जीआईजेसी-25 में 'स्वतंत्र खोजी पत्रकारिता कैसे करें' पैनल में वक्ता। इमेज : जीआईजेएन के लिए आलिया अब्दुल अज़ीज़ अलहाजरी
एक स्वतंत्र खोजी पत्रकार के रूप में अपना करियर बनाना आसान नहीं। यह किसी विशाल समुद्र में किसी छोटे, आज़ाद जहाज़ का कैप्टन बनने जैसा काम है। फ्रीलांसर को अपनी इन्वेस्टिगेशन का रास्ता खुद तय करना है। वह अपने जहाज़ का मालिक और क्रू भी खुद ही है। अकाउंटेंट और मैकेनिक से लेकर इंश्योरेंस एजेंट और सेफ्टी ऑफिसर तक, हर भूमिका खुद निभानी है।
मलेशिया में नवंबर 2025 में चौदहवीं ‘ग्लोबल इन्वेस्टिगेटिव जर्नलिज़्म कॉन्फ्रेंस’ (GIJC25) का आयोजन हुआ। इसमें ‘स्वतंत्र खोजी पत्रकारिता कैसे करें’ विषय पर एक सत्र था। इसमें अनुभवी स्वतंत्र पत्रकारों ने लंबे समय तक फ्रीलांस करियर बनाने के लिए कई व्यावहारिक सुझाव दिए। इसमें बर्नआउट मैनेज करने से लेकर पिचिंग और जांच का संचालन करने जैसे विषय शामिल थे।
स्विस खोजी पत्रकार सिल्के ग्रुहनवाल्ड ने अपने अनुभव साझा किए। वह वर्ष 2020 में स्टाफ की नौकरी छोड़कर फ्रीलांसिंग कर रही हैं। उन्हें उम्मीद थी कि फ्रीलांसिंग की सबसे बड़ी चुनौती कहानियों की तलाश करना है। लेकिन बाद में एहसास हुआ है कि ‘फ्रीलांसिंग सिर्फ कहानियों की तलाश करना नहीं है, बल्कि उनके बीच खुद को टिकाए रखने का प्रयास करना भी है।’
ज़िम्बाब्वे की खोजी पत्रकार लिंडा मुजुरु ने कहा कि उनके देश में स्टाफ पत्रकारों को आमतौर पर बहुत कम सैलरी मिलती है। लेकिन फ्रीलांसिंग में कई तरह के अवसर होते हैं। वह कई मीडिया संगठनों के साथ बातचीत करके अपनी फीस तय कर सकती हैं। एक स्थानीय पत्रकार के तौर पर अपने विशेष ज्ञान का अधिक इस्तेमाल कर सकती हैं।
जापान में रहकर एशिया पर फोकस करने वाले स्वतंत्र जर्नलिस्ट नितिन कोका ने कहा- “स्वतंत्र पत्रकारिता में निर्णय एक तरह का समझौता होता है। फ्रीलांसिंग की हर चुनौती के साथ एक फायदा भी है।”
आप खुद मीडिया संस्थान हैं, और खुद बिज़नेस भी
स्वतंत्र पत्रकार खुद एक मीडिया संस्थान के समान हैं। उन्हें अपना काम जारी रखने के लिए बिज़नेस मालिकों की तरह सोचना चाहिए। भले ही यह आपके कमरे में लगी लाइट का खर्च ही क्यों न हो। पैनल के वक्ताओं ने फ्रीलांसरों से खबरों के लिए अपने बजट में हर खर्च को आइटम वाइज़ लिखने का सुझाव दिया। इसमें प्रशासनिक कामों के लिए ज़रूरी समय या ट्रैवल खर्च भी शामिल हैं। फ्रीलांस इन्वेस्टिगेटिव जर्नलिस्ट्स को अपना काम करने और यह बिज़नेस चलाने में लगने वाले समय और पैसों का पूरा हिसाब रखना चाहिए। इनवॉइस लिखने, पिच ड्राफ्ट करने, पैसे मांगने, काम को रिवाइज करने और फैक्ट-चेकिंग में लगने वाले समय की दर तय करते समय या बजट बनाते समय इन बातों को ध्यान में रखना चाहिए। उपकरणों, सॉफ्टवेयर और दूसरे ऑपरेटिंग खर्चों को भी इसमें शामिल करना चाहिए।
सिल्के ग्रुहनवाल्ड ने कहा कि अपनी रोजाना की फीस में खबर लिखने के समय के साथ ही एडमिन के बतौर अपने काम को भी शामिल करें। इसके लिए उन्होंने एक ‘लिमिटेड लायबिलिटी कंपनी’ बनाई है। इसमें वह अकेली कर्मचारी हैं। ऐसा इसलिए किया ताकि जब कोई जांच प्रकाशित हो, तो वह व्यक्तिगत तौर पर उत्तरदायी न हों। इससे एक ज़्यादा औपचारिक, सैलरी वाली व्यवस्था भी बन जाती है।
हालांकि, कई देशों में फ्रीलांसरों के काम को सही महत्व नहीं मिल पाता। इसलिए उन देशों में किसी प्रोजेक्ट के लिए बजट पेश करने जैसी स्थिति नहीं रहती। लिंडा मुजुरु ने कहा कि ऐसी स्थिति में फ्रीलांसरों को अपनी फाइनेंशियल वैल्यू को समझते हुए बेहतर रेट देने लायक किसी इंटरनेशनल मीडिया को टारगेट करना चाहिए। उन्होंने कहा- “आपको उचित पेमेंट मिल सकता है। लेकिन आपको यह निर्धारित करना होगा कि आप सही मीडिया संगठन से संपर्क कर रहे हैं। आपको ना कहना सीखना चाहिए। अगर आप हर बात पर समझौता करेंगे, तो लोग आपका अनुचित फायदा उठाएंगे।”
हर चीज़ पर बातचीत करें
पैनल के हर वक्ता के पास पेमेंट के पीछे भागने, अचानक आए संपादकीय सुझावों पर फिर से बातचीत करने, या किल फीस (जो खबर रोकनी पड़ी) जोड़ने पर ज़ोर देने संबंधी अनुभव थे। सिल्के ग्रुहनवाल्ड ने कहा कि इन्वेस्टिगेटिव प्रोजेक्ट्स के लिए प्रति शब्द पेमेंट की दर काफी नहीं है। वह संपादकों को सभी अनुमानित खर्चों को दिखाने वाली पूरी स्प्रेडशीट भेजती हैं।
नितिन कोका ने कहा कि अनुदान आधारित काम के लिए आपकी खबर प्रकाशित करने वाले मीडिया संस्थान से भी आपको पेमेंट मिलना चाहिए। “संपादक यह कहकर आपको कम पैसे देना चाहेंगे कि आपके पास अनुदान है। उन्हें ऐसा नहीं करना चाहिए। हमें इसके खिलाफ आवाज़ उठानी चाहिए।”
गठबंधन बनाएं स्वतंत्र पत्रकार
फ्रीलांसिंग को एक अकेला पेशा माना जाता है। लेकिन अब प्रभावशाली जांच शायद ही कभी अकेले की जाती हैं। नितिन कोका ने कहा कि पार्टनर के साथ या टीमों में काम करने से आपकी जांच उन स्रोतों, जगहों या समुदायों तक पहुंच सकती हैं, जहां आप अकेले कभी नहीं जा पाते।
लिंडा मुजुरु ज़िम्बाब्वे में महिला पत्रकारों के एक ग्रुप का हिस्सा हैं। इसमें वह अपने कॉन्टैक्ट शेयर कर सकती हैं। लेकिन ज़्यादातर इमोशनल सपोर्ट देती हैं। सिल्के ग्रुहनवाल्ड ने कहा कि जहां पत्रकार यूनियन हैं, वहाँ फ्रीलांसरों को उनसे जुड़ना चाहिए। स्विट्जरलैंड में यूनियन मेंबरशिप लेना लाभकारी है। इसमें कानूनी सलाह की सुविधा शामिल है। जहां यूनियन नहीं हैं, वहां फ्रीलांसरों को अपनी यूनियन बनाने का प्रयास करना चाहिए।
डिजिटल, लीगल और भौतिक सुरक्षा
लिंडा मुजुरु ने कहा कि आपको डिजिटल, लीगल और भौतिक सुरक्षा, तीनों की परवाह करनी चाहिए। स्वतंत्र खोजी पत्रकार के लिए यह खुद करने वाली चीज है। अपने डिजिटल फुटप्रिंट्स को साफ़ करना जरूरी है। आपके पासवर्ड कॉम्प्रोमाइज़ तो नहीं हुए हैं, इसकी भी लगातार जांच करें। सेंसिटिव डेटा को एन्क्रिप्ट करने के लिए VeraCrypt या Cryptomator जैसे उपकरणों का उपयोग करें। पासवर्ड मैनेजमेंट के लिए Bitwarden या 1Password का उपयोग करें। हर जगह टू-फैक्टर ऑथेंटिकेशन इनेबल करना भी उपयोगी है। इस काम के लिए एक अलग डिवाइस भी ज़रूरी हैं।
लिंडा मुजुरु जब फील्ड में होती हैं, तो हर दो घंटे में अपने पति तथा एक अन्य पत्रकार को अपनी लोकेशन भेजती रहती हैं। वह कहती हैं कि फ्रीलांसरों को अपने भरोसेमंद लोगों के साथ अपनी ऐसी जानकारी शेयर करनी चाहिए। वह एक मीडिया एडवोकेट का नंबर स्पीड डायल पर रखती हैं। फील्ड से कभी भी सोशल मीडिया पर रियल-टाइम अपडेट पोस्ट नहीं करतीं।
सिल्के ग्रुहनवाल्ड ने कहा कि इंश्योरेंस ज़रूरी है। आप हेल्थ इंश्योरेंस, उपकरण इंश्योरेंस, लीगल इंश्योरेंस – ये सब लें। हमेशा लिखित कन्फर्मेशन लें कि आपका ट्रैवल इंश्योरेंस किसी संकट वाले इलाकों को कवर करता है।
खुद पर ज़िम्मेदारी वाले समझौते न करें
इस सत्र में पैनलिस्टों ने सबसे ज़रूरी सलाह यह दी, कि कानूनी तौर पर खुद को सुरक्षित रखें। अगर किसी मीडिया संगठन के समझौते में ऐसे प्रावधान हों, जो फ्रीलांसर पर कानूनी ज़िम्मेदारी डालते हैं, तो ऐसी शर्तें स्वीकार न करें। इसमें मानहानि के जोखिम से लेकर इन्वेस्टिगेशन से होने वाले मुकदमों तक से जुड़े मामले शामिल हैं। सिल्के ग्रुहनवाल्ड ने कहा- “अगर कोई कॉन्ट्रैक्ट आप पर ज़िम्मेदारी डालता है, तो उसे छोड़ दें। आपको कानूनी, आर्थिक और भावनात्मक रूप से सुरक्षित रखने लायक अच्छे माहौल की ज़रूरत है।” उन्होंने रिपोर्टर्स को फ्रीलांस इन्वेस्टिगेटिव रिपोर्टर्स एंड एडिटर्स (FIRE) के कॉन्ट्रैक्ट टेम्प्लेट की जानकारी दी। कहा कि अगर कोई एडिटर अनुचित क्लॉज़ पर बातचीत करने से मना करता है, तो यह एक खतरे की घंटी है। आप इसे छोड़ने पर विचार कर सकते हैं।
अपनी आय के स्रोत बढ़ाएं
फ्रीलांस इन्वेस्टिगेशन से होने वाली आय धीमी और कम होती है। यह आय भरोसेमंद भी नहीं हो सकती है। इसलिए वक्ताओं ने फ्रीलांसरों को बिना किसी झिझक के अपने काम को सपोर्ट करने के लिए आय के अन्य स्रोत विकसित करने के लिए प्रोत्साहित किया।
सिल्के ग्रुहनवाल्ड दो आर्ट स्कूलों में पढ़ाती हैं। वह इन्वेस्टिगेटिव थिएटर प्रोडक्शन भी बनाती हैं। इसके साथ ही, पैसे लेकर टॉक देती हैं। उन्होंने कहा- “ऐसे काम से मेरी पत्रकारिता में मदद मिलती है। इनसे होने वाली आय के कारण विज़िबिलिटी मिलती है। कभी-कभी नए कोलाबरेटर भी मिलते हैं।”
लिंडा मुजुरु एक किसान के बतौर भी काम करती हैं। वह मक्का उगाती हैं और मुर्गियां पालती हैं। उन्होंने कहा कि यह ग्लैमरस नहीं है। लेकिन यह धीमे समय या कमीशन के बीच उन्हें पैसे की कमी नहीं होने देता।
नितिन कोका ने कहा- “फ्रीलांसर के तौर पर अनुदान फंडिंग बहुत ज़रूरी है। चुनौती यह है कि बहुत सारे अनुदान सिर्फ रिपोर्टिंग प्रोसेस को ही फंड करते हैं। छोटे या कम जाने-माने ग्रांट में कम लोग आवेदन करते हैं। इसलिए उन पर नज़र रखें और उन्हें टारगेट करें।”

स्विस फ्रीलांस जर्नलिस्ट सिल्के ग्रुहनवाल्ड के अनुसार स्वतंत्र खोजी पत्रकारों को कानूनी तौर पर खुद को सुरक्षित रखना चाहिए। इमेज: GIJN के लिए आलिया अब्दुल अज़ीज़ अलहाजरी
अपने मानसिक स्वास्थ्य का ख्याल रखें
स्वतंत्र खोजी पत्रकारों के लिए अवकाश लेने लायक कोई ऑफिस नहीं होता। उनके आने-जाने का कोई निर्धारित समय नहीं होता। कोई मैनेजर नहीं होता जो आपके साप्ताहिक अवकाश की व्यवस्था करता हो। ज़्यादा काम करने पर बर्नआउट के काफी खतरे हैं।
लिंडा मुजुरु ने पिचिंग और रिजेक्शन के मनोवैज्ञानिक असर पर खुलकर बात की। ज़मीन से जुड़े रहने के लिए वह एक दैनिक रूटीन बनाती हैं। अपने काम के सख्त घंटे तय करती हैं। वह बर्नआउट से बचने के लिए टू-डू लिस्ट का इस्तेमाल करती हैं। संपादकों के साथ एक सीमा निर्धारित करती हैं ताकि आधी रात को तुरंत जवाब की उम्मीद वाले मैसेज न आएं। उन्होंने कहा- “आपको संपादकों को बताना होगा कि आप कब उपलब्ध नहीं हैं। वरना वे मान लेंगे कि आप हमेशा उपलब्ध हैं।”
सिल्के ग्रुहनवाल्ड ने आगे कहा कि फ्रीलांसरों को जानबूझकर छुट्टी का समय तय करना चाहिए। “बर्नआउट कोई सम्मान की बात नहीं है। किसी भी खबर के लिए अपना भावनात्मक नुकसान न करें।”
अनुवाद : डॉ विष्णु राजगढ़िया