The Norwegian news site VG's investigation into Sudanese militia violence looked into TikTok videos posted by the group and used the same platform to expand the reach of the story. Image: Screenshot, VG
खोजी खबरों में काफी समय लगता है। उन्हें प्रकाशित करने से पहले काफी दिनों तक दस्तावेज़ों की जांच-पड़ताल, इंटरव्यू और पुष्टि का काम चलता है। लेकिन पत्रकारिता में बदलाव अब हमारी उम्मीद से कहीं ज़्यादा तेज़ी से हुआ है। अब ज़्यादातर लोग सोशल मीडिया फीड और मोबाइल पर छोटे-छोटे टुकड़ों में खबरें पढ़ते हैं।
खोजी पत्रकारों के लिए यह एक बड़ी समस्या है। महीनों तक चली जटिल जांच को नए फॉर्मेट में कैसे बदलें? किसी गहन जांच को ऐसे स्वरूप में कैसे बनाएं, जो तेजी से स्क्रॉल करने वाले पाठक के लिए बना हो? ऐसा करते हुए रिपोर्टिंग की विश्वसनीयता को कैसे कायम रखें? अधिकांश मीडिया संगठन अब इसे महज प्रसार अथवा डिस्ट्रिब्यूशन का काम नहीं, बल्कि एडिटोरियल से जुड़ा काम मान रहे हैं। फार्मेट खुद कहानी का हिस्सा बनता जा रहा है। वर्ष 2025 और 2026 के ताजा उदाहरणों में इन बदलावों को देखा जा सकता है। ऐसे बदलाव अब महज प्रयोग नहीं, बल्कि सामान्य हो चुके हैं।
पाठकों तक खबरें पहुंचाने के नए तरीके
वर्देन्स गैंग (वीजी) – यह नॉर्वे का प्रमुख टैबलाइड अखबार है। इसकी स्थापना 1945 में हुई थी। इसने एक बेहतरीन उदाहरण पेश किया है। यहां खोजी खबरों को टिकटॉक और इंस्टाग्राम के लिए छोटे वर्टिकल वीडियो में बदल दिया जाता है। इसका मकसद उन युवा पाठकों तक पहुंचना है, जो पारंपरिक माध्यमों से खबरें नहीं देखते।
‘टिकटॉक बोडेलन जांच 2025’ इसका एक शानदार उदाहरण है। सूडान में सशस्त्र समूहों की हिंसा पर वीजी ने यह खोजी रिपोर्ट की थी। इसमें टिकटॉक वीडियो सिर्फ कहानी शेयर करने का माध्यम नहीं, बल्कि वास्तविक सबूत का हिस्सा भी थे। इस प्रोजेक्ट ने एक अहम बात स्पष्ट की। किसी प्लेटफॉर्म विशेष पर आधारित पत्रकारिता का मतलब सिर्फ अपनी कहानियों को उस नए फार्मेट में बदलना नहीं है। कभी-कभी प्लेटफॉर्म खुद उस जांच का हिस्सा बन जाता है।
इंटरनेशनल न्यूज मीडिया एसोसिएशन (आइएनएमए) के आंकड़े महत्वपूर्ण हैं। वीजी के शॉर्ट-फॉर्म न्यूज वीडियो को 2024 में लाखों बार देखा गया। कई क्लिप्स में 18 से 24 साल के युवाओं की हिस्सेदारी 60-70% रही। इन आंकड़ों के साथ ही एक और दिलचस्प बात है। वीजी में दर्शकों की टिप्पणियों को एडिटोरियल इनपुट माना जाता है। दर्शकों के सवालों और प्रतिक्रियाओं से अगले कंटेंट को आकार मिलता है। इससे किसी इन्वेस्टिगेशन को उसके मूल प्रकाशन के बाद भी बढ़ाने में मदद मिलती है। कोई स्टोरी प्रकाशित होने के बाद ही खत्म नहीं हो जाती।
इसमें एक और बात ध्यान देने लायक है। वीजी की यह रणनीति सिर्फ अच्छे कंटेंट की वजह से काम नहीं करती। रॉयटर्स इंस्टीट्यूट की 2025 की डिजिटल न्यूज़ रिपोर्ट गौरतलब है। इसके अनुसार नॉर्वे में स्थापित न्यूज ब्रांड्स पर जनता का भरोसा काफी ज्यादा है। यह भरोसा टिकटॉक जैसे प्लेटफॉर्म पर भी बना रहता है। नॉर्वे के दर्शक टिकटॉक में वीजी जैसे पारंपरिक मीडिया संगठनों पर सबसे ज़्यादा ध्यान देते हैं। यह उन बाज़ारों से काफी अलग है, जहां इस स्पेस पर क्रिएटर्स, इन्फ्लुएंसर्स या राजनेता हावी रहते हैं।
डेनमार्क की राजधानी कोपेनहेगन में 2025 में ‘नॉर्डिक एआई इन मीडिया समिट’ का आयोजन हुआ। इसमें गार्ड स्टेइरो (‘वीजी’ के प्रधान संपादक और सीईओ) ने महत्वपूर्ण जानकारी दी। उन्होंने कहानी कहने (स्टोरी टेलिंग) का महत्व बनाए रखते हुए पुराने फॉर्मेट पर फिर से सोचने की ज़रूरत बताई। इसका मतलब है अलग-अलग प्लेटफॉर्म पर खबरें पेश करने और लोगों तक पहुंचाने के नए तरीके खोजना। फॉर्मेट की नकल कोई भी कर सकता है। लेकिन जिस भरोसे के कारण पाठकों पर असर होता है, यह सुनिश्चित करना आसान नहीं।
ओसीसीआरपी के दो प्रोजेक्ट इसका अच्छा उदाहरण हैं- ‘स्कैम एम्पायर’ और ‘बैड प्रैक्टिस’ । ये दोनों खोजी रिपोर्टिंग कई देशों के मीडिया संगठनों ने मिलकर की। लेकिन इन्हें किसी एक समय पर एक ही पब्लिकेशन के तौर पर नहीं प्रकाशित नहीं किया गया। इन्हें कई अलग-अलग फॉर्मेट में पेश किया गया। जैसे, लंबी रिपोर्टिंग, विज़ुअल एक्सप्लेनर, सोशल मीडिया टीज़र और स्थानीय स्तर के अनुसार कोई स्वरूप। ‘स्कैम एम्पायर’ इन्वेस्टिगेशन को लगभग दो टेराबाइट लीक हुए डेटा के आधार पर पूरा किया गया था। इसकी पूरी रिपोर्ट के साथ ही इस खबर को सोशल मीडिया पर छोटे एक्सप्लेनर वीडियो और इन्फोग्राफ़िक्स के जरिए भी लोगों तक पहुंचाया गया। जिन लोगों ने ओरिजिनल रिपोर्ट कभी नहीं पढ़ी, उन्हें भी इसके नतीजों के बारे में पता चल गया। इन मीडिया संस्थानों ने खबरों को पाठकों तक पहुंचाने के अतिरिक्त रास्ते बनाए। लेकिन मूल रिपोर्ट भी जारी करके वास्तविक स्वरूप को जिंदा रखा।
हर प्लेटफॉर्म का अलग तरीका है
हर प्लेटफॉर्म में कहानी कहने के अलग-अलग तरीके हैं। यह फर्क सिर्फ तकनीकी नहीं होते। यहां हर प्लेटफॉर्म की विशेषता बताई गई है।
इंस्टाग्राम – व्यवस्थित और विज़ुअल तरीके से कहानी कहने के लिए यह बहुत अच्छा प्लेटफॉर्म है। स्लाइड वाली कैरोजल पोस्ट और रील्स की मदद से आप किसी जटिल जांच को छोटे-छोटे हिस्सों में बांट सकते हैं। इसमें हर हिस्सा पिछले हिस्से से जुड़ा होता है। यह माहौल बनाने के बजाय स्पष्टता को ज़्यादा महत्व देता है। वित्तीय नेटवर्क, टाइमलाइन या कई परतों वाले डेटा से जुड़ी रिपोर्टिंग के लिए यह फॉर्मेट कहानी को समझना आसान बना सकता है।
टिकटॉक – इसमें गुंजाइश कम होती है। आपको शुरुआती कुछ सेकंड में ही लोगों का ध्यान खींचना होता है। इसकी रफ़्तार संदर्भ या बारीकियों के लिए ज़्यादा जगह नहीं देती। टिकटॉक के हिसाब से ढलने के लिए कहानी की लंबाई, बताने के अंदाज़ और रफ़्तार को भी बदलना पड़ता है। कुछ मीडिया संगठन ऐसा समझौता करना पसंद नहीं करते। यह सिर्फ़ तकनीकी सीमा नहीं है। यह इस प्लेटफॉर्म के कल्चर और संपादकीय पहचान के बीच असली तनाव को दिखाती है।
यू-ट्यूब – गहराई से जानकारी देने के लिए यूट्यूब आज भी सबसे अच्छा प्लेटफॉर्म है। लंबे इंटरव्यू, डॉक्यूमेंट्री और समझाने वाले वीडियो (एक्सप्लेनर वीडियो) के जरिए किसी संदर्भ को समझाने का मौका मिलता है। कई स्वतंत्र मीडिया संगठनों के लिए यह सिर्फ अतिरिक्त कंटेंट पोस्ट करने की जगह नहीं, बल्कि उनका मुख्य संपादकीय प्लेटफॉर्म बन गया है।
टेलीग्राम – इसकी भूमिका अलग है। राजनीतिक रूप से पाबंदी वाले माहौल में यह ग्रोथ चैनल के बजाय निरंतरता बनाए रखने वाले टूल के तौर पर ज़्यादा काम करता है। रूस में 2026 में सोशल मीडिया पर नियंत्रण कड़े किए गए। ऐसे में अन्य विकल्प बंद हो गए। लेकिन स्वतंत्र मीडिया के लिए टेलीग्राम काम करता रहा। यह इंस्टाग्राम या टिकटॉक की तरह कंटेंट को बड़े पैमाने पर नहीं फैलाता। लेकिन जब दूसरे प्लेटफॉर्म काम नहीं करते, तब भी यह चलता रहता है।
तुर्की : प्लेटफॉर्म रणनीति ही सहारा
अगस्त 2024 में इंस्टाग्राम को नौ दिनों के लिए ब्लॉक कर दिया गया था। इस्तांबुल के मेयर एक्रेम इमामोग्लू की गिरफ़्तारी के बाद 2025 में काफी विरोध प्रदर्शन हुए। इस दौरान एक्स (ट्विटर), यू-ट्यूब, टिकटॉक, इंस्टाग्राम और टेलीग्राम को लंबे समय तक धीमा कर दिया गया था। ऐसे किसी एक प्लेटफॉर्म पर निर्भर स्वतंत्र मीडिया संगठनों की अपने दर्शकों तक पहुंच अचानक खत्म हो गई। ऐसे में प्लेटफॉर्म में विविधता लाना कोई विकास की रणनीति नहीं, बल्कि एक आकस्मिक योजना होती है। लिहाजा, कई प्लेटफॉर्म का उपयोग एक सही रणनीति है।
इस्तांबुल का एक स्वतंत्र डिजिटल-फर्स्ट न्यूज़ प्लेटफॉर्म, ‘मीडिया स्कोप’ इसका एक उदाहरण है। यह ऐसे शुरुआती मीडिया संगठनों में एक था, जिसने यह बात समझी। हालांकि उसने ऐसा किसी योजना के तहत नहीं किया था। पत्रकार रुसेन काकिर ने मुख्यधारा के मीडिया को छोड़ने के बाद 2015 में इसकी शुरुआत की थी। शुरू से ही उन्होंने अपना मॉडल यू-ट्यूब और लाइव ब्रॉडकास्टिंग पर आधारित रखा। हालांकि यह कोई क्रिएटिव पसंद नहीं थी। दरअसल तुर्की में ब्रॉडकास्टिंग सिस्टम की स्वतंत्रता बाधित हो चुकी थी। देश के मीडिया रेगुलेटर ‘आरटीयूके’ से लाइसेंस लेना महंगा और राजनीतिक रूप से मुश्किल था। विज्ञापन से होने वाली ज़्यादातर कमाई सरकार समर्थक मीडिया को मिलती थी। यह सिस्टम राजनीतिक रूप से स्वतंत्र पत्रकारिता के लिए नहीं था। लेकिन यू-ट्यूब ने एक ऐसा ब्रॉडकास्टिंग मॉडल है, जिसके लिए लाइसेंस की ज़रूरत नहीं थी। पारंपरिक ब्रॉडकास्टिंग के मुकाबले रेगुलेटर्स के लिए इसे सीधे तौर पर कंट्रोल करना मुश्किल था।
नतीजा यह हुआ कि यह मीडिया संस्थान आज भी सोशल मीडिया ऑपरेशन के बजाय टेलीविज़न न्यूजरूम जैसा ज़्यादा लगता है। इसमें लंबी चर्चाएं, लाइव राजनीतिक विश्लेषण और लंबे इंटरव्यू संभव है। ‘मीडिया स्कोप’ ने सिर्फ अपने इंफ्रास्ट्रक्चर में बदलाव किया, न कि कहानी कहने के तरीके (स्टोरी टेलिंग फॉर्मेट) में। इससे ‘प्लेटफॉर्म के अनुरूप पत्रकारिता’ का मतलब समझा जा सकता है।
टी-24 ने एक अलग रास्ता अपनाया। लेकिन वह भी आखिर में उसी जगह पहुंचा। यह पहले एक वेब-बेस्ड न्यूज़ साइट के तौर पर शुरू हुआ था। धीरे-धीरे यू-ट्यूब पर भी इसकी पहुंच बढ़ी। आज टी-24 के यू-ट्यूब चैनल पर 2,52,000 से ज़्यादा सब्सक्राइबर और 14,000 से ज़्यादा वीडियो हैं। यह सब मुख्य रूप से इंटरव्यू और विश्लेषण पर आधारित कार्यक्रमों के लगातार प्रकाशन से हुआ। दिलचस्प बात यह है कि यह विकास किसी सोची-समझी रणनीति के तहत प्लेटफॉर्म बदलने का नतीजा नहीं था। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि दर्शक पहले से ही यू-ट्यूब पर लंबे फॉर्मेट वाली राजनीतिक चर्चाएं देखना चाहते थे। टी-24 उन्हें यह सुविधा दे रहा था। इस तरह प्लेटफॉर्म ने संपादकीय पहचान के हिसाब से खुद को ढाला, न कि संपादकीय पहचान ने प्लेटफॉर्म के हिसाब से।
ऑनलाइन न्यूज़ साइट ‘डाइकेन’ कई सोशल प्लेटफॉर्म पर काम करती है। लेकिन यह मुख्यत: आर्टिकल आधारित है। सोशल मीडिया का काम मुख्य रूप से कंटेंट को ज़्यादा लोगों तक पहुंचाना और पाठकों को वापस वेबसाइट पर लाना है। लेकिन भूकंप संबंधी कवरेज से मामले में अदालती आदेश के बाद एक्स (ट्विटर) ने ‘डाइकेन’ के कंटेंट को ब्लॉक कर दिया। इसके कारण काफी अनिश्चितता का सामना करना पड़ा। जाहिर है कि किसी एक प्लेटफॉर्म पर बनाई गई पहुंच बिना किसी चेतावनी के अचानक खत्म हो सकती है।
बियानेट – यह धीरे-धीरे इंस्टाग्राम पर ज़्यादा विजुअल कंटेंट की ओर बढ़ रहा है। लेकिन उसका तरीका अभी भी सावधानी भरा है। तुर्की का बहुत सारा इंडिपेंडेंट मीडिया लंबे और गहराई से विश्लेषण करने वाली पत्रकारिता पर आधारित था। यह संपादकीय पहचान उन प्लेटफॉर्म पर आसानी से नहीं ढलती जो तेज़ी और इमोशनल रिएक्शन को बढ़ावा देते हैं।
तेयित का मामला बिल्कुल अलग है। अंकारा में स्थित इस फैक्ट-चेकिंग संस्थान ने तुर्की के लगभग किसी भी अन्य स्वतंत्र संस्थान की तुलना में टिकटॉक का ज़्यादा इस्तेमाल किया। फैक्ट-चेकिंग के काम को देखते हुए यह बात समझ में भी आती है। तेयित ने 2023 में 157 टिकटॉक वीडियो पब्लिश किए। इसे लगभग 12 मिलियन व्यूज़ और 160,000 इंटरेक्शन मिले। इस कंटेंट में तुर्की के हालिया इतिहास की कुछ सबसे मुश्किल खबरें शामिल थीं। जैसे, 6 फरवरी के भूकंप, 2023 के राष्ट्रपति चुनाव और वहां जारी क्षेत्रीय संघर्ष। भूकंप के दौरान तेयित के छोटे वेरिफिकेशन क्लिप्स रियल-टाइम में शेयर किए जा रहे थे। इनमें किसी वायरल हो रही गलत जानकारी का सच बताया जा रहा था। उस समय फेक न्यूज के कारण पाठकों में काफी कन्फ्यूजन था। इस फॉर्मेट की तेजी उस समय की जरूरत के हिसाब से बिल्कुल सही थी।
फैक्ट-चेकर ओयक्यूम हुमा केसकिन ने 2024 में पॉयंटर द्वारा प्रकाशित एक लेख ‘Yes You Can Fact-Check on TikTok’ में टेयिट के बारे में जानकारी दी। उन्होंने लिखा- “हमने सही समय पर काम किया, मज़ेदार फिल्टर के साथ प्रयोग किए और अपने लंबे-चौड़े विश्लेषण को कुछ सेकंड के ट्रेंडिंग क्लिप्स में बदल दिया।”
फैक्ट-चेकिंग कंटेंट का स्वरूप छोटे वीडियो के लिए एकदम सही है। यहां दावा है, यहां हमें जो मिला वह है, और यहां जवाब है। भ्रष्टाचार की छह महीने लंबी जांच की तुलना में इसे टिकटॉक के लिए ढालना कहीं ज़्यादा आसान है। इस प्लेटफॉर्म पर टेयिट की सफलता की वजह सिर्फ फॉर्मेट के साथ क्रिएटिव होने तक सीमित नहीं है। यह फैक्ट-चेकिंग और टिकटॉक के कंटेंट के बीच एक असली तालमेल को दिखाता है। डॉयचे वेले के नेतृत्व में शुरू हुए न्यूज़ चैनल +90 (+90) ने एक और तरीका अपनाया। उनका कंटेंट पारंपरिक खबरों को इंस्टाग्राम के लिए बदला गया जैसा नहीं दिखता। ऐसा लगता है जैसे खबरों को शुरू से ही उसी फॉर्मेट के लिए बनाया गया हो। जैसे-जैसे मीडिया का माहौल बदल रहा है, यह फर्क और साफ हो जाएगा।
अलग-अलग दबाव, एक जैसी समस्या
नॉर्वे और तुर्की के मीडिया संगठनों के ‘प्लेटफॉर्म के अनुरूप स्टोरी टेलिंग’ में निवेश करने के कारण एक जैसे नहीं हैं।
वीजी अखबार का मकसद साफ़ है- युवा दर्शक अब खोजी खबरों तक नहीं पहुंच रहे हैं। खबरें उन तक नहीं पहुंचतीं, जहां वे मौजूद हैं। तुर्की में जनवरी 2026 की न्यूज लैब तुर्की रिपोर्ट ने इसे स्पष्ट किया- देश में स्वतंत्र पत्रकारिता का मकसद अब टिकाऊ बिजनेस बनाने तक सीमित नहीं है। हमें लगातार जारी राजनीतिक और आर्थिक दबाव के बीच काम करते रहने के तरीके खोजना है। प्लेटफॉर्म विविधता का मकसद सिर्फ़ प्रासंगिक बने रहना नहीं, बल्कि लोगों की पहुंच में बने रहना भी है।
लेकिन दोनों तरह के दबावों का नतीजा एक ही तरह के संपादकीय दृष्टिकोण के बतौर सामने आता है। ऐसी खबरें, जो कई रूपों में और कई जगह पर मौजूद हों, ताकि अलग-अलग संदर्भों में दर्शकों तक पहुंच सके। टिकटॉक दर्शकों या टेलीग्राम के अनुरूप किसी खबर को बनाना असल में संपादकीय काम है। इसके लिए सिर्फ डिजाइन संबंधी कुशलता की नहीं, बल्कि सही फैसले लेने की समझ की भी ज़रूरत होती है।
अधिकांश न्यूजरूम अब भी इस सवाल पर काम कर रहे हैं कि क्या बदलाव किया जाए। असल सवाल यह है कि स्वरूप बदलने के बाद मूल खबर का कितना हिस्सा बचा रहता है।
मेर्वे एरिसोय: ग्रीनपीस मेडिटेरेनियन और ऑक्सफैम केईडीवी जैसे एनजीओ में डिजिटल कम्युनिकेशन संबंधी दायित्व संभाल चुकी हैं। वह जटिल मुद्दों को आसान और दिलचस्प स्वरूप में बदलकर अधिकतम लोगों तक पहुंचाने पर ध्यान देती हैं।
अनुवाद : डॉ. विष्णु राजगढ़िया