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स्वतंत्र पत्रकारिता के लिए स्वार्थ रहित फंडिंग की तलाश!

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तीन आलेखों की श्रृंखला का यह पहला आलेख है। इस श्रृंखला का नाम है: सेविंग जर्नलिज्म-2: वैश्विक रणनीति और खोजी पत्रकारिता। कोलंबिया यूनिवर्सिटी के ‘स्कूल ऑफ इंटरनेशनल एंड पब्लिक अफेयर्स‘ में प्रौद्योगिकी, मीडिया और संचार कार्यक्रम की निदेशक अन्या शिफरीन  के नेतृत्व वाली टीम की यह एक नई रिपोर्ट है। इसमें गूगल और फेसबुक के अनुदान पर मीडिया संगठनों की बढ़ती निर्भरता से जुड़े खतरों पर चर्चा की गई है एवं समाधान भी बताये गए हैं। 

वर्ष 2021 में गुणवत्तापूर्ण पत्रकारिता के लिए मिला-जुला माहौल रहा। दुनिया के कई हिस्सों में मीडिया पर भरोसा बढ़ता दिखा। दर्शकों, पाठकों की संख्या भी बढ़ी है। यूके में ‘गार्जियन‘ जैसे कुछ मीडिया संगठनों के लिए यह वर्ष शानदार रहा। ‘न्यूयॉर्क टाइम्स‘ और ‘द अटलांटिक‘ को भी बड़ी संख्या में सशुल्क ग्राहक जोड़ने में  सफलता मिली। हालांकि प्रिंट मीडिया के विज्ञापन और सदस्यता राजस्व, दोनों में गिरावट देखी गई।

सारा स्टोनबेली, पेनी एबरनेथी और फिल नेपोली जैसे शिक्षाविदों के शोध के अनुसार अमेरिका में स्थानीय समाचारों की संख्या में गिरावट आने के कारण ‘न्यूज डेजर्ट‘ का खतरा महसूस हो रहा है। ‘न्यूज डेजर्ट‘ का अभिप्राय यह है कि किसी शहरी, ग्रामीण या सुदूर क्षेत्र के किसी समुदाय या कमजोर वर्ग की खबरें मीडिया तक नहीं पहुंचती हों, अथवा समाचार माध्यमों तक उन लोगों की पहुंच मुश्किल हो।

अन्य कई शोध भी वर्ष 2021 में मीडिया के राजस्व पर महत्वपूर्ण जानकारियां देते हैं। वैश्विक स्तर पर स्थानीय या देशी डिजिटल मीडिया संगठनों के विज्ञापन राजस्व में मुख्यधारा के मीडिया के मुकाबले गिरावट आई है। कोरोना महामारी से पहले भी उनका विज्ञापन राजस्व पर्याप्त नहीं था। ऐसे डिजिटल मीडिया संगठनों को मुख्यतः परोपकार के नाम पर मिलने वाले अनुदान पर निर्भर होना पड़ता है। गूगल और फेसबुक ने अपना अनुदान बढ़ाया है। ‘सेम्ब्रा मीडिया‘ ने एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका में 202 डिजिटल मीडिया संगठनों का सर्वेक्षण किया। पता चला कि उन्हें 2020 में औसतन 31 फीसदी राजस्व किसी अनुदान के माध्यम से मिला। विज्ञापनों से 21 प्रतिशत राजस्व आया। इसमें गूगल ऐडसेंस, संबद्ध विज्ञापन, प्रायोजित सामग्री और स्थानीय या देशी विज्ञापन शामिल हैं।

हमने अपनी पिछली रिपोर्ट में मीडिया की मदद के लिए व्यवस्थित समाधान तलाशने की जरूरत बताई थी। हमारी इस सलाह का स्वागत हुआ है और इसे लेकर उत्साह बरकरार है। पत्रकारों और मीडिया विकास विशेषज्ञों का स्पष्ट मानना है कि भ्रष्टाचार रोकने और निरंकुशता से लड़ने के लिए स्वतंत्र एवं गुणवत्तापूर्ण पत्रकारिता बेहद जरूरी है। इसलिए ऐसी पत्रकारिता के विकास के लिए पर्याप्त निवेश भी करना होगा। इसमें सरकारी सहायता भी उपयोगी हो सकती है। उस रिपोर्ट में बताया है कि किस प्रकार के विकल्प तलाशे जा रहे हैं। एक डोनर ने कहा- “हम मीडिया के व्यवसाय मॉडल में एक बदलाव देख रहे हैं। व्यापक जनहित में मीडिया की रुचि बढ़ती दिख रही है। इन्हें सरकारों तथा दानदाताओं की मदद भी मिल रही है।“

गुणवत्तापूर्ण पत्रकारिता की रक्षा पर दुनिया भर में कई तरह का दृष्टिकोण है। अमेरिका में पत्रकारिता के लिए सरकारी सहयोग के विचार को समर्थन मिल रहा है। अर्जेंटीना या मैक्सिको जैसे देशों में सरकारी सहयोग से पत्रकारिता को नुकसान का संदेह है। उप-सहारा अफ्रीका में एक विचार यह है कि जहां बुनियादी जरूरतें पूरी नहीं होती, वहां पत्रकारिता को प्राथमिकता देना उचित नहीं है।

मीडिया द्वारा सरकारी सहयोग लेने के खतरों पर चिंता भी जताई जाती है। दूसरी ओर, कई मीडिया संगठनों को विदेशी सरकारों से विकास सहायता के रूप में अनुदान लेने में कोई परहेज नहीं। उन्हें बड़े फाउंडेशन संस्थानों के अलावा गूगल और फेसबुक का धन भी स्वीकार है। हमारे साक्षात्कार में एक अनुदानकर्ता ने कहा- “गूगल और फेसबुक अपने बारे में शिकायत न करने के लिए काफी पैसा देते हैं।“

गूगल और फेसबुक के अनुदान पर मीडिया संगठनों की बढ़ती निर्भरता चिंताजनक है। इनका यह परोपकार अन्य राजस्व स्रोत की तरह अप्रत्याशित है। ऐसे अनुदान के साथ कोई दीर्घकालिक प्रतिबद्धता नहीं जुड़ी है। इसके अलावा, गूगल और फेसबुक उन क्षेत्रों में ज्यादा अनुदान देना चाहते हैं, जहां उन्हें नियम-कानूनों का डर होता है। जैसे, यूरोप में। इसी तरह, जहां समाचार के लिए भुगतान करने की आवश्यकता होती है, जैसे ऑस्ट्रेलिया में, वहां भी गूगल और फेसबुक द्वारा अनुदान दिया जाता है। पत्रकारिता और अकादमिक शोध के नाम पर अनुदान देने के पीछे उनका उद्देश्य जनसंपर्क बनाना और सद्भावना खरीदना होता है। नए नियम बनाने के लिए गूगल और फेसबुक द्वारा सरकारों के पास पैरवी की जा रही है। इनके द्वारा अब यूरोपीय संघ में ऐसी पैरवी पर सबसे अधिक खर्च किया जा रहा है। इस क्षेत्र में यह राशि 97 मिलियन यूरो वार्षिक है।

नीति निर्माताओं तक ऐसे तकनीकी लॉबिस्टों की काफी आसान पहुंच हो जाती है। इनके संदेश को थिंक टैंक और तीसरे पक्ष द्वारा आगे बढ़ाया जाता है। इस प्रकार, मीडिया संगठनों को दिया गया उनका अनुदान वस्तुतः उनके बड़े जनसंपर्क प्रयासों का हिस्सा है।

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कॉरपोरेट की इस ताकत के कारण स्वतंत्र और निष्पक्ष पत्रकारिता पर खतरा है। गूगल और फेसबुक जैसी बड़ी तकनीकी कंपनियों के पास मीडिया संगठनों पर कब्जा करने की क्षमता है। इसके कारण यह आशंका बनती है कि मीडिया उनका सच सामने लाने के बजाय खामोश हो जाए। इसलिए, कई लोगों ने सुझाव दिया कि बड़ी तकनीकी कंपनियों से सीधे भुगतान लेने के बजाय इनसे अधिक टैक्स लिया जाए। उस राशि का एक हिस्सा गुणवत्तापूर्ण पत्रकारिता की मदद के लिए निर्धारित हो। ‘फ्री प्रेस‘  से जुड़े टिम कर्र ने स्वतंत्र और जनपक्षधर पत्रकारिता के लिए ऑनलाइन विज्ञापन पर टैक्स लगाने का प्रस्ताव दिया।

स्वतंत्र पत्रकारिता की मदद किस तरह की जाए, इस विषय पर वर्ष 2021 में कई शोध हुए। नए प्रस्तावित ब्लूप्रिंट भी देखने को मिले। ‘रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स‘ की जून 2021 की रिपोर्ट: ‘ए न्यू डील फॉर जर्नलिज्म‘ काफी व्यापक है। इसमें दर्जनों विशेषज्ञों ने मिलकर काफी महत्वपूर्ण सुझाव दिए हैं।

मीडिया से जुड़े काफी अच्छे विचार सामने आए हैं। हालांकि जिन मामलों में विभिन्न नियम कानूनों के विकल्प काम करते हैं, उन पर शोध कम हुआ है। कई बार यह स्पष्ट नहीं हो पाता कि कौन सी चीज प्रभावी होगी। खासकर, दानदाताओं से समन्वय की कमी महसूस की जा रही है। हालांकि सहयोगी परियोजनाओं को बढ़ाने के प्रयास किए जा रहे हैं।

छोटे मीडिया संगठनों और बड़े स्थापित घरानों के बीच तनाव से जुड़े मामलों पर भी नीतिगत चर्चा जारी है। विभिन्न नीतियों और सहयोग के विभिन्न प्रकारों से हरेक को अलग किस्म से लाभ होता है। इसलिए वे अक्सर आमने-सामने होते हैं। यही कारण है कि दानदाताओं को भी स्थानीय समाचारों की संख्या में गिरावट आने और ‘न्यूज डेजर्ट‘ का खतरा महसूस हो रहा है। विभिन्न देशों और समुदायों द्वारा इन मामलों में सुधार के तरीकों की खोज जारी रखा है। किसी एक देश में भी अगर समुचित नियम बना लिए जाएं, तो गूगल, फेसबुक और ट्विटर को अन्य क्षेत्रों में भी अपना व्यवहार बदलने के लिए मजबूर होना पड़ सकता है।

मीडिया संगठनों की मदद के वैश्विक प्रयास

अफ्रीका में कई पारंपरिक मीडिया संगठन के विज्ञापन राजस्व में भारी गिरावट आई है। ‘इंटरनेशनल फैक्ट चेकिंग नेटवर्क‘ के वरिष्ठ सलाहकार एवं अनुभवी पत्रकार पीटर कुनलिफ-जोन्स कहते हैं- “बिजनेस मॉडल पर यह दबाव ऐसे समय में आया है, जब सरकारों द्वारा मीडिया पर कब्जा करने की कोशिशें जारी हैं, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का दमन हो रहा है और ‘फेक न्यूज‘ रोकने के नाम पर नए कानून बनाए जा रहे हैं।“

ब्रैंको ब्रिकिक (सह-संस्थापक, डेली मावेरिक) कहते हैं – “अनुदान के नाम पर मीडिया को पानी की महज कुछ टपकती हुए बूंदें ही मिल रही हैं। जबकि दक्षिण अफ्रीका की बाल्टी का पूरा पानी बाहर गिर गया है। अफ्रीकी पत्रकारिता को बचाने के लिए बड़े पैमाने पर अनुदान की जरूरत है। दुनिया भर में जिम्मेदार मीडिया संगठनों की मदद के लिए प्रतिवर्ष एक बिलियन डाॅलर की आवश्यकता है। वर्तमान में समर्थन की राशि बहुत कम है।“

ब्रैंको ब्रिकिक कहते हैं – “गुणवत्तापूर्ण मीडिया का निर्माण करना पूरे समाज को ठीक करने का सबसे सस्ता तरीका है। जवाबदेही के बिना कोई लोकतंत्र नहीं हो सकता है। स्वतंत्र और निर्भीक मीडिया के बिना जवाबदेही नहीं हो सकती है। सालाना एक अरब डॉलर खर्च करके आप पूरी समस्या का समाधान कर सकते हैं।“

जुलाई 2020 में गूगल के समाचार आपातकालीन कोष  ने कहा कि 115 देशों में 5,700 मीडिया संगठनों के लिए 40 मिलियन डॉलर का आवंटन किया गया। डिजिटल न्यूज इनोवेशन फंड  ने यूरोप के 30 देशों में 662 डिजिटल न्यूज आउटलेट्स को लगभग 175 मिलियन डॉलर का अनुदान दिया।

परोपकार की सीमाएं

अनगिनत मीडिया संगठनों को परोपकार के रूप में मिले दान पर भरोसा है। लेकिन ऐसे वित्त-पोषण की अपनी सीमाएँ हैं। इसमें पत्रकारिता की स्वतंत्रता बाधित होने का बड़ा खतरा है। ऐसे अनुदान पर निर्भर होने के बाद मीडिया संगठन के लिए सतत विकास की अपनी क्षमता भी कम हो सकती है। गूगल और फेसबुक ने प्रमुख दानदाता की हैसियत बना ली है। लेकिन इन्हें अनुदान हेतु मीडिया संगठनों के चयन, निस्वार्थ भावना के साथ वित्त-पोषण और कोई हस्तक्षेप नहीं करने जैसी नीतियां अपनानी होंगी। इसके लिए गूगल और फेसबुक को अन्य प्रमुख दानदाताओं की ऐसी नीतियों से सीखना चाहिए। फिलहाल उनका अनुदान मुख्यतः जनसंपर्क का एक हिस्सा है। इसका उद्देश्य सद्भावना खरीदना है। जिन देशों की सरकारें नए नियम-कानून बनाने पर विचार कर रही हैं, वहां ज्यादा अनुदान देकर इसे रोकने की कोशिश भी देखी जा रही है।

छोटे मीडिया संगठनों के लिए छोटे अनुदान भी काफी मायने रखते हैं। इसलिए गूगल और फेसबुक से मिले अनुदान को व्यापक रूप से स्वीकार किया जा रहा है। जो मीडिया संगठन अपनी चुनी हुई सरकारों से टैक्स माफी स्वीकार करने से हिचकिचाते हैं, वे भी गूगल और फेसबुक का धन खुशी-खुशी लेते हैं। जबकि इन दोनों के पीछे बड़े पैमाने पर लॉबिंग करने वाली ताकतों और प्रभावशाली वर्ग के हित जुड़े हैं। इन सबके बावजूद ऐसी फंडिंग से इंकार करना अब कई मीडिया संगठनों के लिए अब संभव नहीं है। इसलिए ऐसी फंडिंग के संभावित खतरों के बारे में जागरुकता बढ़ाना जरूरी है। साथ ही, इन नए दानदाताओं (गूगल और फेसबुक) पर उच्च मानदंड अपनाने और मीडिया की स्वतंत्रता में हस्तक्षेप नहीं करने के लिए दबाव पैदा करना भी जरूरी है।

यह आलेख ‘सेविंग जर्नलिज्म-2: वैश्विक रणनीति और खोजी पत्रकारिता‘ का एक अंश है। कोनराड एडेनॉयर स्टिफ्टंग द्वारा प्रकाशित इस आलेख को अनुमति लेकर यहां पुनर्प्रकाशित किया जा रहा है।

अतिरिक्त संसाधन

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Bridging the Gap: Rebuilding Citizen Trust in the Media


आन्या श्रिफ़िन  कोलंबिया यूनिवर्सिटी के स्कूल ऑफ इंटरनेशनल एंड पब्लिक अफेयर्स में प्रौद्योगिकी, मीडिया और संचार कार्यक्रम की निदेशक हैं। हन्ना क्लिफोर्ड स्कूल ऑफ इंटरनेशनल एंड पब्लिक अफेयर्स में एमपीए-डीपी कैंडिडेट हैं। थियोडोरा डेम एडजिन-टेटी  स्कूल ऑफ जर्नलिज्म एंड मीडिया स्टडीज, रोड्स यूनिवर्सिटी, दक्षिण अफ्रीका में पोस्ट-डॉक्टरल फेलो हैं। रयान ली  कोलंबिया विश्वविद्यालय में सुरक्षा, प्रौद्योगिकी और मीडिया विषय पर मास्टर ऑफ इंटरनेशनल अफेयर्स के कैंडिडेट हैं। मैथ्यू रेसियो-क्रूज कोलंबिया विश्वविद्यालय में मास्टर ऑफ इंटरनेशनल अफेयर्स के कैंडिडेट हैं। यहां उन्होंने 2021 में मास्टर ऑफ साइंस इन जर्नलिज्म की शिक्षा ली।

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