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उपग्रह और ड्रोन के जरिए खोजी पत्रकारिता

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चित्रांकन: कटा माथे/ रिमार्कर

खोजी पत्रकारिता में अब उपग्रहों और ड्रोन का शानदार उपयोग हो रहा है। बारहवीं ग्लोबल इन्वेस्टिगेटिव जर्नलिज्म कॉन्फ्रेंस (जीआईजेसी – 21) में दुनिया के प्रमुख खोजी पत्रकारों ने अपने अनुभव शेयर किए। एक सत्र था: मैपिंग और सैटेलाइट इमेजरी के जरिए खोजी पत्रकारिता। इसमें उपग्रह और ड्रोन छवियों का विश्लेषण करने के लिए कई नए दृष्टिकोण और तरीकों पर चर्चा हुई।

इस सत्र में दुनिया के तीन चर्चित पत्रकारों ने आसमान से झूठ को उजागर करने के लिए ओपन सोर्स टूल्स के उपयोग की जानकारी दी। एलिसन किलिंग ने चीन के गुप्त डिटेंशन सेंटर पर अपनी खोजी रिपोर्टिंग के अनुभव बताए। जॉन एरोमोसेले ने नाइजीरिया के मकोको स्लम पर अपनी जांच का उल्लेख किया। लौरा कर्ट्जबर्ग ने अमेजॅन में बड़े पैमाने पर वनों की कटाई संबंधी रिपोर्टिंग में आधुनिक तकनीक के उपयोग के अनुभव बताए। तीनों के अनुभव और सुझाव यहां प्रस्तुत हैं।

चीन के गोपनीय ‘डिटेंशन सेंटर‘

खोजी पत्रकारिता में नई तकनीक के जरिए ‘चीन के उइगर में डिटेंशन सेटर्स के गुप्त नेटवर्क‘ को बेनकाब किया गया। सरकार की ‘सेंसरशिप’ का उपयोग करके खोजी पत्रकारिता की शानदार तकनीक का यह अनोखा उदाहरण है। यह रिपोर्ट सिरीज वर्ष 2020 में ‘बजफीड न्यूज‘ में प्रकाशित हुई थी। एलिसन किलिंग, मेघा राजागोपालन एवं क्रिस्टो बसचेक ने यह रिपोर्टिंग की थी। इसमें हजारों सैटेलाइट इमेजों के आधार पर महत्वपूर्ण निष्कर्ष निकाले गए थे। ‘बजफीड न्यूज‘ में चीन की इस रिपोर्टिंग के लिए इन तीनों को वर्ष 2021 का ‘पुलित्जर पुरस्कार‘ मिला

एलिसन किलिंग ब्रिटेन की एक आर्किटेक्ट हैं। जीआईजेसी-21 में उन्होंने बताया कि चीन में लगभग दस लाख मुसलमानों को रखने के लिए बनाए गए डिटेंशन सेटर्स का पर्दाफाश किस तरह किया गया। दिलचस्प बात यह है कि चाइनीज सरकार के उपग्रह इमेजिंग प्लेटफार्मों में जिन स्थानों को ‘सेंसर‘ किया गया था, उन्हीं जगहों की इमेज लेकर यह पर्दाफाश किया गया। इसमें उन स्थानों के रिक्त डिजिटल टाइल इमेजों का उपयोग हुआ।

फोटो: बज़फीड टीम ने बायडू टोटल व्यू का उपयोग करके सेटेलाइट इमेज के खाली टाइल्स के जरिए चीन के गुप्त डिटेंशन सेंटरों का पता लगाया। फोटो : एलिसन किलिंग के सौजन्य से

एलिसन किलिंग कहती हैं- ”ऐसे मामलों की जांचपूर्ण रिपोर्टिंग में भू-स्थानिक विश्लेषण का काफी महत्व है। यदि आप सिर्फ स्थानीय स्रोतों से बात करेंगे, तो संभव है कि उस स्रोत को ही डिटेंसन सेंटर में भेज दिया जाए।”

उल्लेखनीय है कि ‘बायडू मैप सर्विस‘ ने चीन में सैटेलाइट मैपिंग के लिए ‘टोटल व्यू‘ नामक विशेष प्लेटफॉर्म बनाया है। चाइनीज सरकार इसमें कुछ जगहों की इमेज को ‘सेंसर‘ कर देती है। सेंसर किए गए ऐसे स्थान किसी सैटेलाइट इमेज में ‘टाइल्स‘ के रूप में दिखते हैं।

एलिसन किलिंग और उसके सहयोगियों ने सेंसर वाली टाइलों का इस्तेमाल मार्कर के रूप में किया। इस तरह मुस्लिम समुदाय के लोगों को रखने के लिए बनाए गए सैकड़ों गुप्त डिटेंशन सेंटरों का पता चला। एलिसन किलिंग कहती हैं- ”हमने चीन द्वारा सेंसर किए गए उन स्थानों को चिन्हित किया। फिर ‘गूगल अर्थ‘ जैसी अन्य सैटेलाइट इमेज सेवाओं में उन्हीं स्थानों को देखा। इस तरह हम चीन में डिटेंशन सेंटर्स के पूर्ण नेटवर्क का पता लगाने में कामयाब हुए।”

एलिसन किलिंग ने कहा – ”सैटेलाइट इमेज में यदि आपको ‘ब्लाइंड स्पॉट‘ दिखते हों, तो वहां क्या हो सकता है, यह पता लगाने का रचनात्मक समाधान करें। हमें ‘गूगल अर्थ‘ में दक्षिणी शिनजियांग प्रांत के डिटेंशन सेंटर्स की हाल की इमेज नहीं मिल रही थी। तब हमने यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी के सेंटिनल हब प्लेग्राउंड के जरिए वहां की अप-टू-डेट तस्वीरें निकाल लीं। हालांकि यह कम-रिजॉल्यूशन वाली थीं।”

फोटो: एलिसन किलिंग ने बताया कि बजफीड रिपोर्टिंग टीम ने किस तरह सेंसर्ड उपग्रह इमेजरी का उपयोग करके चीनी डिटेंसन सेंटरों का पर्दाफाश किया। फोटो एलिसन किलिंग के सौजन्य से।

‘बजफीड‘ रिपोर्टिंग टीम ने अन्य प्लेटफॉर्म सैटेलाइट से मिली तस्वीरों की इमारतों का विश्लेषण किया। उन इमारतों के आकार के साथ अन्य इमेजों की तुलना की। इनमें ‘कार‘ के आकार की वस्तुओं को केवल एक पिक्सेल के रूप में दिखाया गया था। हाई-रिजॉल्यूशन ‘गूगल अर्थ‘ इमेज पर पाए गए पैटर्न के साथ ‘सेंटिनल हब प्लेग्राउंड‘ में डिटेंशन सेंटरों की हुई। जिन स्थानों के सैटेलाइट इमेज लेने के लिए कोई ओपन सोर्स विकल्प नहीं था, उसके लिए बजफीड टीम ने एक वाणिज्यिक उपग्रह प्रदाता ‘प्लैनेट लैब्स’ से संपर्क किया। इनके पास एक मीडिया कार्यक्रम टीम है। उसने प्रमुख स्थानों के लिए अपने हाई रिज़ॉल्यूशन, अप-टू-डेट इमेज उपलब्ध करा दिए।

नाइजीरिया के मकोको की ‘अदृश्य बस्ती’

दूसरा मामला भी खोजी पत्रकारिता का बड़ा उदाहरण है। नाइजीरिया के मकोको स्लम में रहने वाले पूरे समुदाय के अस्तित्व को ही नकार दिया गया था। यहां ऐसे इंसानों की बड़ी तादाद थी, जो नीति-निर्माताओं की नजर में अदृश्य थे। लागोस के पास एक लैगून पर बनी इस बस्ती को किसी भी आधिकारिक मानचित्र में दर्शाया तक नहीं गया था। सरकार की नजर में  ‘अदृश्य’ होने के कारण इस पूरी बस्ती को बिजली, पेयजल, सड़क जैसी तमाम जरूरी सेवाओं से वंचित रखा गया था।

जॉन एरोमोसेले ने बताया कि हवाई ड्रोन, ओपन सोर्स टूल्स और स्थानीय निवासियों की मदद से इस समुदाय को सामने लाने में सफलता मिली। जॉन एरोमोसेले अफ्रीका के लिए गैर-लाभकारी ओपन डेटा संगठन कोड के एक प्रोजेक्ट मैनेजर हैं। जॉन एरोमोसेले ने जीआइजेसी 21 में बताया कि इस ‘अदृश्य बस्ती’ की सच्चाई किस तरह सामने लाई गई। उन्होंने कहा कि हमने इस ‘मोकोको मैपिंग परियोजना’ के लिए पर्याप्त तकनीकी जानकारी का उपयोग किया। साथ ही हमने स्थानीय समुदाय के लोगों को भी प्रशिक्षण देकर उनका भरपूर सहयोग लिया। उन्हें हमने सिखाया कि यह काम कैसे करना है। स्थानीय लोग खुद ही ड्रोन उड़ा कर मैपिंग कर रहे थे। इसके लिए एक स्थानीय शैक्षिक एनजीओ को नियुक्त किया, क्योंकि किसी भी समुदाय-आधारित डेटा परियोजना को जन-केंद्रित होना चाहिए। हमने अनुकूलित डेटा टूलकिट के साथ ड्रोन और एक ग्राउंड टीम तैनात की है।

अमेजन के जंगलों की छिपी आग (Smoke Screen project)

वर्ष 2020 में ब्राजील में अमेज़न के जंगलों में भयंकर आग और विशाल धुएं के गुबार ने पर्यावरण को भारी नुकसान पहुंचाया। लेकिन ब्राजील के राष्ट्रपति जायर बोल्सोनारो ने पहले तो आग की व्यापकता के सच से इनकार कर दिया। फिर गैर सरकारी संगठनों और स्थानीय समुदाय को इस आग के प्रसार के लिए दोषी ठहराया।

फोटो: लौरा कर्ट्ज़बर्ग ने अमेज़ॅन के जंगलों में बड़े पैमाने पर वनों की कटाई दिखाने के लिए उपग्रह डेटा का उपयोग किया। छवि: लौरा कर्ट्ज़बर्ग के सौजन्य से

लौरा कर्टज़बर्ग (विज्ञान आधारित पत्रकारिता आउटलेट, एम्बिएंटल मीडिया के लिए डेटा विज़ुअलाइज़ेशन लीड) ने इस रिपोर्टिंग की पूरी जानकारी दी। उन्होंने बताया कि कैसे सहयोगी स्मोक स्क्रीन प्रोजेक्ट ने उपग्रह डेटा का विश्लेषण करके यह साबित किया कि किस तरह अमेज़न की इस आग के पीछे बड़े भूस्वामियों द्वारा वनों की बड़े पैमाने पर कटाई जिम्मेवार थी।

लौरा कर्ट्ज़बर्ग ने कहा- “हमने पाया कि वर्ष 2019 में सबसे अधिक वनों की कटाई करने वाली चार नगर पालिकाओं के क्षेत्र में ही जंगलों में ही सबसे अधिक आग लगने के मामले भी सामने आए। इनमें 72% मामले मध्यम और बड़ी निजी कंपनियों के जंगलों में आग लगने संबंधी थे। यही पैटर्न 2020 में भी जारी रहा।”

 

एरियल इमेजरी के जरिए जांच : GIJC 21 के सुझाव

  • उपग्रह आधारित किसी विस्तृत जांच में आपको समय के साथ दृश्यों को ट्रैक करने की आवश्यकता पड़ सकती है। ऐसे मामलों में गूगल अर्थ के ब्राउज़र संस्करण के बजाय डेस्कटॉप संस्करण का उपयोग करना बेहतर होगा।
  • सैटेलाइट इमेज के आधार पर विभिन्न इमारतों या संरचनाओं की पहचान के लिए उनके आसपास की वस्तुओं को ध्यान से देखें। इससे पता लग सकता है कि उन इमारतों या संरचनाओं में क्या चल रहा है। आप ऐसी चीजों की तलाश करें जिनकी वैसी इमारतों में जरूरत पड़ती हो। उदाहरण के लिए, एलिसन किलिंग ने बताया कि उन्हें सैटेलाइट इमेज में डिटेंशन सेंटर्स के पास सड़कों पर अस्थायी कार पार्किंग स्थल दिखाई दिए। यह चीन के डिटेंसन सेंटरों का एक अच्छा संकेतक निकला, क्योंकि स्थानीय सुरक्षा आवश्यकताओं और शिविर निर्माण की तीव्र गति में अक्सर औपचारिक पार्किंग स्थल शामिल नहीं होते थे। इसके अलावा, बसें, गार्ड टावर, और गाढ़े लाल सूट पहने हुए लोगों के समूह, कतार में लगे लोगों की इमेज भी उपयोगी संकेतक थे।
  • फोटो – बजफीड रिपोर्टिंग टीम ने चीनी डिटेंशन सेंटरों का पर्दाफाश किया। फोटो एलिसन किलिंग के सौजन्य से।

  • वस्तुओं या इमारतों के आकार का अनुमान लगाने के लिए तिरछी सैटेलाइट इमेज का उपयोग करें। बज़फीड टीम ने ऐसे एंगिल का उपयोग करके यह पता लगा लिया कि डिटेंशन सेंटरों की इमारतें कितने तल (फ्लोर) की हैं। इससे पता चला कि सभी केंद्रों को मिलाकर 10.14 लाख बंदियों को रखने की क्षमता है।
  • सैटेलाइट डेटा की प्रस्तुति के लिए मैपबॉक्स स्टूडियो नामक मैपिंग स्टूडियो का उपयोग करें। लौरा कर्टज़बर्ग ने कहा- “मैपबॉक्स काफी हद तक मुफ़्त है। इसका उपयोग करना पत्रकारों के लिए आसान है, क्योंकि यह बहुत सारी इंटरैक्टिव सुविधाएँ देता है। RStudio भी बहुत उपयोगी है, और यह पूर्णतया मुफ़्त है।”
  • भू-स्थानिक डेटा का विश्लेषण करने के लिए लौरा कर्टज़बर्ग ने QGIS का उपयोग करने का सुझाव दिया। उन्होंने कहा कि यह आर्क-जीआईएस की तरह पूर्णतः ओपन सोर्स है। साथ ही, यह डेस्कटॉप सॉफ्टवेयर है। पत्रकारों के लिए यह काफी उपयोगी है। इससे आप विश्लेषण कर सकते हैं, अपनी स्टोरीज के लिए मानचित्र और चित्र बना सकते हैं। साथ ही आप वेक्टर डेटा और उपग्रह इमेजरी के साथ काम भी कर सकते हैं।
  • फ्लोरिश विज़ुअलाइज़ेशन टूल की निशुल्क एवं उन्नत सुविधाओं के लिए आवेदन करें। जैसे फ्लोरिश फोटो स्लाइडर में पहले और बाद की एरियल तस्वीरें दिखाने के लिए। जॉन एरोमोसेले ने कहा- “फ्लोरिश और डेटारैपर जैसे उपकरण आपको बेहद कम समय में हवाई डेटा का विज़ुअलाइज़ेशन करने में मदद करते हैं। अपनी लागतों को नियंत्रित करना आपके लिए महत्वपूर्ण है। इसलिए आप आसानी से इन प्रीमियम सुविधाओं के लिए आवेदन कर सकते हैं।”
  • हाई-रिज़ॉल्यूशन इमेज के लिए ड्रोन के उपयोग पर विचार करें। अफ़्रीकन ड्रोन जैसे गैर-लाभकारी प्रदाताओं से आपको ड्रोन के उपयोग संबंधित नियमों का मार्गदर्शन और कौशल मिल सकता है। इनसे आपको लागत में बचत संबंधी सलाह भी मिल सकती है। जॉन इरोमोसेले ने कहा- “आप अनुदानित दर पर अफ्रीकनड्रोन के साथ साझेदारी कर सकते हैं। हमने अपने ड्रोन का फील्ड परीक्षण करने के लिए एक प्राथमिक विद्यालय के मैदान का उपयोग किया। इसके लिए हमने स्थानीय प्रशासन से अनुमति भी ले ली थी।”
  • इमेज में पर्यावरण संबंधी मामलों को समझने के लिए वैज्ञानिकों की मदद लें। उदाहरण के लिए, एम्बिएंटल मीडिया ने ब्राजील के नेशनल सेंटर फॉर मॉनिटरिंग एंड अर्ली वार्निंग ऑफ नेचुरल डिजास्टर्स और चिको मेंडेस इंस्टीट्यूट फॉर बायो डायवर्सिटी कंजर्वेशन फॉर स्मोक स्क्रीन प्रोजेक्ट के साथ भागीदारी की।
  • सैटेलाइट और ड्रोन इमेजरी को प्रोसेस करने के लिए ओपन सोर्स OpenAerialMap टूल को आजमाकर देखें। जॉन एरोमोसेले ने कहा- “जब आप अपनी सभी ड्रोन छवियों को एक साथ जोड़ते हैं, तो इसे जावा ओपनस्ट्रीटमैप में निर्यात करना पड़ सकता है। इसके लिए आपको इसे ओपनएरियल मैप पर भेजने की आवश्यकता है। यह आसानी से निर्यात करने और संपादित करने में काफी उपयोगी है।”
  • उपग्रह इमेजिंग संसाधनों पर जीआईजेएन की गाइड यहां देखें। 

इस सत्र का संचालन मरीना वॉकर ग्वेरा (कार्यकारी संपादक, पुलित्जर सेंटर ऑन क्राइसिस रिपोर्टिंग) ने किया। उन्होंने कहा कि इस सत्र के तीनों वक्ताओं द्वारा प्रस्तुत उदाहरण दुनिया भर में खोजी पत्रकारिता के विकास का प्रतीक हैं। इसमें सैटेलाइट इमेज, मैपिंग तथा अन्य डिजिटल उपकरणों के उपयोग से खोजी पत्रकारिता की क्षमता काफी बढ़ गई है। इससे पता चलता है कि खोजी पत्रकार किस तरह सेंसरशिप को धता बताकर गलत कामों को उजागर कर रहे हैं। शक्तिशाली लोग और संस्थाएं चाहे जितना भी छुपाना चाहें, खोजी पत्रकार सच को सामने ले ही आते हैं।

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