Image: Screenshot "The Dynasty"
वर्ष 2025 की शुरुआत में ‘द डायनेस्टी’ नामक चर्चित वृत्तचित्र को रिलीज किया गया था। हंगरी के प्रधानमंत्री विक्टर ओर्बन के परिवार के व्यापारिक लेन-देन पर बनी इस 55 मिनट की खोजी फिल्म ने लाखों लोगों का ध्यान आकर्षित किया। हंगरी की राजधानी बुडापेस्ट स्थित न्यूज़ रूम ‘डायरेक्ट-36’ ने इसे बनाया। इसमें दिखाया गया कि प्रधानमंत्री के दामाद इस्तवान टिबोर्ज़ और अन्य करीबी लोगों ने सरकारी ठेकों और परियोजनाओं के जरिए अकूत धन अर्जित किया।
एक सप्ताह के भीतर इस फिल्म को 27 लाख से अधिक बार देखा गया। अब यह संख्या 40 लाख के करीब पहुंच रही है। लगभग 95 लाख की आबादी वाले देश के लिए यह बड़ा आंकड़ा है।
इस सफलता के पीछे की कहानी शायद इसके खुलासों जितनी ही महत्वपूर्ण है। ‘द डायनेस्टी’ डॉक्यूमेंट्री फिल्म दिखाती है कि कैसे उद्देश्य-प्रेरित छोटे मीडिया संस्थान सिनेमाई कहानी के जरिए अपनी पहुंच बढ़ा सकते हैं। ऐसा करके वे नए पाठक और दर्शकों आकर्षित कर सकते हैं। इस माध्यम से सरकारी दावों को को चुनौती देना भी संभव है।
खोजी पत्रकारिता संस्थान ‘डायरेक्ट-36’ के सह-संस्थापक और निदेशक एंड्रास पेथो के लिए यह बड़ी सफलता है। ‘ट्रांजिशन्स’ के प्रधान संपादक जेरेमी ड्रकर ने उनके साथ इस फिल्म के निर्माण संबंधी विषयों पर बातचीत की। अन्य स्वतंत्र मीडिया के लिए इससे मिलने वाले सबक पर भी चर्चा हुई। इस बातचीत के प्रमुख अंश प्रस्तुत हैं।
जेरेमी ड्रकर : आपने शायद ऐसी सफलता की उम्मीद भी नहीं की होगी। अब पीछे मुड़कर देखें, तो मुझे यकीन है कि डॉक्यूमेंट्री बनाने में लगी मेहनत सार्थक रही। लेकिन शुरू करने से पहले क्या आपको कोई संदेह था? एक छोटे स्वतंत्र मीडिया संस्थान के रूप में क्या आपने कभी सोचा था कि आप इसका खर्च उठा सकते हैं? क्या आपने इसे एक प्रयोग के रूप में देखा? क्या यह प्रारूप भविष्य में आपके लिए उपयोगी हो सकता है?
एंड्रास पेथो: हमें भी इतनी बड़ी सफलता की उम्मीद नहीं थी। हमें नहीं पता था कि एक साल के भीतर इसे लगभग 40 लाख बार देखा जाएगा। लेकिन हमें यकीन था कि यह एक दमदार कहानी है। फिल्म बनाते समय मैं काफी आश्वस्त था।
हम पेशेवर फिल्म निर्माताओं के साथ काम कर रहे थे। फिल्म रिलीज होने से पहले ही मैं इससे बहुत खुश था। मैं इसकी शानदार प्रतिक्रिया देख सकता था। यह हमारी दूसरी लंबी डॉक्यूमेंट्री है। पहली डॉक्यूमेंट्री अस्पताल में होने वाले संक्रमणों के बारे में थी। यह स्वास्थ्य सेवा से जुड़ी एक जांच थी। यूट्यूब पर इसे लगभग एक लाख बार देखा गया है। किसी हंगेरियन डॉक्यूमेंट्री के लिए यह संख्या मामूली नहीं है।
हमने लंबी डॉक्यूमेंट्री फिल्मों के क्षेत्र में विस्तार करने का फैसला कई साल पहले लिया था। यह हमारे लिए उपयुक्त लगा। अन्य प्रारूपों में भी हम यही करते हैं। हम परियोजनाओं पर महीनों काम करते हैं। कभी-कभी लंबे लेख प्रकाशित करना भी कारगर होता है। कुछ खबरें फिल्म के जरिए ही बेहतर असर डालती हैं। उनकी इसी माध्यम से बेहतर प्रस्तुति होती है।
जेडी : इस प्रोजेक्ट की योजना बनाते समय क्या आप पत्रकारिता के नज़रिए से सोच रहे थे? या फिर विज्ञापन या सदस्यता बढ़ाकर वित्तपोषण की संभावना पर भी विचार कर रहे थे? दूसरे शब्दों में, क्या मुख्य लक्ष्य संपादकीय था, जिसमें दर्शकों की संख्या में वृद्धि एक अतिरिक्त लाभ थी? या आपने इसे शुरू से ही नए पाठकों तक पहुंचने के एक तरीके के रूप में देखा था?
एपी: यह एक पत्रकारिता से जुड़ा विचार था। हमें बिल्कुल अंदाज़ा नहीं था कि यह इतना सफल होगा। सदस्यों की संख्या में 50% की वृद्धि की उम्मीद भी नहीं थी। फिल्म रिलीज़ होने के समय तक हमारी सदस्यता संख्या लगभग 3000 थी। फिल्म रिलीज़ होने के कुछ महीनों में यह संख्या 4500 हो गई। यह जो वाकई अद्भुत है।
मुझे याद है कि एक साल पहले मैंने अपने सहयोगियों से इस बारे में बात की थी। हमने लगभग 10 वर्षों में लगभग 3,000 सदस्य बनाए थे। यह बहुत श्रमसाध्य और एक क्रमिक प्रक्रिया थी। इसलिए हमने दो-तीन वर्षों में लगभग 5000 सदस्यों का लक्ष्य रखने पर चर्चा की थी। अब हम उस मुकाम तक पहुंच चुके हैं। यह मुख्यतः फिल्म की वजह से हुआ है। लेकिन कुछ हद तक सरकार द्वारा उठाए गए कदमों की वजह से भी यह संभव हुआ। मुझे लगता है कि इसका प्राथमिक कारण फिल्म ही है।
अगर आपके पास इतना सफल उत्पाद है, तो आप इसे वित्तपोषण के लिए उपयोग कर सकते हैं। एक उपकरण के रूप में इसका उपयोग करके दर्शकों के साथ संबंधों को गहरा कर सकते हैं। पहले हम बुडापेस्ट के बाहर ग्रामीण इलाकों में जनता तक पहुंचने के लिए संघर्ष कर रहे थे। हमने कार्यक्रम आयोजित करने की कोशिश की। यह काफी मुश्किल था। अब हमारे पास उन्हें दिखाने लायक यह बेहतरीन प्रोडक्ट है। हमने देश भर में जाकर फिल्म दिखाई। जहां भी हम गए, अच्छी उपस्थिति और प्रतिक्रिया मिलीं।
जेडी: आपने इस वृत्तचित्र के लिए बाहरी फिल्म निर्माताओं के साथ काम किया। छोटे संस्थानों के लिए यह थोड़ा चुनौतीपूर्ण है। फिल्म बहुत ही पेशेवर दिखती है। इसमें एनिमेशन और प्रभावी दृश्य हैं। क्या आपको लगता है कि अन्य छोटे संगठनों के लिए फिल्म निर्माण संबंधी चुनौतियों से डरने की जरूरत नहीं?
एपी: मैं फिल्म विशेषज्ञ नहीं हूं। मेरा मानना है कि अगर आपके पास एक सशक्त कहानी है, तो आप ऐसा कर सकते हैं। यदि आप तथ्यों को इकट्ठा और सत्यापित कर सकते हैं, सही साक्षात्कार ले सकते हैं और रिपोर्टिंग कर सकते हैं, तो यह आपका काम है। इसे पर्दे पर जीवंत बनाने का काम किसी और का है।
बेशक, आपको सही साझेदार ढूंढने होंगे। ऐसी साझेदारी बनानी होगी जिसमें आप यह स्वीकार करें कि बहुत सी चीजों पर आपका नियंत्रण नहीं है। उन्हें करने का आपको कोई अंदाजा नहीं है। आपको फिल्म बनाने का कोई अनुभव नहीं है। आप फिल्म की भाषा नहीं समझते। यह एक खबर लिखने से बहुत अलग है। लेकिन साथ ही, फिल्म निर्माताओं को यह समझना होगा कि एक पत्रकार के बतौर आप बेहतर तरीके से जांच-पड़ताल करना जानते हैं। यह एक सहयोगात्मक कार्य है, लेकिन संपादकीय नियंत्रण आपका है। पूरी प्रक्रिया एक निरंतर संवाद है। इसलिए आपको सही साझेदार ढूंढने होंगे।
जेडी: डॉक्यूमेंट्री लगभग एक घंटे की है। ज्यादातर लोगों को लगता है कि दर्शक इतनी देर तक पूरा नहीं देख पाएंगे। आपने इसकी लंबाई कैसे तय की? क्या यह शुरू से ही तय था? या कहानी बताने के लिए वाकई इतने समय की आवश्यकता थी?
एपी: चाहे कोई लेख हो या फिल्म, वह दर्शकों का ध्यान आकर्षित करने योग्य हो। बेशक, मैं समझता हूं कि हर कोई पूरी फिल्म नहीं देखेगा। ठीक वैसे ही, जैसे किसी खबर पर क्लिक करने वाला पाठक उसे पूरा नहीं पढ़ता। लेकिन अगर यह फिल्म के रूप में सफल होती है, तो मुझे लगता है कि लंबाई वास्तव में मायने नहीं रखती।
जेडी: क्या आपने यूट्यूब के साथ साझेदारी की? फिल्म को यूट्यूब पर किसी तरह से मोनेटाइज किया?
एपी: हम फिलहाल यूट्यूब से सीधे तौर पर कमाई नहीं करते हैं। मुझे लगता है कि अगर आप यूट्यूब से सीधे कमाई करना चाहते हैं, तो आपको यूट्यूब के साथ साझेदारी करनी होगी। उसके साथ कुछ शर्तें भी जुड़ी होती हैं। हमने इतनी बड़ी सफलता की उम्मीद नहीं की थी। लेकिन यह एक ऐसा तरीका है जिसे अपनाया जा सकता है। शायद हम भविष्य में ऐसा ही करेंगे। अगर आप फिल्म देखेंगे, तो उसमें बहुत सारे विज्ञापन हैं। फिलहाल हमें विज्ञापनों से कोई फायदा नहीं हो रहा है। लेकिन फिल्म को मिली लोकप्रियता से हमें बहुत फायदा हुआ है।
जेडी: ऐसा ही कुछ करने की सोच रहे अन्य छोटे या स्वतंत्र समाचार संस्थानों को आप क्या सलाह देंगे?

फोटो: एंड्रास पेथो (सह-संस्थापक और निर्देशक, डायरेक्ट-36)। इमेज: स्क्रीनशॉट/ डायरेक्ट-36
एपी: मुझे नहीं लगता कि इसे कोई जादुई हथियार समझना चाहिए। यह वैसा नहीं है। बेशक, यह एक अच्छा संयोग था। हंगरी में परिस्थितियाँ हमारे लिए सौभाग्य की बात थीं। यह फिल्म ऐसे माहौल में रिलीज़ हुई, जब सार्वजनिक चर्चा काफी अधिक थी। उदासीनता का दौर खत्म हो चुका था। लोग सार्वजनिक जीवन में सक्रिय रूप से भाग ले रहे थे। वे इस तरह की कहानियों के लिए उत्सुक थे। हम इस मामले में भाग्यशाली रहे।
अगर हमारी पिछली फिल्म इतनी सफल नहीं होती, तो शायद हम यह फिल्म नहीं बनाते। लेकिन हमने सीखा। हमें इस प्रारूप में सहजता महसूस होने लगी। यह फिल्म कोई प्रयोग नहीं थी, लेकिन पूरी प्रक्रिया एक प्रयोग थी। अंत में, हमें एहसास हुआ कि यह हमारे लिए बिल्कुल सही है।
जेडी : ऐसा लगता है कि आप कहानी को एक अलग तरीके से बताने के लिए तैयार थे। यह सनसनीखेज नहीं है, लेकिन उबाऊ भी नहीं है। आपने इसे जीवंत तरीके से प्रस्तुत किया है। एनिमेशन, स्पीकर और गुप्त गतिविधियों के बीच तालमेल बिठाया है। कुछ पारंपरिक मीडिया संस्थान इन चीजों को ‘अगंभीर’ कहते हुए ऐसे दृष्टिकोण से बच सकते हैं। क्या आपको लगता है कि प्रारूप के साथ प्रयोग करने की इस इच्छा ने फिल्म को इतना सफल बनाने में मदद की?
एपी: मेरे लिए, यह काफी पुरानी समझ है। शायद यह फ्रंटलाइन डॉक्यूमेंट्री जितनी गंभीर न हो। लेकिन यह पूर्वी यूरोपीय टीवी की तरह भड़कीली भी नहीं है। यह उससे कहीं अधिक सूक्ष्म है।
अगर इसे एक खबर के रूप में लिखा गया होता, तो इस पूरी कहानी में हंगरी के प्रधानमंत्री विक्टर ओर्बन की भूमिका दिखाना मुश्किल होता। कारण यह कि इन सौदों में उनकी कोई संलिप्तता नहीं है। इस बात का कोई सबूत नहीं है कि वे अपने दामाद के व्यापारिक सौदों में शामिल थे। लेकिन हम जानते हैं कि यह एक सच्चाई है। उन्होंने ही ऐसी राजनीतिक व्यवस्था बनाई थी जिसके चलते यह सब संभव हो सका। आप ऐसी बातों को खबर में लिख सकते हैं। लेकिन मुझे नहीं लगता कि इस पर ज्यादा ध्यान दिया जाएगा।
लेकिन फिल्म में एक बहुत अच्छा उपाय अपनाया गया है। इसमें विक्टर ओर्बन की आवाज़ को शामिल किया है। हमारे पास ऐसे फुटेज हैं, जिनमें विक्टर ओर्बन की आवाज़ है। यह एक निष्पक्ष, पत्रकारिता के दृष्टिकोण से लिया गया उपाय है। फिल्म के अंत में, ओर्बन के ऐसे बयान और भाषण हैं, जो उन्होंने अपने परिवार के सदस्यों के व्यवसायों के बारे में कई बार पूछे जाने पर दिए थे। वे बार-बार कहते हैं- ‘मैं इसमें शामिल नहीं हूं। मुझे कोई जानकारी नहीं है।’
यह सिर्फ लिखित रूप में पढ़ने से कहीं अधिक प्रभावशाली है। फिल्म में बातें कहने के कई तरीके होते हैं। कई तरह के उपकरण उपलब्ध हैं।
इस साक्षात्कार को सर्वप्रथम मध्य और पूर्वी यूरोप के मीडिया विकास संगठन ट्रांजिशन्स ने प्रकाशित किया था। जीआईजेएन ने इसे अनुमति लेकर पुनः प्रकाशित किया है। मूल लेख आप यहां देख सकते हैं।
अनुवाद: डॉ. विष्णु राजगढ़िया