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इंटरनेट पर दुष्प्रचार का पर्दाफ़ाश कैसे करें

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‘दुष्प्रचार की जड़ का पर्दाफाश‘ विषय पर ग्लोबल इन्वेस्टिगेटिव जर्नलिज़्म नेटवर्क की वैश्विक कॉन्फ़्रेन्स #GIJC21 में एक कार्यशाला हुई। इसमें दो विशेषज्ञ पत्रकारों ने महत्वपूर्ण सुझाव दिए। कुछ उपकरणों की भी जानकारी दी। फर्जी खबरों का फंडाफोड़ करने वाले पत्रकारों के लिए उपयोगी सुझाव यहां प्रस्तुत हैं:

आज दुनिया भर में गलत सूचनाओं और दुष्प्रचार के काफी मामले सामने आ रहे हैं। खोजी पत्रकार ऐसे मामलों की जांच करके पता लगाते हैं कि इसके पीछे कौन है। लेकिन प्रोपब्लिका से जुड़े पत्रकार क्रेग सिल्वरमैन इसे पर्याप्त नहीं मानते। उनका कहना है कि दुष्प्रचार करने वालों की मंशा समझना भी उतना ही जरूरी है। इसके लिए उन्होंने बारहवीं ग्लोबल इन्वेस्टिगेटिव कॉन्फ्रेंस में कई सुझाव दिए।

क्रेग सिल्वरमैन के अनुसार अधिकांश दुष्प्रचार अभियानों में ‘गलत संदर्भ‘ का उपयोग होता है। किसी तथ्यात्मक बयान या वास्तविक उद्धरण को उसके मूल अर्थ से अलग कर दिया गया है। कई मामलों में गुमराह करने के लिए उसे फिर से गलत रूप में तैयार किया गया है। इसलिए गलत सूचनाओं या दुष्प्रचार की जांच के दौरान आप उस संदर्भ को ध्यान में रखें। यदि आप केवल झूठी बातों के सच की तलाश कर रहे हैं, तो आप कुछ महत्वपूर्ण चीज से वंचित रह जाएंगे।

जीआइजेसी-21 में Exposing the Roots of Disinformation विषय पर कार्यशाला हुई। इसमें ऑनलाइन कुप्रचार की विशेषज्ञ पत्रकार जेन लिटविनेंको ने भी महत्वपूर्ण सुझाव दिए। वह शोरेंस्टीन सेंटर ऑन मीडिया, पॉलिटिक्स एंड पब्लिक पॉलिसी (हॉर्वर्ड) की सीनियर रिसर्च फेलो हैं। वह बताती हैं कि दुष्प्रचार अभियान अक्सर रणनीतिक रूप से शुरू किए जाते हैं। ऐसे अभियानों के कई चरण होते हैं। कहीं इसकी योजना बनाई जाती है, कहीं उसे सोशल मीडिया पर फैलाया जाता है। ऐसे अभियानों को हम पत्रकारों की प्रतिक्रियाओं का सामना करना पड़ता है। पत्रकारों द्वारा सच उजागर कर दिए जाने के कारण कई दुष्प्रचार अभियान अपने प्रारंभिक चरण में ही विफल हो जाते हैं।

इन दोनों पत्रकारों ने दुष्प्रचार अभियानों की जड़ तक पहुंचने के लिए कई महत्वपूर्ण सुझाव दिए। कई उपयोगी टूल्स की भी जानकारी दी। प्रमुख सुझाव यहां प्रस्तुत हैं।

दुष्प्रचार की जांच के प्रमुख तरीके

वीडियो और तस्वीरों की जांच

किसी दुष्प्रचार में वीडियो और तस्वीरों का दुरूपयोग होता है। इनके तथ्यों की जांच करके पत्रकार सच्चाई का पता लगाते हैं। ऐसी जांच करते समय पत्रकारों को देखना चाहिए क्या यह एक मौलिक वीडियो या फोटो है? इसमें कोई छेड़छाड़ की गई है या नहीं। यदि मौलिक है तो इसे किसने और कब कैप्चर किया? इसकी फोटोग्राफी या वीडियोग्राफी किस स्थान पर हुई। इससे आपको उसका भौगोलिक पता लगाने में मदद मिलेगी।

दोनों पत्रकारों ने वी-वेरीफाई (WeVerify) टूल के उपयोग का सुझाव दिया। यह एक सत्यापन प्लग-इन है, जो क्रोम के साथ काम करता है। इसे इंस्टॉल करने के बाद आप टिन-आई (TinEye), बिंग (Bing) और यानडेक्स (Yandex) सहित अन्य सर्च इंजनों के माध्यम से किसी फोटो की जांच कर सकेंगे। किसी फोटो के एक खास हिस्से को हाइलाइट करके केवल उस हिस्से की जांच भी संभव है। यानडेक्स में चेहरा पहचानने की क्षमता भी है। हालांकि इस तकनीक के जरिए प्राप्त नतीजों का अन्य तरीकों से सत्यापन करना जरूरी है। जेन लिटविनेंको कहती हैं- “इमेज सर्च के लिए आपको गूगल सर्च से आगे जाना होगा। वी-वेरीफाई सर्च एक्सटेंशन आपको ऐसा करने की सुविधा देता है।“

सोशल मीडिया अकाउंट्स की जांच

दुष्प्रचार का पर्दाफाश करने के लिए सोशल मीडिया अकाउंट्स में शेयर की गई सामग्री की जांच करना काफी उपयोगी है। सबसे पहले यह जांचें कि क्या यह एक सत्यापित खाता है? जिस व्यक्ति के नाम पर यह अकाउंट बनाया गया है, उसी व्यक्ति का है अथवा नहीं? यह अकाउंट कब बनाया गया? उसमें वह व्यक्ति खुद को क्या बताता है? इस तरह उसकी पृष्ठभूमि की विस्तृत जांच करें। उसका नेटवर्क उस व्यक्ति के बारे में क्या कहता है? उसकी फ्रेंड लिस्ट में कौन लोग शामिल हैं? वह किन लोगों से नियमित रूप से बात करता है? वह किन लोगों की पोस्ट को शेयर और लाइक करता है? सोशल मीडिया में पोस्टिंग तथा कमेंट्स का उसका पैटर्न क्या हैं? क्या वह नियमित रूप से पोस्टिंग करता है? वह किन विषयों पर पोस्ट डालता है? इन प्रवृतियों की जांच से आप उसके बारे में बहुत कुछ समझ सकते हैं।

क्रेग सिल्वरमैन ने कहा- “जांच के दौरान कई बार आप देखते हैं कि कोई अकाउंट जिस प्रकार के व्यक्ति का होने का दावा किया गया है, और उसमें जिस तरह की सामग्री पोस्टिंग की गई है, इन दोनों के बीच कोई तालमेल नहीं दिखता। ऐसे विरोधाभास से आपको बहुत कुछ समझने का अवसर मिलता है। यही वह चीज है, जिसकी आपको तलाश है।“

ट्विटोनॉमी (Twitonomy) एक अच्छा उपकरण है। इसके जरिए आप किसी ट्विटर अकाउंट का विस्तृत और विजुअलाइज्ड विश्लेषण प्राप्त कर सकते हैं। क्रेग सिल्वरमैन ने कहा- “यह आपको बताता है कि वह कितनी बार ट्वीट करता है, वह कब ट्वीट करता है, दूसरे किन लोगों को जवाब देता है, और किसको रीट्वीट करता है। उनके ट्वीट करने के समय की जानकारी से पता लगाने में मदद मिलेगी कि वह किस समय-क्षेत्र में है।“

चैट ऐप्स की जांच

क्रेग सिल्वरमैन द्वारा संपादित पुस्तक (Verification Handbook: For Disinformation And Media Manipulation), जो पत्रकारों को गलत सूचनाओं की जांच में मदद करती है। इमेज – स्क्रीनशॉट

गलत सूचनाएं फैलाने के लिए कई चैट ऐप्स का दुरूपयोग किया जाता है। लेकिन ऐसे चैट ऐप्स की जांच की कुछ सीमा हैं। जेन लिटविनेंको कहती हैं- “चैट ऐप्स और किसी ट्विटर या फेसबुक प्रोफाइल में काफी फर्क है। ट्विटर या फेसबुक जैसे सार्वजनिक मंच पर कोई व्यक्ति सचेत रूप से अपनी कोई जानकारी आम जनता के लिए डालता है। लेकिन चैट ऐप्स वह किसी एक व्यक्ति या किसी छोटे समूह विशेष के लोगों के लिए कोई जानकारी शेयर करता है। इसलिए चैट ऐप्स में गोपनीयता की अपेक्षा होती है। जब आप उस पर रिपोर्ट करते हैं तो सावधान रहना होगा।“

जेन लिटविनेंको बताती हैं कि इन सीमाओं को पार करके दुष्प्रचार का पता लगाने का एक तरीका किसी जानकारी को ‘क्राउड सोर्सिंग‘ करना है। ब्राजील के कोम्प्रोवा प्रोजेक्ट (Comprova Project) में इसका सफल प्रयोग हुआ। इसमें 24 मीडिया संगठनों ने एक साथ मिलकर इस परियोजना पर काम किया। वर्ष 2018 में ब्राजील के चुनावों को प्रभावित करने के लिए फैलाई गई अफवाहों और मनगढ़ंत फर्जी सामग्री की जांच की गई।

जेन लिटविनेंको कहती हैं- “इस परियोजना के तहत एक खास व्हाट्सएप नंबर पर आम लोगों से दुष्प्रचार की जानकारी मांगी गई। सभी मीडिया संगठनों ने अपने पाठकों और दर्शकों को वही व्हाट्सएप नंबर भेजा। आम लोगों ने सभी प्रकार की अपुष्ट या संदिग्ध सामग्री की जांच के लिए उस व्हाट्सएप नंबर पर भेजना शुरू किया। इसके कारण ऐसे दुष्प्रचार को उजागर करना संभव हुआ। इसलिए आम लोगों से मदद मांगने के ऐसे तरीकों का काफी महत्व है। व्हाट्सएप जैसे चैट ऐप्स के माध्यम से कुप्रचार का पता लगाने में यह क्राउड सोर्सिंग विधि काफी अच्छी तरह से काम करती है। इसके बगैर व्हाट्सएप चैट के दुष्प्रचार का पता लगाना बहुत मुश्किल है। आप व्हाट्सएप के उन समूहों में शामिल नहीं हो सकते, जिन्हें सार्वजनिक नहीं किया गया है।“

टीजीस्टेट (Tgstat) भी एक उपयोगी चैनल सर्च और एनालिटिक्स टूल है। यह एन्क्रिप्टेड मैसेजिंग ऐप ‘टेलीग्राम‘ की सामग्री की जांच में काफी उपयोगी है। इससे आपको किसी विशेष चैनल से जुड़े लोगों की जानकारी मिल सकती है। जेन लिटविनेंको कहती हैं- “यदि आप टीजीस्टेट में किसी व्यक्ति का नाम डालकर सर्च करें, तो 90 दिनों तक विश्लेषण मिल सकता है। आप देख सकते हैं कि क्या बड़ी संख्या में लोग उस चैनल से जुड़े, या किसी दिन उसकी सामग्री ज्यादा लोकप्रिय हुई।“

दोनों पत्रकारों ने इन उपकरणों की मदद से सावधानीपूर्वक रिपोर्टिंग की सलाह दी। उन्होंने किसी भी निर्णय तक पहुंचने से पहले अतिरिक्त सावधानी बरतने और ठोस सबूत इकट्ठा करने का आग्रह किया। क्रेग सिल्वरमैन ने चेतावनी दी- “फर्जी खबरों का भंडाफोड़ करने वाले पत्रकार कई बार बिना आधार के किसी नतीजे पर पहुंचकर खुद गलत साबित हो जाते हैं। इसलिए सावधान रहें। अपने सबूत इकट्ठा करें। बड़ी मात्रा में सबूत जुटाएं ताकि आपके पास काफी उच्च स्तर का आत्मविश्वास पैदा हो सके।“

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