मीडिया को डराने के लिए बढ़ते डिजिटल हमले

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इमेज: शटरस्टॉक

दुनिया भर में स्वतंत्र मीडिया को हमलों का शिकार होना पड़ रहा है। सेंसरशिप लागू करने और जेल भेजने से लेकर शारीरिक हमले और हत्या जैसे मामले भी सामने आ रहे हैं। इसके कारण मीडिया की स्वतंत्रता को कई चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। लेकिन इन पारंपरिक खतरों के साथ एक नया खतरा जुड़ गया है। अब राजनेताओं और शक्तिशाली लोगों ने डिजिटल हमलों का उपयोग शुरू कर दिया है। ऐसे डिजिटल हमलों के जरिए स्वतंत्र मीडिया संगठनों को चुप कराने, डराने-धमकाने के नए रास्ते सामने आए हैं।

जाहिर है कि मीडिया के दमन की प्रकृति बदल रही है। इसलिए मीडिया संगठनों को इन चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए डिजिटल हमलों का मुकाबला करना होगा। अपने पाठकों तक विश्वसनीय समाचार प्रदान करने के अपने मिशन को जारी रखने के लिए यह बेहद जरूरी है। स्वतंत्र मीडिया को अपने सर्वर को किसी हमले से बचाना होगा। सोशल मीडिया में होने वाले हमलों के साथ ही डिजिटल मामलों से जुड़ी कानूनी चुनौतियों से भी निपटना होगा। मीडिया के काम और उत्पादन में डिजिटल तरीकों का उपयोग बढ़ता जा रहा है। प्रौद्योगिकी पर भी मीडिया की निर्भरता काफी बढ़ गई है। इसलिए मीडिया को काफी तीखे और नए किस्म के हमलों का मुकाबला करने के लिए तैयार रहना होगा।

चिंताजनक ‘डिजिटल ट्रेंड‘

‘मीडिया डेवलपमेंट इन्वेस्टमेंट फंड‘ (एमडीआईएफ) ने पिछले वर्ष लगभग 40 देशों में 60 से अधिक स्वतंत्र मीडिया संगठनों के साथ काम किया है। जिन देशों में प्रेस की स्वतंत्रता पर खतरा है, वहां मीडिया को किसी भी नियंत्रण से मुक्त होकर मजबूती से पत्रकारिता करने में मदद की जाती है। वित्तपोषण के साथ ही उन्हें प्रबंधन सलाह भी प्रदान की जाती है। राजनेताओं और पूंजीपतियों पर निर्भरता के बदले स्वतंत्र पत्रकारिता के लिए ऐसी मदद महत्वपूर्ण है। विभिन्न प्रकार के मीडिया संस्थानों की एक विस्तृत श्रृंखला के साथ हमारा जुड़ाव है। इनके साथ काम के दौरान हमें महामारी के दौर में राजस्व स्रोतों में विविधता लाने से लेकर ‘वर्क फ्रॉम होम‘ जैसी असंख्य चुनौतियों के बारे में जानकारी मिलती है। कई प्रकार की ‘वैध‘ व्यावसायिक चुनौतियों के साथ ही इनमें से कई मीडिया संगठनों को अच्छी पत्रकारिता करने के लिए कारण डिजिटल हमलों का शिकार होना पड़ता है।

हाल के वर्षों में ऐसे डिजिटल हमलों की संख्या, आवृत्ति और गंभीरता बढ़ी है। ऐसे हमलों के नए-नए तरीके भी सामने आ रहे हैं। कुछ साइबर हमले काफी घातक होजे हैं और किसी कवरेज को रोकने में भी प्रभावी होते हैं। ऐसे हमलावरों को एक अतिरिक्त लाभ मिलता है, क्योंकि ऐसे अपराधी वीपीएन के पीछे छिपे होते हैं उनकी पहचान को सामने लाना मुश्किल होता हे। डिजिटल स्पेस में मौजूद अन्य प्रकार के दबाव, जैसे साइबर मुकदमे अधिक पारदर्शी हैं। इनके जरिए भी मीडिया को प्रभावी तरीके से डराने में सफलता मिलती है। लिहाजा, इन्हें मीडिया को डराने का हथियार कहा जा सकता है।

एमडीआईएफ समर्थित 41.5 प्रतिशत मीडिया संगठन विगत एक साल में विभिन्न प्रकार के हमलों का शिकार हुए। वर्ष 2021 के वार्षिक सर्वेक्षण में यह बात सामने आई। इनमें से कई संगठनों को डिजिटल हमलों का सामना करना पड़ा। हमारे मीडिया भागीदारों ने जिस उत्पीड़न का अनुभव किया उनमें फिलीपींस में साइबर-कानूनी हमले को उदाहरण के बतौर देख सकते हैं। अल-सल्वाडोर में पत्रकारों की स्पाइवेयर निगरानी, मलेशिया में आपराधिक मुकदमा और इथियोपिया में सोशल मीडिया खातों की हैकिंग जैसे मामले भी शामिल हैं। हमने इस वर्ष विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस की थीम ‘डिजिटल घेराबंदी के तहत पत्रकारिता‘ रखी है। इस लेख में हम देखेंगे कि ये डिजिटल हमले कैसे हुए।

फिलीपींस : साइबर मुकदमों की बाढ़

राष्ट्रपति रोड्रिगो डुतर्ते के सत्तावादी शासन में फिलीपींस में प्रेस की स्वतंत्रता स्थगित हो गई है। सरकार ने मीडिया के खिलाफ कई कदम उठाए हैं। इसके लिए नियामक एजेंसियों और लाइसेंसिंग निकायों का भी दुरुपयोग होता है। वर्ष 2020 में देश के सबसे बड़े टीवी नेटवर्क एबीएस-सीबीएन के लाइसेंस का नवीकरण करने से इनकार कर दिया गया। इसके कारण महामारी के दौरान लाखों नागरिकों को सार्वजनिक जनहित रिपोर्टिंग से वंचित होना पड़ा।

वर्ष 2021 के नोबेल शांति पुरस्कार से सम्मानित मारिया रसा (बाएं) को फ़िलीपींस में सरकारी हमलों का सामना करना पड़ रहा है। इमेज: स्क्रीनशॉट।

ऐसे मुश्किल वातावरण के बावजूद स्वतंत्र मीडिया की आवाज बुलंद है। इनमें ‘रैपलर‘ नामक मीडिया संस्थान प्रमुख है। इसे नोबेल शांति पुरस्कार विजेता मारिया रसा ने स्थापित किया है। इस संस्थान को विशेष रूप से डराने-धमकाने की काफी कोशिशें हुई हैं। ऐसी कोशिशों में डिजिटल हमले भी शामिल हैं।

‘रैपलर‘ मीडिया संस्थान और इसकी सीईओ ‘मारिया रेसा‘ को अनगिनत कानूनी मामलों, जांचों और ऑनलाइन हमलों से जूझना पड़ रहा है। इसमें ऐसे मुकदमे भी शामिल हैं, जिनमें संस्थापक को दशकों तक जेल की सजा मिल सकती है। व्यक्तिगत रूप से भी डिजिटल हमले हो रहे हैं। मारिया रेसा के खिलाफ नफरती कमेंट्स किए जा रहे हैं। उनके फेसबुक पेज पर पोस्ट की गई लगभग 10,000 टिप्पणियों का विश्लेषण किया गया। पता चला कि उनके पक्ष में एक टिप्पणी आती है तो बदले में उनके खिलाफ 14 लोगों के हमलावर कमेंट्स आते हैं। ‘रैपलर‘ मीडिया संस्थान की वेबसाइट कई जगहों पर डिनायल-ऑफ-सर्विस (DDoS) हमलों का सामना भी करना पड़ता है।

‘रैपलर‘ को डराने के लिए राष्ट्रपति रोड्रिगो डुतर्ते के समर्थकों द्वारा साइबर मुकदमों का काफी दुरुपयोग किया जा रहा है। वर्ष 2020 में एक प्रसिद्ध व्यवसायी ने रैपलर की रिपोर्टिंग के खिलाफ शिकायत की। इसमें मारिया रेसा को साइबर मानहानि का दोषी बताया गया।

वर्ष 2022 में राष्ट्रपति के पादरी अपोलो क्विबोलॉय और उनके सहयोगियों के खिलाफ यौन तस्करी के आरोप लगे। अमेरिका द्वारा लगाए गए ऐसे आरोपों के आधार पर रैपलर ने रिपोर्टिंग की। लेकिन इस रिपोर्टिंग के कारण उस पादरी के लोगों ने रैपलर के पत्रकारों के खिलाफ 20 से अधिक शिकायतें  दर्ज करा दीं। ऐसे साइबर हमलों और कानूनी कार्रवाइयों के कारण रैपलर के संसाधनों पर दबाव पड़ रहा है। रिपोर्टिंग पर पूरी तरह से अपना ध्यान केंद्रित करने की उसकी क्षमता बाधित होती है।

अल-सल्वाडोर : स्पाइवेयर और निगरानी

अल-सल्वाडोर में प्रेस की स्वतत्रता बुरी तरह प्रभावित हुई है। ‘रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स‘ द्वारा हर साल ‘वल्र्ड प्रेस फ्रीडम इंडेक्स‘ (Reporters Without Borders’ World Press Freedom Index) बनाया जाता है। वर्ष 2013 में अल-सल्वाडोर 38 वें स्थान पर था। लेकिन अब गिरकर इस साल 112 वें स्थान पर आ गया है। दुनिया का एकमात्र देश है जिसे इतनी बड़ी गिरावट का सामना करना पड़ा हो। अल-सल्वाडोर में स्वतंत्र मीडिया को हिंसा और धमकियों का सामना कर रहा है। सरकार उन्हें सुरक्षा प्रदान करने के बजाय अक्सर खुद ही अपराधी है। भ्रष्टाचार या सरकारी वित्त की जांच करने वाले पत्रकारों को अधिकारी धमकाते हैं। राष्ट्रपति नायब बुकेले ने स्वतंत्र पत्रकारों को खुलेआम धमकी देकर अपने समर्थकों को हमलावार होने की स्पष्ट दिशा दी है। वह कई पत्रकारों को सोशल मीडिया पर ‘ब्लॉक‘ करके देश के ‘दुश्मन‘ के रूप में चित्रित करते हैं।

इमेज: स्क्रीनशॉट

पेगासस स्पाइवेयर के जरिए दुनिया के कई देशों में मीडिया पर भयानक हमला हुआ। अल-सल्वाडोर के लगभग 35 पत्रकारों के फोन हैक हुए। इस लिस्ट में प्रमुख डिजिटल समाचार वेबसाइट ‘एल-फारो‘ के 22 पत्रकार शामिल थे। ‘एल-फारो‘ की रिपोर्टिंग के कारण लगातार सरकारी हमलों का सामना करना पड़ रहा है। मारा सल्वाट्रुचा नामक आपराधिक गिरोह के साथ सरकार की गुप्त वार्ता के संबंध में रिपोर्टिंग के कारण सरकार नाराज है। ‘एल-फारो‘ को डराने के लिए उसके खिलाफ व्यापक ऑडिट चलाने और मनी लॉन्ड्रिंग के झूठे आरोप लगाने जैसे हथकंडे अपनाए जा रहे हैं । ‘एल-फारो‘ के प्रधान संपादक ऑस्कर मार्टिनेज के फोन को हैक करने का 42 बार प्रयास किया गया। खोजी पत्रकार कार्लोस मार्टिनेज के फोन में 269 दिन तक हैकर्स की गतिविधि जारी रही। अल-सल्वाडोर के पत्रकार और अन्य पर्यवेक्षक कहते हैं कि ऐसे हमलों के पीछे खुद सरकार का हाथ है। हालांकि अधिकारियों ने ऐसे आरोपों से इनकार किया है। दूसरी तरफ वहां की संसद ने ‘दंडात्मक सुधार कानून‘ पारित किया है। यह प्रेस को और अधिक कमजोर कर देगा। अब गिरोहों के खिलाफ रिपोर्टिंग के कुछ रूपों को अपराध माना जाएगा।

मलेशिया: पाठकों की टिप्पणी पर 124,000 डॉलर का जुर्माना

वर्ष 2018 में मलेशिया के चुनावों में सत्तारूढ़ गठबंधन ने अपना संसदीय बहुमत खो दिया। उस वक्त ऐसा लग रहा था कि प्रेस की आजादी में सुधार आएगा। लेकिन मार्च 2020 में पूर्व सत्तारूढ़ गठबंधन दोबारा सत्ता में लौट आया। इस तरह मीडिया पर हमलों का नया दौर शुरू हुआ।

वर्ष 2018 के ऐतिहासिक चुनाव में स्वतंत्र मीडिया के बतौर मलेशियाकिनी (Malaysiakini) ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। इसने डिजिटल मीडिया में भी कई नए प्रयोग किए। यह विगत 20 वर्षों से मलेशिया में स्वतंत्र राजनीतिक समाचार का प्रमुख स्रोत था। इसके मतदान और मतगणना के शानदार कवरेज के जरिए चुनाव की निष्पक्षता सुनिश्चित करने में मदद की। शायद यही कारण है कि सत्ताधारी दल की वापसी के बाद से उसे कई मुकदमों और उत्पीड़न का सामना करना पड़ रहा है।

वर्ष 2021 में ‘मलेशियाकिनी‘ को अदालत की अवमानना दोषी पाया गया। पाठकों द्वारा पोस्ट की गई पांच टिप्पणियों को न्यायपालिका के लिए अपमानजनक माना गया। ‘मलेशियाकिनी‘ की वेबसाइट पर पोस्ट की गई पांच टिप्पणियों में पाठकों ने पिछले मुख्यमंत्रियों के बरी होने और न्यायपालिका की अक्षमता की आलोचना की थी। ऐसी टिप्पणियों का पता चलते ही ‘मलेशियाकिनी‘ ने इन्हें अपने साइट से हटा दिया था। इसके बावजूद अदालत ने कहा कि समाचार पोर्टल को ऐसी टिप्पणियों की पहले ही जांच करनी चाहिए थी। इस कथित ‘अपराध‘ के लिए तीन दिन के भीतर 124,000 डॉलर का जुर्माना भरने का आदेश दिया गया। मलेशियाकिनी ने पाठकों से आर्थिक मदद मांगी। पांच घंटे के भीतर पाठकों ने क्राउडफंडिंग करके जुर्माने की राशि उपलब्ध करा दी। यह प्रकरण मीडिया के उत्पीड़न के नए तरीके की मिसाल है।

प्रकाशनों के सोशल मीडिया अकाउंट्स की हैकिंग

इथियोपिया में वर्ष 2018 में प्रधानमंत्री अबी अहमद के सत्ता में आने के बाद मीडिया के लिए नई उम्मीद जगी। दशकों बाद अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के लिए जगह खुलनी शुरू हुई। नई सरकार ने जेल में बंद पत्रकारों और ब्लॉगर्स को रिहा कर दिया। लगभग 200 से अधिक समाचार वेबसाइटों और ब्लॉगों को फिर से चलाने की अनुमति मिल गई, जो वर्षों से अवरुद्ध थे।

लेकिन नवंबर 2020 में शुरू हुए टाइग्रे युद्ध के साथ ही कई नीतियों की वापसी हो गई। इसके बाद पत्रकारों की गिरफ्तारी और मीडिया के प्रति शत्रुतापूर्ण भाषा में वृद्धि देखी गई। कई मीडिया संस्थानों को आत्म-सेंसरशिप का शिकार होना पड़ा। रिपोर्टिंग पर भी व्यावहारिक सीमाएं हैं। देश के उत्तरी इलाके में संघर्ष की रिपोर्टिंग के लिए पत्रकारों की पहुंच पर रोक है।

संघर्ष और व्यवधान के समय मीडिया और चैनलों को सोशल मीडिया पर दर्शकों के साथ जुड़ने की काफी जरूरत है। यह न केवल जानकारी साझा करने के लिए बल्कि बहस का मंच प्रदान करने के लिए भी जरूरी है। लेकिन शत्रुतापूर्ण ताकतों द्वारा मीडिया पर डिजिटल हमलों के मामले सामने आए हैं।

स्वतंत्र अखबार ‘अदीस मालेडा‘ और उसकी सहयोगी पत्रिका को हाल ही में हैकर्स ने निशाना बनाया। इसके फेसबुक पेजों के व्यवस्थापक को एक व्यक्तिगत खाते में स्थानांतरित कर दिया गया। इसके बाद हैकर्स ने जानबूझकर फेसबुक के सामुदायिक मानकों का उल्लंघन करने वाली अनुचित सामग्री पोस्ट की। इसके कारण अदीस मालेडा के खाते को दो महीने के लिए निलंबित कर दिया गया।

ऐसी स्थिति में एमडीआईएफ ने अखबार को सहयोग किया। नैरोबी और डबलिन में फेसबुक की टीम से संपर्क करके खाते को वापस लाकर बहाल किया गया। यह एक लंबी और जटिल प्रक्रिया थी। यह मामला दिखाता है कि सोशल मीडिया अकाउंट्स को कितनी आसानी से हाईजैक किया जा सकता है। यह इस बात पर भी प्रकाश डालता है कि बड़ी तकनीकी कंपनियां ऐसे मामलों में कितनी लापरवाह हैं।

सरकारें समाधान करें, खुद समस्या न बनें

डिजिटलाइजेशन ने दुनिया भर में स्वतंत्र मीडिया को व्यापक नागरिकों तक समाचार और सूचना प्रदान करने की सुविधा दी है। लेकिन मीडिया विरोधी ताकतों को कई प्रकार से हमलों का अवसर भी मिला है। कई बार सरकारें डिजिटल हमलों के जरिए मीडिया को चुप कराने के रास्ते पर चलती हैं। इसके बजाय उन्हें ऑनलाइन प्रेस की सुरक्षा के लिए स्पष्ट कानून बनाने चाहिए। प्रेस की स्वतंत्रता और लोगों के अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकारों का सक्रिय रूप से बचाव और प्रचार करना चाहिए।

इसमें फेसबुक जैसी बड़ी तकनीकी कंपनियों की भी अहम भूमिका है। उन्हें स्वतंत्र मीडिया खातों को अधिक सुरक्षा प्रदान करनी चाहिए। जिन खातों को हैक कर लिया गया हो, उन पर नियंत्रण को पुनः प्राप्त करने के लिए त्वरित एवं अधिक उत्तरदायी और पारदर्शी प्रक्रिया अपनानी चाहिए। जब तक सरकारें और बड़ी तकनीकी कंपनियां अपनी जिम्मेदारी नहीं निभातीं, तब तक मीडिया पर डिजिटल हमलों का संकट बढ़ता ही जाएगा।

यह पोस्ट पहले ‘मीडिया डेवलपमेंट इन्वेस्टमेंट फंड‘ की वेबसाइट  पर प्रकाशित हुई थी। अनुमति के साथ यहां फिर से प्रस्तुत की गई है।

अतिरिक्त संसाधन

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मीडिया डेवलपमेंट इन्वेस्टमेंट फंड दुनिया भर में स्वतंत्र मीडिया में निवेश करता है। इसका मकसद नागरिकों को स्वतंत्र एवं सूचना संपन्न समाज बनाने के लिए समाचार और संवाद के अवसर प्रदान करना है।

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