द स्क्रॉल

द स्क्रॉल के तीन पत्रकारों की इस श्रृंखला में अस्पतालों के भीतर की स्थितियों और जानलेवा संक्रमण की पड़ताल की गई। इनमें से कई संक्रमणों को खुले तौर पर स्वीकार नहीं किया जाता है। इसके परिणामस्वरूप होने वाली मौतों को शायद ही कभी रोके जाने योग्य माना जाता है। टीम ने चिकित्सा अध्ययनों, सरकारी आंकड़ों, अदालती अभिलेखों और डॉक्टरों, नर्सों, मरीजों और उनके परिवारों के साथ साक्षात्कारों से जानकारी जुटाई। श्रृंखला ने दिखाया कि कैसे भीड़भाड़, अस्वच्छता, प्रशिक्षण की कमी और कमजोर संक्रमण नियंत्रण प्रणालियों ने इन घातक संक्रमणों को फैलने दिया है। जांच में बताया गया कि कैसे एंटीबायोटिक दवाओं के व्यवस्थित दुरुपयोग ने प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ा दिया है। इससे संक्रमणों का इलाज करना कठिन हो गया है। खबर बताती है कि कैसे पीड़ितों के परिवार अस्पतालों की कार्रवाई के लिए स्पष्ट जवाब या मुआवजा पाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं।

ऑटोमोबाइल सेक्टर की घायल महिलाएं

इमेज : स्क्रीनशॉट, इंडियास्पेंड

इंडियास्पेंड में यह डेटा-आधारित रिपोर्ट प्रकाशित हुई। इसमें भारत की ऑटोमोबाइल आपूर्ति श्रृंखला में काम करने वाली महिलाओं पर चोटों के प्रभाव की पड़ताल की गई। इसमें दिखाया गया कि घटक कारखानों में नियमित रूप से दोहराव वाले, शारीरिक रूप से कठिन कार्यों को करते समय कई महिलाओं को पीठ दर्द, जोड़ों की समस्या, कटने-फटने, जलने और दीर्घकालिक विकलांगता जैसे गंभीर शारीरिक जोखिमों का सामना करने के बावजूद बहुत कम सहायता मिलती है। कई चोटें दर्ज तक नहीं की जातीं क्योंकि ये महिलाएं अनौपचारिक अनुबंधों के तहत काम करती हैं। उनके पास सुरक्षा उपकरण और स्वास्थ्य लाभों की कमी होती है। वे श्रम अधिकारों से अनभिज्ञ होती हैं और वेतन खोने से डरती हैं। डेटा और श्रमिकों और कार्यकर्ताओं के साथ साक्षात्कारों द्वारा समर्थित इस रिपोर्ट ने श्रम कानूनों के कमजोर प्रवर्तन और कार्यस्थल की खराब सुरक्षा स्थितियों को भी उजागर किया।

दिल्ली में आवारा पशुओं के कारण संकट

इमेज : स्क्रीनशॉट, न्यूजलॉन्ड्री

न्यूजलॉन्ड्री की यह रिपोर्ट में दिल्ली में आवारा पशुओं की बढ़ती समस्या को उजागर करती है। प्रतिदिन हजारों गाय-बैल शहर की सड़कों पर घूमते हैं। परिणामस्वरूप सड़क दुर्घटनाओं में लोग घायल और मृत होते हैं। आवारा पशु घरों, दुकानों और सार्वजनिक संपत्ति को भी नुकसान पहुंचाते हैं। रिपोर्ट में नागरिक समन्वय की कमी और नगर निकायों द्वारा आवारा गायों के लिए संरक्षित गौशालाओं के प्रबंधन में विफलता को उजागर किया गया है। यह भी बताया गया है कि इनमें से कई गौशालाएं अत्यधिक भीड़भाड़ वाली और अपर्याप्त निधि वाली हैं। रिपोर्ट में आंकड़ों, जमीनी रिपोर्टिंग और साक्षात्कारों का उपयोग किया गया। इसने नीति और वास्तविकता के बीच के अंतर को दर्शाया है। यह भी बताया कि अदालती आदेशों और नागरिक अभियानों से समस्या का समाधान नहीं हुआ है। राजनीतिक संवेदनहीनता और प्रशासनिक उपेक्षा ने इस संकट को जीवित रखा है।


दीपक तिवारी जीआईजेएन के हिंदी संपादक और वरिष्ठ भारतीय पत्रकार हैं। वह भोपाल स्थित माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति हैं। एक संवाददाता, उपसंपादक, टेलीविजन कमेंटेटर, मीडिया सलाहकार और एक मीडिया स्टार्टअप के प्रबंध संपादक के रूप में तीन दशकों से अधिक लंबा अनुभव है। वह मध्यप्रदेश राज्य के राजनीतिक इतिहास पर दो पुस्तकों के लेखक भी हैं।

अनुवाद : डॉ. विष्णु राजगढ़िया

 

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